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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 984 में से

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पृष्ठ 745

५६२ राजतरंगिणी
दृष्टः क्रीडानगोऽन्यत्र न मध्येनगरं क्वचित् ।
यतः सर्वौकसां लक्ष्मोः संलक्ष्या नृपसद्मवत् ॥ ३६१ ॥
३६१. कहीं नगर मध्य क्रीड़ा पर्वत नहीं देखा गया, जहाँ से आकाश तुल्य सब
गृहों की शोभा लक्ष्य हो ।

हैं कि कुछ नहरें अपने तटों पर स्थित देव मन्दिर
विहारों, मठों, मठों, एवं शालाओं, घाटों तथा साधु
सन्तों के शिविरों के कारण अवश्य पवित्र मानी
जाती रही होंगी । पवित्र स्थाना के सामीप्य के
कारण उनके साथ पवित्र विशेषण जोड़ देना अस्वा-
भाविक नही मालूम होता ।

हैं । और सब से तल तक चालीस चालीस गज
के पत्थर काट कर एक दूसरे पर रखकर बनाये
गये हैं ।
नगर के पास एक पर्वत है। जिसे कोई मारान
और कोई हरि पर्वत कहते हैं । पर्वत के चारों तरफ
झील है जिसका घेरा १।। कोश है।

३६१ ( १ ) पर्वतः यहाँ पर्वत का अर्थ हरि
पर्वत किंवा शारिका पर्वत लगाना चाहिये । इस
के शिखर से श्रीनगर तथा काश्मीर उपत्यका का
विहंगम दृश्य दिखता है। कल्हण निश्चय ही
यह दृश्य अनेक बार देखकर, मुग्ध हो गया होगा ।
उसका कवि हृदय रह-रह कर इस दृश्य का मनोहर
वर्णन करना चाहता है ।

शारिका पर्वत एक प्रकार से कश्मीर उपत्यका
के मध्य में शिवलिंग स्वरूप स्थित है। कश्मीर
उपत्यका को यदि अर्घा मान लें तो यह पर्वत शिवलिंग
तुल्य लगेगा । अर्घा के चंचल जल ही डल, अंचर
वूलर लेक तथा अनेक सरोवर हैं। अर्घा से बहता
जल वितस्ता, सिन्धु तथा अनेक स्रोतस्विनियों की
धाराएँ है । हरपर्वत के ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान
से मुझे यह दृश्य अच्छा लगा ।

इस तरंग के ३३९-३४९ श्लोक इस सम्बन्ध
में द्रष्टव्य हैं। जहाँगीर हरि पर्वत के सन्दर्भ में
लिखता है ।

'इस्लाम धर्म के प्रकट होने के पूर्व काल के
ऊँचे मन्दिर अभी तक वर्तमान है जो सब पत्थर के

हमारे पिता (अकबर) ने आज्ञा दी थी कि
एक दृढ़ दुर्ग पत्थरों चूने का बनाया जाय । यह इस
प्रार्थी के राज्यकाल में प्रायः पूरा हो गया । जिससे
लोग पर्वत दुर्ग के अन्दर आबया हैं। और इसके
चारों ओर सत्तर तोपें भी सौंपी गयी हैं। भीतर दुर्ग
के पास है। महल व एक छोटा उद्यान है। जिसमें
एक छोटी इमारत है, जहाँ हमारे श्रद्धेय पिता
बैठा करते थे। इस समय वह स्थान बहुत बुरे
हालत में है गिरता दिखायी पड़ा। वह हमारे
क़िबला तथा दृश्य देखना का स्थान है। जहाँ वह
बैठा करते थे। और इस प्रार्थी के लिये वास्तव में
सिजदा करने का स्थान है। इसलिये इस प्रकार
इसकी जीर्णता हमें अनुचित ज्ञात हुई । इस लिये
मैने मोतमित खाँ को जो हमारी प्रकृति को समझने
वाला है आज्ञा दी कि इस छोटे बाग को ठीक
करने का तथा इमारतों को मरम्मत कराने का पूरा
प्रयत्न करे । थोड़े ही समय में उसके विशेष प्रयत्नों
से इन सब में नई सुन्दरता आ गयी । उद्यान में
३२ गज चौकोर चबूतरे पर तीन खण्ड का एक
ऊँचा सुफा बनवाया गया। और इमारत की मरम्मत
कराकर उसमें उस्तादों के बनाये चित्र लगाये,
जिससे वह चीन की चित्रशाला की ईर्ष्या वस्तु
हो गयी । हमने इस उद्यान का नाम नूरे अफज़ा रखा।