राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[४५०] राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ]
राजा सन्धिमति उत्तर दिशा की ओर चलता
हुआ भुज पत्तों के मर-मर से पूर्ण गुहागेह में रहने
वाले सिद्ध जनों के स्थान पर पहुँचता है। वहाँ
से वह पुनः नन्दि क्षेत्र की तरफ जाता है। नन्दि-
क्षेत्र हर मुकुट पर्वत पर है। हरिमुकुट की यात्रा
वे गन्ध अर्थात् सिन्ध वैलो होने पुनः हरमुकुट गंगा
का मार्ग पकड़ते हुए नारायण बल होते, गंगाबल
पहुँचते हैं। इस समय यहाँ की यात्रा कर श्रीनगर
आदि होते, नारायण बल की तरफ से लौटते हैं।
मैंने ब्रूजहोम की गुफाएँ देखी हैं। आजकल भी
भारतवर्ष के कितने ही स्थानों पर साधु इस प्रकार
की गुफाओं में रहते हैं। मै समझता हूँ ब्रूजहोम
का नाम भूर्ज वृक्ष के आधार पर पड़ा है। इन
गुफाओ में कौन रहते थे । उनमें मानव कंकाल
६॥ फुट लम्बे तक के मिले हैं। गाड़ने की प्रथा
हिन्दुओं मे नहीं थी। केवल साधु संन्यासी अथवा
सिद्ध गण समाधि लेते थे। तत्कालीन समय में
यहाँ केवल हिन्दू रहते थे। अतएव सन्धिमान
सिद्धजनों के स्थान में पहुँचता नन्दि पर्वत गया था।
यह स्थान नन्दि पर्वत यात्रा के मार्ग मे है। अतएव
यही स्थान गुहागेह निवासियो का है।
१ गव्यूती : हुरकन में टाइल्स मिली है जिनमें
लोगो के उँकडू बैठे हुए दिखाया गया है। यही
आसन समाधि में मिले दो चार कंकालो का मैने
देखा है। ये लम्बे सुला कर नही गाड़े गए थे।
उँकडू अधिक मिले हैं। समाधि देने की प्रथा है कि
पद्मासन लगाकर समाधि में रख देते थे, एक
प्रकार और था। खड़ी शव समाधि में खड़ाकर ऊपर
से मिट्टी डाल देते थे। यहाँ खड शव पद्मासन रूप
में रखा गया होगा। कालान्तर में एक पैर खुल
गया और पृष्ठ भाग गड्ढे में पीछे लग गया। यही
रूप खड़े शव का है।
यहाँ पर ईंटें भी मिली हैं। इन ईंटों का
आकार नारायण बाग में मिली ईंटों से मिलता है।
स्टाइन सन्धिमति का काल १०४४। वर्ष देता
[दायाँ स्तम्भ]
है। चाहे यह समय बिलकुल ठीक भी न हो परन्तु
सन्धिमति का समय २ हजार वर्ष पूर्व ही ठहरता है।
यदि वैज्ञानिक शोधन से यह शव दो हजार वर्ष
पूर्व का ठहरता है तो मेरा अनुभव ठीक है।
यहाँ मैने एक शव और देखा। जिसके मस्तक
की हड्डियाँ टूटी थीं। एक प्रथा थी शव समाधि
में रखने पर मूर्धापर नारियल अथवा ऐसी चीज
से मारते थे कि मूर्धा भग्न होजाय। यही कार्य
कपाल क्रिया के रूप मे श्मशान में की जाती है।
मस्तक तोड दिया जाता है।
पत्थर के सामान यहाँ मिलते हैं। साधुओ को
धातु स्पर्श निषेध किया गया है। आज कल भी
संन्यासी लोग पत्थर के बर्तनों में भोजन करते हैं।
सभी गृहस्थो के यहाँ चटनी आदि खाने तथा खट्टा और
दही आदि चीज रखने के लिए पथरी रखी जाती है।
इसका अर्थ यह नही है कि हम पत्थर युग में हैं।
हड्डियों की सुइयो के विषय में यही कहना अलम
है कि धातु की सुई बनाना वर्जित था। पर मूर्तियाँ
जो निकली हैं वे हिन्दू काल की हैं उन्हें लोह छेनी
से गढा गया है। वे हड्डियो तथा पत्थरों के
ओजारो से नही बन सकती थी अतएव उस समय
लोहा का आविष्कार हो चुका था। जब लोहा प्राप्त
था तो हड्डियो की सुई क्यों बनाई गयी। इसका
एक मात्र कारण यही है कि धातु का स्पर्श वर्जित
था। मेरा उक्त मत केवल अनुमान पर आधारित
है।
गुहागेह का शब्दार्थ इस बात की ओर लक्ष
करता है कि गुफा प्रकार के घरों में लोग निवास
करते हैं। अफगानिस्तान के बामियान स्थान में
पर्वत में सैकड़ों से भी अधिक गुफा मैने स्वयं देखी
है जहाँ भिक्षु तथा वहाँ रहने वाले उन गुफाओं में
रहते थे। इस समय अनेक गुहागृह ध्वस्त हो गये
हैं। परन्तु अत्यधिक अपना रूप कायम किये हैं।
यह पहाड़ पत्थर के नही सख्त मिट्टी के हैं। इस
लिये गुफायें बहुत नष्ट हो गयी हैं अथवा गिर
गयी हैं।