राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० राजतरंगिणी
मातृगुप्तस्तु नृपतेः संलापमपि निष्फलम् ।
ध्यायन्गृहीतनैराश्यस्त्यक्तभार इवाभवत् ॥ १९१ ॥
१९१. मातृगुप्त नृपति के संलाप को भी निष्फल मानता हुआ. निराश होकर, भार
रहित तुल्य हो गया ।
अन्तर्दध्यौ च कर्तव्यं कृतं शान्तोऽद्य संशयः ।
आशापिशाचिकात्यक्तश्चरिष्याम्यधुना सुखम् ॥ १९२ ॥
१९२. अन्तःकरण में ( यह ) धारण कर लिया—'कर्त्तव्य किया । आज संशय शान्त
हो गया । अब आशा स्वरूप पिशाची से मुक्त हुआ, सुख पूर्वक विचरण करूँगा ।
गतानुगतिकत्वेन कोऽयमासीन्मम भ्रमः ।
जनप्रवादात्सेव्यत्वं येनास्य ज्ञातवानहम् ॥ १९३ ॥
१९३. “गतानुगतिका के कारण मुझे यह कौन भ्रम हो गया था, जिसे जनप्रवाद
वस इसे सेव्य मान लिया ।
भुञ्जानाः पवनं सरीसृपगणाः प्रख्यापिता भोगिनो
गायद्भृङ्गनिवारका निगदिता विस्तीर्णकर्णा गजाः ।
यश्चाभ्यन्तरसंभृतोष्मविकृतिः प्रोक्तः शमी स द्रुमो
लोकेनेति निरर्गलं प्रलपता सर्वं विपर्यासितम् ॥ १९४ ॥
१९४. “पवन के अशन करने वाले सर्पों को 'भोगी' प्रख्यात किया; गान करते भृंगों
के निवारक गजों को 'विस्तीर्णकर्ण' कहा; जो अभ्यन्तर में अग्नि विकार धारण करता है;
उस द्रुम को शमी कहा—इस प्रकार संसार ने सबको विपरीत कर दिया है
अथवा विद्यनेऽमुष्य न काऽप्यनभिगम्यता ।
लक्ष्मीप्रणयिनो येन कृताः प्रणयिनां गृहाः ॥ १६५ ॥
१९५. "इसके पास जाने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है, जिसने अपने प्रणयी जनों को
गृह लक्ष्मी सम्पन्न कर दिया है—
श्लोक संख्या १९४ में 'प्रख्यापिता' का पाठभेद
'प्रख्यायिता' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१९५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ६१वा
श्लोक है ।
(२) भोगी आदि : कल्हण ने यहाँ भोगी
शब्द की उपमा दी है। भोगी शब्द भुज अर्थात्
भोगने से बना है । गज शब्द गे अर्थात् गाने
से बना है । शमी शब्द शम् अर्थात् आन्तरिक शान्त
होना है । शमी वृक्ष से अग्नि तैय्यार की जाती है ।
उससे रगड़ कर अग्नि उत्पन्न की जाती है ।
प्राचीन गाथा है । शमी की शाखा में अग्नि छिपी
रहती है । आकाशचारी सर्प भी होते है । वे उड़ते
हैं । मैने पेड़ो पर अत्यन्त पतला लम्बा साँप देखा है
जो एक शाखा से दूसरी शाखा पर इस प्रकार जाता
है कि उड़ता मालूम पड़ता है । पुरानी गाथा है
कि नाग किंवा सर्प भी उड़ते है । मैंने अभी तक
इस प्रकार का सर्प अपनी आँखों नही देखा है ।
सर्प, गज तथा शमी यहाँ श्लेष है ।