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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 780, कुल 984 में से

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पृष्ठ 780

तृतीय तरंग ५९५
स एवं भूपतिर्भुक्त्वा भुवं वर्षशतत्रयम् ।
निर्वाणश्लाघ्यनिर्व्यूढि पातालेशैश्वर्यमासदत् ॥४७०॥
४७०. इस प्रकार उस नृपति ने तीन सौ वर्षों तक पृथ्वी का भोगकर निर्वाण श्लाघ्य
अन्तिम स्थिति (सर्वोच्च पद) प्राप्त किया¹।
सानुगे नृपतौ याते दैतेयदयितान्तिकम् ।
देवी सा वैष्णवी शक्तिः श्वेतद्वीपमगाहत ॥४७१॥
४७१. अनुचर सहित नृपति के पाताल प्रचारोपरान्त वह देवी वैष्णवी शक्ति श्वेत
द्वीप¹ चली गयी।
विष्णोश्च दैत्येन बभूव युद्धं दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह ।
घोरं द्रुमैः पर्वतमस्तकैश्च । वर्जयन्ति तदा मांसं मांसादा दिनपञ्चकम् ॥
युद्धं च ते देवगणाः समस्ताः 447 = ५५८
प्रहृष्टचित्ता ददृशुः समन्तात् ॥ * * *
172 = २२५-२२६ कुबेरो धर्मलटकौ दैत्यराजः पडङ्गकः ।
ततो हरिः क्रोधविवृत्तनेत्रः गन्धर्वो धृतराष्ट्रश्च कुसुमः कुहरः कुढः ॥
चक्रेण देवप्रवरः समान्ते । 903 = १०६९-१०७०
चिच्छेद दैत्यस्य शिरः प्रसय * * *
गङ्गा ततस्तोयमुपाजगाम । त्रिपुरारे नमस्तेऽस्तु नमस्त्वन्धकघातिने ।
174 = २२६-२२७ शूलाप्रभिन्नदैत्यांशरुधिरार्द्र नमोऽस्तु ते ॥

      • 1092 = १२९०
        चक्रमर्पय मे देव दैत्यसंघविनाशनम् । * * *
        प्रहसन्नमुवाचाथ हरिं हास्येन शंकरः । पाठभेद :
        = 190 = २४६-२४८ श्लोक संख्या ४७० में 'स एवं' का 'एवं स';
      • 'निर्व्यूढि' का 'व्यूढ' तथा 'सैश्वर्य' का पाठभेद
        तत्र सन्ति पिशाचा ये दैत्यपक्षाः सुदारुणाः । 'लैश्वरं' मिलता है।
        तेषां तु निग्रहार्थाय पिशाचाधिपतिर्बली ॥ पादटिप्पणियाँ :
        204 = २७७-२८८ ४७० (१) आइने अकबरी में उल्लेख है—
      • राजा न्यायप्रिय था। विजय भी किया। चनाब
        सतः शची शक्रपत्नी नाम्ना शक्रपथा नदी । नदी पर कुश्तवार के समीप यह अपने अनेक
        सतश्चन्द्रवती नाम दितितैत्यारिणिनृपः ॥ सम्बन्धियों तथा पार्षदों के साथ एक गुहा में चला
        289 = ३८७-३८८ गया। उनके विषय में पुनः नहीं सुना गया कि
      • उनका क्या हुआ। उसके वीरतापूर्ण कार्यों के
        त्वया विनिहता दैत्या देवब्राह्मणकण्टकाः । सम्बन्ध में अनेक कहानियां प्रचलित है।
        वरदश्च वरेण्यश्च सुरारिसंघहृा विभो ।। 354 = ४५७ ४७१ (१) श्वेतद्वीप : शाब्दिक अर्थ उज्ज्वल
      • किंवा श्वेतद्वीप होता है। प्राचीन परम्परा के अनु-