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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 746, कुल 984 में से

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पृष्ठ 746

तृतीय तरंग ५६३
धैतस्तं वारि वास्तवैर्यैर्वहत्तुहिनशर्करम् ।
ग्रीष्मोग्रेऽह्नि स्ववेश्माप्रात्क ततोऽन्यत्र लभ्यते ॥ ३६२ ॥
३६२. वहाँ के निवासी ग्रीष्म के उग्र दिन में अपने गृह के सामने से प्रवाहित तुहिन
खण्ड मय वितस्ता वारि प्राप्त करते थे । यहाँ के अतिरिक्त और कहाँ प्राप्त हो सकता है ?
प्रतिदेवगृहं कोशास्ते तस्मिन्नर्पिता नृपैः ।
सहस्रशः शक्यते यैः क्रेतुं भूः सागराम्बरा ॥ ३६३ ॥
३६३. उस नगर में राजाओं ने प्रति मन्दिर उतना कोश प्रदान किया, जिनसे सहस्र
वार सागराम्बरा धरा खरीदी जा सकती थी ।
पुरे निवसतस्तस्मिंस्तस्य राजप्रजासृजः ।
शनैः साम्राज्यलाभस्य षष्टिः संवत्सरा ययुः ॥ ३६४ ॥
३६४. उस नगर में निवास करते प्रजासृज राजा के साम्राज्य लाभ के साठ वर्ष
व्यतीत हो गये ।
ललाटे शूलमुद्राङ्के जराशुक्लाः शिरोरुहाः ।
तस्य शुश्रूषमासङ्गिगङ्गाम्भोविभ्रमं दधुः ॥ ३६५ ॥
३६५. उसके शूल मुद्रांकित ललाट पर जरा के कारण श्वेत केश शिव के श्रम से
आलिंगित गंगा जल की शोभा धारण कर रहे थे ।

पाठभेद : अलंकार है । गंगा जल की पवित्र धारा उज्ज्वल
श्लोक संख्या ३६२ में 'र्वहत्' का 'वृंहत्' होती है । श्वेत केश उज्ज्वल होते हैं । गंगा हर
'ग्रीष्मोग्रे' का 'ग्रीष्मोग्रो' 'ग्रीष्मोग्ने' तथा 'स्त्व के मूर्धा से ललाट पर गिरती है । यहाँ राजा का
ततो' का पाठभेद 'त्कृतो' मिलता है । उज्ज्वल केश भी उसका मूर्धा से ललाट पर गिरता
पादटिप्पणियाँ : है । दोनों की तुलना कल्हण ने देकर अपनी
३६२ (१) वारि : कल्हण यहाँ पर ग्रीष्म काव्य व्यंजना का उत्तम उदाहरण उपस्थित
ऋतु में कश्मीरियों के शीतल वारि अर्थात् जल ग्रहण- किया है ।
प्रियता का उल्लेख करता है । ग्रीष्म का पुनः उल्लेख गंगा का जल उज्ज्वल एवं यमुना का नीला होता
त० ८:१८६३ में किया है । है । गंगा जल का सर्वत्र वर्णन उज्ज्वल, धवल आदि
पादटिप्पणियाँ : विशेषणों से किया गया है। गंगा की उज्ज्वलता
३६५ (१) शूल मुद्रांकित : शिव उपासक एवं यमुना की नीला नदिमा का भव्य दर्शन प्रयाग
ललाट पर त्रिपुण्ड लगाते हैं । दोनों भ्रू के मध्य पर होता है। वहाँ स्पष्ट दिखायी देता है । दोनों
ललाट पर तिलक के स्थान पर शैव लोग त्रिशूलाकार जलों के रंगों में कितना अन्तर है। इन दोनों
तिलक चन्दन अथवा भस्म का लगाते हैं। यही धाराओं के मध्य एक मलिन उज्ज्वल जल पंक्ति
यहाँ पर अभीष्ट है । उज्ज्वल तथा नील जल मिल जाने के कारण बनती
(२) गंगाजल : इस पद में निदर्शन है। यही त्रिवेणी है ।