राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 598, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४५१
अथ वनसरसीतटद्रुमाधः
पुटकघटोदरसंभृताम्बुपूरम् ।
वसतिमकृत वासरावसाने
शुचितरुपल्लवकल्पितोद्यतल्पाम् ॥ १६६ ॥
१६६. दिवस के अवसान में वन सरसी (सरोवर) तटपर तरु तले जल पूर्ण
पुटक१ घट के साथ पवित्र तरु पल्लवों से तल्प निर्मित कर निवास किया ।
शृङ्गासक्तमितासपाः शवलितच्छायाभुवः शाद्वलै-
रुत्फुल्लामलमल्लिकातलमिलत्सुप्तव्रजस्त्रीजनाः ।
सध्वाना वनपालवेणुरणितोन्मिश्रैः प्रपाताम्बुभिः
श्रान्तं दृक्पथमागतास्तमनयन्निद्रामदूराद्रयः ॥ १६७ ॥
१६७. दृष्टिगोचर निकटवर्ती उस पर्वत ने श्रान्त उसको निद्रित कर दिया, जिसकी
शिखरों पर मित आतप पड़ रहा था, जहाँ हरी-हरी घासों में छाया भू चित्रित तथा उत्फुल्ल
अमल मल्लिका तले, व्रजस्त्रीजन प्रसुप्त थी और जो वनपालों के वेणु ध्वनि से पूर्ण निर्झर
जल द्वारा निनादित हो रहा था ।
वनकरिरसितैः पदे पदे स
प्रतिभटतां पटहध्वनेर्दधानैः ।
अमनुत रटितैश्च कर्करेटोः
परिगलितां गमनोन्मुखस्त्रियामाम् ॥ १६८ ॥
१६८. गमनोन्मुख उसने पद पद पर, पटह ध्वनि, सदृश वन गज गर्जनों एवं काक
ध्वनियों से रात्रि को परिगलित समझा ।१
पाठभेद : पाठभेद :
श्लोक संख्या १६६ में 'तल्पाम्' का पाठभेद श्लोक संख्या १६७ में 'मिताउपा:' का 'सिता-
'तल्पम्' मिलता है । तपाः' 'उत्फुल्ला' का 'स्फाया' तथा 'पालवेणु' का
पाठभेद 'पालेरेणु' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १६८ में 'वनकरि' का 'वनहरि'
तथा 'ध्वनेर्' का पाठभेद 'ध्वनेंद्वं' मिलता है ।
कल्हण ने पुटक का उल्लेख तरंग १:२१३ पादटिप्पणियाँ :
श्लोक में भी किया है। यहां उसने पुनः उसको १६८ (१) वनवर्णनः इस दृश्य वर्णन
दोहराया है । कल्हण ने यहाँ पुरू. कवियों की शैली पर किया है ।