राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 779, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें५९४ राजतरंगिणी
बिलेऽपावृत्ततां याते दिवसान्येकविंशतिम् ।
प्रवेश्य पौरान्प्राङ्निन्ये दैत्यस्त्रीभोगभागिताम् ॥४६९॥
४६९. इक्कीस दिनों तक बिल के अनावृत रहने पर पुरवासियों को प्रविष्ट करके
दैत्य स्त्रियों के भोग का पात्र बनाया ।
नीलमत पुराण में इसका वर्णन मिलता है । वर्तमान नीलमत पुराण में दैत्य का उल्लेख
नाम अरिपथ है। यह कोयर परगना के जल को लाती निम्नलिखित रूप से किया गया है।
है । कोयर शब्द कपटेश्वर सर का अपभ्रंश है । ससुताः पार्थिवश्रेष्ठ तासां नामानि मे शृणु ।
कपटेश्वर के पश्चिमो शैलबाहु पर यह तीर्थ स्थित अदितेस्तनया देवा दितेर्दैत्यास्तथैव च ॥
है । यहाँ से भक्षवाल अर्थात् अचवल का भव्य जल- 47 = ७०-७१
स्रोत निकलता है । जल स्रोतस्विनो का रूप धारण * * *
कर हपंथा में प्रवाहित हो जाता है । (नी० २३२, लब्धमायस्तु दैत्येन्द्रो भक्षयामास मानवान् ।
२८९, ९९५ ) समीपे सरमस्तस्य नानादेशेष्ववस्थितान् ॥
अनवल ग्राम से कुछ अधोभाग जहाँ उक्त 70 = १२०-१२१
तीनों स्रोतस्विनियाँ मिलती हैं वहाँ उत्तर से लिदर * * *
(प्राचीन) लेदरी नदी अपने जल के साथ आकर मिलती भगवन्विदितं सर्वं यथा पूर्वं मया शिशुः ।
है। उसमें सिन्ध उपत्यका के बहुत हिमानियों के पालितः संप्रह्रसुतो दैत्यो नाम्ना जलोद्भवः ॥
जल आकर मिलते हैं। दाछुनपुर तथा खेलुरपुर 136 = १०९
परगनो के पानी को लाती है । प्राचीन काल लेदरी * * *
नदी से एक नहर द्वारा पानी मार्तण्ड अर्थात् मटन देवानुयात्रानिनदं श्रुत्वा दैत्योऽपि दुर्मतिः ।
पहुँचाया गया था जहाँ कृपा होती थी । जले व्यवध्यमात्मानं विदित्वा न विनिर्गतः ॥
पाठभेद : 162 = २१४
श्लोक संख्या ४६९ में 'दिवसान्येक' का * * *
'दिवसानेक' तथा 'भागिताम्' का पाठभेद 'भोगिताम्' ततश्चानन्तो गिरिसंनिकाशः
मिलता है । समप्रचन्द्रस्य समानकान्तिः ।
पादटिप्पणियाँ : व्यवर्धतावृष्य महीं दिवं च
४६९ (१) दैत्य : असुरों में एक दैत्य है । संत्रासयन्दैत्यगणान्समन्तात् ॥
उनकी माता दिति थी । पिता कश्यप थे । गुरु 169 = २१९
शुक्राचार्य हैं। उनके देवता वरुण तथा वायु हैं । * * *
हिरण्यकश्यप को दैत्यपति कहा गया है। दैत्यो ध्वस्तेऽन्धकारे हरिरप्रमेयो
का युग देव मान से १२ हजार वर्षों का होता है । योगेन गत्वा स्वपरं शरीरम् ।
दक्ष प्रजापति की कन्या दैत्यसेना थी । उसका दैत्येन युद्धं स चकार सार्धं
पति केशी दैत्य था । दैत्य का पर्यायवाची नाम देहेन चान्येन च युद्धमैक्षत् ॥
असुर—दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव, 172 = २२४-२२५
शुक्रशिष्य, दितिसुत, पूर्वदेव, एवं सुरद्विप हैं।