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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 984 में से

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पृष्ठ 609

४६० [विशेष: मध्य-संरेखित] तृतीय तरंग
तस्याभिषेक एवाज्ञां धारयन्तोऽधिकारिणः ।
सर्वतोऽमारमर्यादः पटहानुदघोषयन् ॥ ५ ॥
५. उसके अभिषेक काल में ही, आज्ञाकारी अधिकारियों ने अहिंसा मर्यादा का
पटह¹ घोष करवा दिया ।

विमुक्ति ज्ञान या साक्षात्कार, चार वैशारद्य, दश
बुद्ध बल, छः असाधारण ज्ञान, चौदह बुद्ध ज्ञान,
अठारह बुद्ध, धर्म, तथा बुद्ध को दूसरी बातों में
समान होते हैं । सभी बुद्ध, बुद्ध के गुणों में बराबर
होते हैं । ( मिलिन्द प्रश्न ४:८:७३ )
भगवान् बुद्ध के सम्बन्ध में अशोक से ललिता-
दित्य तक प्रायः एक विचारधारा थी । ललिता-
दित्य के समय में भगवान् बुद्ध के सम्बन्ध में जो
श्रद्धा भक्ति तथा उनके विचारों के प्रति आदर था
वह क्रमशः भविष्य में कम होता गया । भगवान्
बुद्ध का तत्कालीन विचार हिन्दू धर्म विरोधी नहीं
माना जाता था । क्षेमेन्द्र, वरदराज, जयस्थ और
कल्हण का बुद्ध के प्रति यह भाव प्रगट नहीं होता
जो नीलमत पुराण में प्रतिपादित है । शंकरा-
चार्य के पश्चात् तो पूर्व विचारों में आमूल परिवर्तन
हो गया । इस परिप्रेक्ष्य में कश्मीर में बुद्ध प्रभाव
का विश्लेषण करना चाहिए । भगवान् बुद्ध की
उषाकर आदि की जो मूर्तियाँ प्राप्त हुई है उनका
काल चौथी तथा पांचवी शताब्दी है । उनमें एक
आसनस्थ, दूसरी दो खड़ी हैं। इसी प्रकार पण्डरेथन
अर्थात् पुराणाधिष्ठान से बोधिसत्त्व, अवलोकितेश्वर,
भगवान् बुद्ध के जन्म का दृश्य आदि उपस्थित करती
मिली है । जिनका काल छठी शताब्दी पूर्व कहा
जाता है ।
स्कन्द पुराण काशी खण्ड में भगवान् बुद्ध का
रूप खींचा गया है उसमे जटा-जूट एवं गैरिक
परिधान धारी वह दिखाये गये है। स्कन्द पुराण
का वर्णन भगवान् बुद्ध के परम्परा गत बनती
मूर्तियों से नहीं मिलता । कश्मीर में अब तक
जटाजूट, एवं गैरिक वस्त्र धारी मूर्तियाँ नहीं
मिली हैं ।

नीलमत पुराण बुद्ध को विष्णु का अवतार
मानता है तथा उनके जन्म दिवस पर उत्सव की
विधि उपस्थित करता है । बुद्ध जन्म एक पर्व की
तरह मनाया जाता था । यह दिवस वैशाख मास
की पूर्णिमा को मनाया जाता था । आज भी
विश्व में बुद्ध पूर्णिमा इसी दिन को कहते हैं ।
इस दिन भगवान् बुद्ध की मूर्ति को स्नान,
आभूषण आदि से अलंकृत, तापसी के स्थान, घोर,
चैत्यों के दीवारों, की सफेदी कर उन्हें पवित्र
करना चाहिये । बौद्धों को पुस्तक, वस्त्र, खाद्य
पदार्थों का दान और नर्तकियों तथा वादकों से
समन्वित उत्सव मनाना चाहिये । भगवान् बुद्ध की
पूजा नैवेद्य, वस्त्र, दरिद्रों को दान देकर तीन
दिन तक करना चाहिये । ( नी० 684-692 )
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५ में 'मार' का पाठभेद 'सार'
तथा 'मान' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५ (१) पटहः इस शब्द का अर्थ नगाड़ा,
डंका, ढोल, ढुग्गी होता है। जैसे, प्राचीन पटह
घोष अर्थात् ढुग्गी पीटने के अर्थ में प्रयोग किया
गया है । ढुग्गी पीटने वाले को पटह घोषक कहते
थे । शहनाई के साथ भी कश्मीर में इसे बजाते
हुए हमने देखा है।
वेद तथा जातक कथाओ में पटह का उल्लेख
नहीं मिलता । महाभारत में कहीं-कहीं इसका
उल्लेख बहुत कम मिलता है । रामायण (५:१०:अ)
में निसन्देह इसका बहुत उल्लेख किया गया है ।
वीणा वादन के प्रसंग में नीलमत पुराण ने इसका
उल्लेख किया है । यथा 'वीणापटहनादितम्' । ( नी०
३२) तथा 'वीणापटह शब्देश्च' ( नी० 413)