सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 583, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 583

यहाँ पृष्ठ की पूर्ण एवं शुद्ध पंक्ति-दर-पंक्ति पाठ-प्रस्तुति (transcription) दी जा रही है:

४४० राजतरंगिणी
जुगोप गोपादित्याख्यं कश्मीरेन्द्रजिगीषया ।
युधिष्ठिरप्रपौत्रं हि गान्धाराधिपतिस्तदा ॥ १४५ ॥
१४५. उस समय गान्धाराधिपति ने कश्मीरेन्द्र को जीतने की इच्छा से ही युधिष्ठिर
के प्रपौत्र गोपादित्य को अपने यहाँ संरक्षित किया ।
वसन्नप्राप्तसाम्राज्यः स तत्र तनयं क्रमात् ।
अवाप लक्षणैर्दिव्यैरमोघं मेघवाहनम् ॥ १४६ ॥
१४६. बिना साम्राज्य प्राप्त किये, यहाँ निवास करते समय, उसने दिव्य लक्षण
युक्त, अमोघ मेघवाहन नामक पुत्र प्राप्त किया ।
स युवा पितुरादेशाद्वैष्णवान्वयजन्मनः ।
राष्ट्रं प्राग्जोतिपेन्द्रस्य ययौ कन्यास्वयंवरे ॥ १४७ ॥
१४७. वह युवक पिता के आदेश पर, वैष्णव¹ कुलोत्पन्न, प्राग्ज्योतिपेन्द्र² के राष्ट्र में
उसकी कन्या के स्वयंवर में गया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४५ में 'दित्याख्यं' का 'दित्याख्यः'
और 'कश्मीरेन्द्र' का 'वाश्मीरेन्द्र' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४५ ( १ ) गान्धारः परिशिष्ट द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४६ में 'प्राप्त' का पाठभेद 'पास्त'
मिलता है ।
श्लोक संख्या १४७ में 'युवा' का पाठभेद 'तत्र'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१४७( १ ) वैष्णव : वैष्णव प्रभाव मणिपुर
आसाम में था और आज भी है । कल्हण के समय में
भी भारत के इस धुर पूर्वीय अंचल में वैष्णव सम्प्र-
दाय प्रबल था । आज भी वहाँ प्रबल है । यद्यपि
ईसाई मिशनरियों के कारण नागा, नेफा, आदि
क्षेत्रों में ईसाई धर्म का प्राबल्य हो गया है । गरीब
पर्वतीय जाति को ईसाई धर्म को दीक्षित करने में
विदेशी मिशनरी सफल हुई है । मणिपुर, त्रिपुरा
तथा आसाम के हिन्दू बहुल क्षेत्रों में वैष्णव प्रभाव
आज भी दिखायी पड़ता है ।
कल्हण को तत्कालीन भारतीय स्थिति का ज्ञान
था । उसके इस वर्णन से स्पष्ट होता है ।
( २ ) प्राग्ज्योतिष : एक प्राच्य जनपद था ।
यह अति प्राचीन जनपद था । महाभारत में कुछ
स्थानों पर इसको म्लेच्छ स्थान कहा गया है ।
वामन पुराण के अनुसार यह पूर्व का एक
जनपद है । ( वा. पु. १३:४५ )
वहाँ का राजा भगदत्त था। उसकी प्रशंसा
की गयी है। इसे दानवराज नरकासुर का देश
कहा गया है । नरकासुर का नाम भौम भी था ।
उसका पुत्र भगदत्त था । नरक राजा का उल्लेख
कल्हण ने ( रा. त. २:१५० में ) उल्लेख किया है ।
विष्णु पुराण के अनुसार यह राजधानी थी ।
( वायु : ४५ : १२२, मार्कण्डेय : ५७ : ४४,
मत्स्य ११४ : ४४ भाग० १० : ५९ रा : २, ३१;
वामन : ८:१२, ४३:५९ )
महाभारत में प्राग्ज्योतिष का उल्लेख मिलता
है । उसे एक अति प्राचीन नगर कहा गया है ।
भौमासुर की राजधानी था । ( म. स : ३८) भौमा-
सुर के पश्चात् उसका पुत्र भगदत्त वहाँ का राजा
हुआ था । यहाँ पर नरकासुर निवास करता था ।