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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 984 में से

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पृष्ठ 699

५३२ राजतरंगिणी
जन्मान्तरे लब्धसिद्धिस्त्वामस्म्युपरिगाधकम् ।
वाञ्छामपृच्छं राज्यार्थमभिलाषस्तु तेऽभवन् ॥ २६८ ॥
२६८. 'जन्मान्तर में तुम मेरे उपरि साधक' (अनुचर) थे। उस समय सिद्धि प्राप्त
होने पर मैंने तुम्हारी अभिलाषा पूछी । राज्य की अभिलाषा तुम्हें हुई ।
सफलं तव कर्तुं तन्मनोरथमनन्यथा ।
अथ मामित्थमादित्यपारमणशेखरः ॥ २६९ ॥
२६९. 'तुम्हारे मनोरथ की सिद्धि हेतु जब मैं प्रयत्नशील था उस समय क्षपा रमण
शेखर (शिव) ने ऐसी दीक्षा दी—
गणोऽयं मामकः सिद्धो यस्तवोपरिसाधकः ।
जन्मान्तरेऽस्य राज्येच्छां कुर्यामहमनान्यथा ॥ २७० ॥
२७०. 'तुम्हारा उपरिसाधक मेरा सिद्ध गण है। जन्मान्तर में इसकी राज्य प्राप्त की
इच्छा थी। मैं इसे पूर्ण करूंगा।
भावं भवस्तद्भवतो भगवान्दत्तदर्शनः ।
साफल्यं नेष्यतीत्येवमभिधाय तिरोदधे ॥ २७१ ॥
२७१. 'भगवान् शिव दर्शन देकर तुम्हारा मनोरथ सफल करेंगे'—यह कहकर वह
तिरोहित हो गया ।
साम्राज्येच्छोः समामेकां तत्र तस्य तपस्यतः ।
लब्धस्मृतिः सिद्धगिरा प्रददौ दर्शनं शिवः ॥ २७२ ॥
२७२. वहाँ एक वर्ष तपस्या करने पर साम्राज्याकांक्षी उसे (शिव ने) सिद्ध वाणी
द्वारा स्मरण प्राप्त कर, दर्शन दिया ।
व्रतिवेषं तमादिष्टवाञ्छितार्थसमर्पणम् ।
स जगन्निर्जयोन्निद्रं नरेन्द्रत्वमयाचत ॥ २७३ ॥
२७३. वांछित अर्थ समर्पण के लिये कहने वाले उस व्रती वेशधारी (शिव) से जगत्
जयसे जागरूक नरेन्द्रता को (प्रवरसेन ने) याचना की।
पाठभेद : अलौकिक शक्ति प्राप्ति के लिये जो साधन करता
श्लोक संख्या २६८ मे 'साधकम्' का पाठभेद है उसे साधक कहते हैं ।
'साधक.' मिलता है । पाठभेद :
पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या २७१ में 'भावं' का पाठभेद
२६९ (१) साधक : तन्त्र तथा माहात्म्य से 'भावे' मिलता है ।