राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ राजतरंगिणी
नागेश्वर नागनाथ आदि नाम भगवान् शंकर के रखे गये । उनका शाब्दिक अर्थ होता है नागों के ईश्वर अर्थात्
राजा । इसी प्रकार नागनाथ का अर्थ होता है नाग जाति के स्वामी । प्रकट होता है कि राक्षस तथा नाग
जाति में संघर्ष हुआ था । उस संघर्ष में नागेश्वर अर्थात् नागा के राजा जिन्हें सम्भवतः कालान्तर में शंकर
का अवतार मान लिया गया होगा । दक्षिण में बहुत लोग शिवाजी महाराज को शिव का अवतार मानते नहीं
हिचकते । कुछ इसी प्रकार की बात पुराकाल में हुई होगी । राक्षस पिशाच तथा नाग तीनो जातियाँ हिमा-
लय की पर्वतीय जातियां थी । उनमें युद्ध हुआ होगा । राक्षस तथा नागजाति के युद्ध में नागजाति विजयी
हुई थी । उसके नेता नागेश्वर थे । नागेश्वर को उनकी वीरता किंवा अपने जाति के नेता किंवा उद्धारक
होने के कारण अनेक गाथाएँ तथा आख्यायिकाएँ उनके सम्बन्ध में बन गयी होंगी । कुछ शताब्दियों पश्चात्
विशिष्ट गुणो के कारण नागा जाति ने अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिए उन्हें अवतार मान लिया ।
नाग देवो की मूर्तिया बनायी जाती थी । नाग मूर्तियो किंवा प्रतिमाओ की विशेषता यह होती थी कि
कटि से अधोभाग नाग की पूंछ का रूप होता था । अर्थात् कटि से नीचे का हिस्सा सर्प तुल्य तथा वाटि से ऊपर
अर्थात् ऊर्ध्व भाग मनुष्य का होता था । यदि नागिन हुई तो उसमे स्त्री आकार नारी या होता था उसे कंकण,
भुजबन्ध, माला आदि स्त्रीजनोचित आभूषण द्वारा आभूषित किया जाता था । यदि नाग किंवा पुरुष देवता
हुए तो यज्ञोपवीत, मुकुट, कण्ठहार आदि से अलंकृत किया जाता था । छत्र के स्थान पर फैला फण होता है।
इस प्रकार की पूर्वकालीन पाषाण मूर्तियां प्राय. खण्डित बहुत मिलती है। मुस्लिम काल में मन्दिरो तथा
मूर्तियो के नष्ट करने के उत्साह में उन्हे खण्डित कर फेंक दिया गया । आधुनिक काल की मूर्तियो में केवल
नाग किंवा सर्प का रूप बना मिलता है । कालिय नाग की मूर्तियां निस्संदह मध्य तथा वर्तमान युग में
अधोभाग नाग तथा ऊर्ध्वभाग मनुष्य रूप में मिलती है ।
यहो पर एक दूसरी मूर्ति शयनावस्था में है । मूर्ति का अधोभाग नाग तथा कटि से ऊपर का
पुरुष का है । मस्तक के पृष्ठभाग के ७ फण उठे शिरोभाग की रक्षा कर रहे हैं । कानोंमें कुण्डल हैं, स्कन्ध
प्रदेश पर यज्ञोपवीत है । मस्तक पर मुकुट तथा कण्ठ में मुक्तामाला है । कोनार्क मन्दिर भुवनेश्वर (उड़ीसा)
में नाग की विभिन्न प्रकार की मूर्तियां खुदी लगी है । किन्तु सब का कटि से नीचे अधोभाग नाग की पूंछ
तथा ऊर्ध्वभाग मनुष्य का है ।
महाबलीपुरम में चट्टान पर किरातार्जुन की गाथा मूर्तियों में उत्कीर्ण है । उनमें तपस्वी, यक्ष,
गन्धर्व के साथ अनेक देवी देवता दिखाये गये हैं । वहाँ चट्टानो की बीच में एक गहरा स्थान ऊपर से नीचे
तक गया है । वह दोनो चट्टानो को एक प्रकार से अलग करता है । उसी धंसे हुए अथवा गलियारे जैसे स्थान
में नाग मूर्ति ऊपरसे नीचे तक खोदी गयी है। उसका कटि प्रदेश अधोभाग सर्प तथा ऊपरी मनुष्याकृति हैं।
मस्तक पर फण की छाया है । वह मूर्ति सन् ६४८-६७५ की कृति है । इससे स्पष्ट होता है कि नाग
पूजा समस्त भारतवर्ष में कश्मीर से लेकर धुर दक्षिण तक प्रचलित थी ।
अफगानिस्तान में एक बहुत बड़ा वर्ग है वह अपने को पुरातन नाग वंशीय मानता है । इस प्रकार
भारत के पश्चिम अफगानिस्तान अर्थात् आर्याना से लेकर पूर्व भाग प्रदेश तक नाग पूजा का महत्त्व था ।
एक बहुत बड़ा वर्ग नाग जाति किंवा वेष से अपनी वंश परम्परा जोड़ता था ।
एक काल था जब मनुष्येतर प्राणियों में मनुष्यो की कल्पना की गयी थी । मत्स्य अवतार की कथा
तथा भगवान् का मत्स्य रूप इसी प्रकार दिखाया गया है । अधोभाग मत्स्य तथा ऊर्ध्वभाग मनुष्य का है ।
नरसिंह अवतार में यह कल्पना उलट दी गयी । अधोभाग मनुष्य तथा ऊर्ध्वभाग सिंह का दिखाया गया है ।