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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 672, कुल 984 में से

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पृष्ठ 672

तृतीय तरंग ५११
त्यागिनो निष्कलङ्कस्य को दोषोऽस्य महीपतेः ।
ममापुण्यं तु तन्निन्द्यं यच्छ्रेयःप्रतिबन्धकम् ॥ १९६ ॥
१९६. "त्यागी एवं निष्कलङ्क इस नृपति का क्या दोष है ? मेरा अपुण्य ही निन्द्य है,
जो कि श्रेय का प्रतिबन्धक है
रत्नोज्ज्वलाः प्रविकिरंल्लहरीः समीरै-
रन्धिः क्रियेत यदि रुद्धतटाभिमुख्यः ।
दोषोऽर्थिनः स खलु भाग्यविपर्ययाणां
दातुर्मनागपि न तस्य तु दातृवायाः¹ ॥ १९७ ॥
१९७. "रत्नों² के समुज्ज्वल लहरियों का विकिरण (प्रसार) करते हुए, समुद्र को
यदि वायु तट से दूर कर दे—तो वह प्रार्थी के भाग्य विपर्यय का ही दोष है न कि उस दाता
की दानशीलता का
उच्चानफललुब्धानां वरं राजोपजीविनः ।
न तु तत्स्वामिनस्तीव्रपरिक्लेशैः फलन्ति ये ॥ १९८ ॥
१९८. "उदात्त फलाभिलाषियों में नृपोपजीवी श्रेष्ठ होते हैं, न कि वे स्वामी जो कि
तीव्र परिश्रम पर फल प्रदान करते हैं ।
तिष्ठन्ति ये पशुपतेः किल पादमूले
संप्राप्यते झटिति तैर्नहि भस्मनोऽन्यत् ।
ये तद्वृषस्य तु समुज्ज्वलजातरूप-
प्राप्त्या न कानि सुदिनानि सदैव तेषाम्¹ ॥ १९६ ॥
१९९. "जो पशुपति के पादमूल में बैठते हैं, वे तत्काल भस्म के अतिरिक्त और
कुछ नहीं प्राप्त करते; जो लोग उनके वृष का आश्रय लेते हैं, उनके लिये सदैव समुज्ज्वल
स्वर्ण प्राप्ति के अतिरिक्त और कौन सुदिन हो सकता है ?
पाठभेद :
श्लोक संख्या १९७ में 'प्रविकिरंल्ल' का 'प्रवि-
किरेल्ल', 'प्रविकरंल्ल' तथा 'पर्ययाणां' का पाठभेद
'पर्ययेण' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१९७ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रहका
६२वां श्लोक है ।
(२) रत्न : श्री रणजीत सीताराम पण्डित
ने इसका भावार्थ टिप्पणी में किया है कि
रत्नों की खान समुद्र रत्नाकर है । वह दाता है ।
वह अपनी लहरो से रत्न सहित तट की ओर याचक
किंवा अभ्यर्थी को रत्न देने बढता है । किन्तु वायु
उसको इस कार्य मे विरत कर देती है ।
१९६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का
६३ वा श्लोक है ।
श्री सीताराम पण्डित इस श्लोक के अनुवाद
की टिप्पणी में लिखते हैं—'इस श्लोक से यह
प्रतीत होता है कि कल्हण के समय में नन्दी
के उपासकों की कमी नहीं थी । जिन्हें वह शिव
की अपेक्षा सरलता से मिल जाता था। नन्दी सुर एवं
असुर के समुद्र मन्थन से रत्न रूप प्राप्त हुआ था ।