राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 610, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजतरंगिणी ४६१
कल्याणिना प्राणिवधे तेन राष्ट्रान्निवारिते ।
निष्पापां प्रापिता वृत्तिं स्वकोशात्सौनिकादयः ॥ ६ ॥
६. राष्ट्र में प्राणी वध बन्द हो जाने पर, उस कल्याणी नृप ने स्व कोश से सौनिक
(कसाई) आदि को निष्पाप वृत्ति प्रदान की ।
तस्य राज्ये जिनस्येव मारविद्वेषिणः प्रभोः ।
ऋतौ घृतपशुः पिष्टपशुर्भूतबलावभूत् ॥ ७ ॥
७. जिन (बुद्ध) तुल्य मार१ (हिंसा) विद्वेषी उस प्रभु के राज्य में घृत पशु एवं पिष्ट
पशु की बलि२ यज्ञ में होती थी ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६ मे 'निष्पापा'का; निष्पाया'
'निष्पापा' 'निष्पापं' 'प्रापिता' का 'प्रापिता' तथा
'शार्सौ' का पाठभेद'शात्सो' 'पात्शो' तथा 'शात्सो'
मिलता है ।
श्लोक संख्या ७ में 'राज्ये' का पाठभेद 'राज्यं'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
७ (१) मार : मार तीन प्रकार के होते हैं—(१)
क्लेश मार (२) मृत्यु मार (३) देव पुत्र मार ।
क्लेश दश हैं—(१) लोभ (२) द्वेष (३) मोह (४)
मान (५) दृष्टि (६) विचिकित्सा (७) स्त्यान (८)
औद्धत्य (९) अह्री (१०) अन्—अपत्रपा अर्थात्
असंकोच । इनको क्लेश मार कहा जाता है ।
जिस समय तथा जिस हेतु से प्राणियों की मृत्यु
होती है उसे मरण मार कहते हैं । देवपुत्र मार
कामावचर के छठे देवलोक पर निर्मित वशवर्ती में
रहता है । द्रोही राजकुमार की भाँति यहाँ एक
प्रादेशिक शासक होता है । उससे सब भयभीत
रहते हैं । क्योंकि यह कुशल कर्मों का विरोधी है ।
अधिकांश मार देवपुत्र च्युत होकर नरक में पडते
है । दूपी आदि मारा की दुर्गति यहाँ द्रष्टव्य है ।
(२) बलि : कल्हण ने यहाँ 'क्रतो' शब्द
का प्रयोग किया है । ऋतु का अर्थ यज्ञ होता है ।
वेद में उल्लेख मिलता है —आनो भद्राः क्रतवो
यन्तु विश्वतः । अहिंसा के प्रचार के पश्चात्
पुराण तथा स्मृति वर्णित विहित पशु बलि के स्थान
पर घृतादि या पिष्ट पशु बनाकर उनकी बलि की
जाने लगी थी । पंच यज्ञ का पुराणों तथा स्मृतियों
में प्रचुर उल्लेख मिलता है । भूत बलि दिवंगत
के लिये दी जाती है । कश्मीरी शैव मतानुयायी
आज भी आटा अन्न तथा घृतादि की पशु प्राकृति
बनाकर बलि देते हैं । यह है पुरानी प्रथा की स्मृति,
बलि प्रथा को हिंसक रूप दिया गया है ।
बलि एवं उपहार : कल्हण ने बलि एवं
उपहार दोनों शब्दों का प्रयोग किया है । दोनों में
अन्तर है । बलि का अर्थ आत्मसमर्पण होता है ।
बलि कर्त्ता स्वयं अपना बलि न कर, अपने प्रतिनिधि
स्वरूप मनुष्य, पशु, पक्षी, फल आदि की बलि
चढ़ाता है । परन्तु उपहार में प्रतिनिधित्व का
प्रश्न नहीं उत्पन्न होता । किसी भी वस्तु को
उपहार, भेंट, पूजा स्वरूप इष्ट देव को चढ़ाया जाता
है । यह नैवेद्य स्वरूप प्रसाद हो जाता है । दोनों
की प्रक्रियाओं में अन्तर है ।