सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 698, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 698

तृतीय तरंग ५३१
पितृशोकाद्व्रता तस्य क्रोधेनान्तरधीयत ।
तरोरिवाऽर्कतापेन नैशाम्बुलवसिक्तता ॥ २६६ ॥
२६६. उसकी पितृशोकार्द्रता क्रोध से वैसे ही अन्तर्हित हो गयी—जैसे रवि ताप से
तरु की रात्रि कालीन जलसिक्तता ।
श्रीपर्वते पाशुपतव्रतिवेषस्तमागतम् ।
आचख्यावश्वपादाह्यः सिद्धः कन्दाशनं ददत् ॥ २६७ ॥
२६७. जब वह श्री' पर्वत पर आया तब उसे पाशुपत² व्रती वेश अश्वपाद नामक
सिद्ध कन्द भोजन देते हुए कहा—
२६७ (१) श्रीपर्वत—श्रोपर्वत किंवा श्री शैल
के लिये विष्णुपुराण २:१४१ तथा ५:११८
द्रष्टव्य है ।
(२) पाशुपत : नाट्य शास्त्र के अनुसार इस
पंथ का अनुयायी नृत्य एवं गान से अपना भक्ति भाव
प्रकट करता है । कालान्तर मे तन्त्र शास्त्र के विकास
के साथ शिव पुरुष रूप तथा पार्वती स्त्री शक्ति किंवा
प्रकृति रूप में चित्रित गये हैं ।
श्री शंकराचार्य ने पाशुपत सम्प्रदाय के पाँच
सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है—(१) कार्य,
(२) कारण, (३) योग (४) विधि तथा
(५) दुःखान्त ।
कार्य तीन प्रकार के हैं—(१) विद्या (१) अविद्या
तथा (३) पशु । विद्या दो प्रकार की है—बोध
स्वभावा तथा (२) अबोधस्वभावा । बोध स्वभावा
विद्या दो प्रकार का है--(१) व्यक्त तथा
(२) अव्यक्त । पशु दो प्रकार का होता है—
(१) मलयुक्त तथा (२) निर्मल ।
(२) कारण—समस्त वस्तुओं की सृष्टि, संहार
तथा अनुग्रह करने वाले तत्त्व को कारण कहते हैं ।
गुण एवं कार्य के भेदों के कारण इसके अनेक रूप
हो जाते हैं ।
(३) योग—ईश्वर के साथ चित्त के सम्बन्ध
को जोड़ने वाले साधन को योग कहते हैं । यह
दो प्रकार का होता है—(१) क्रिया युक्त तथा
(२) क्रियाहीन ।
(४) विधि—धर्म को सिद्धि करने वाले
व्यापार किंवा क्रिया को विधि कहते हैं । विधि दो
प्रकार की होती है । (१) प्रधान तथा (२) गौण ।
इसके भेद—(१) व्रत तथा (२) द्वार हैं ।' भस्म
से स्नान, भस्म में शयन, उपहार, जप एवं प्रदक्षिणा
व्रत हैं। द्वारचर्या छह प्रकार की होती है (१) क्रायन
(२) स्पन्दन (३) मन्दन (४) शृंगारण
(५) अवितकरण तथा (६) अविमद् भाषण । चर्या
को सहायक विधि गौण विधि कही जाती है ।
(५) दुःखान्त—दो प्रकार का होता है—
(१) अनात्मक तथा (२) सात्मक । अनात्मक दुःखों
का पूर्ण क्षय है । सात्मक—जिसमे ज्ञान और कर्म
की शक्ति से युक्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।
ज्ञान शक्ति पाँच प्रकार की होती है—(१) दर्शन
(२) श्रवण (३) मनन (४) विज्ञान तथा
(५) सर्वज्ञत्व । क्रिया शक्ति एक होने पर भी
त्रिविध है—(१) मनोजवित्व (२) कामरूपित्व
(३) विकरणधर्मित्व ।
शैव सम्प्रदाय के अन्तर्गत चार सम्प्रदाय
(१) शैव (२) पाशुपत (३) कारुक सिद्धान्ती
तथा (५) कापालिक नामधारी सिद्धान्त आते हैं ।
पाशुपत सिद्धान्त के प्रतिपादक स्वयं भगवान् पशुपति
माने जाते थे । शिवपुराण की वायवीय संहिता
(२,२४,१९९ ) द्रष्टव्य है । अन्य ग्रन्थ पंचाध्यायी
है। उसका उल्लेख काश्मीर विद्वान् केशव भो
करते हैं ।