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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 984 में से

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पृष्ठ 582

द्वितीय तरंग ४३९
सार्धं तपोघनैस्तैस्तैर्भजतो जागरोत्सवान् ।
तस्याऽभूवन्भुवो भर्तुरमोघा माघरात्रयः ॥ १४१ ॥
१४१. उन उन तपोनिधियों के सङ्ग में जागरगोत्सव मनाते उस पृथ्वीपति की माघ
रात्रियाँ निष्फल नहीं हुईं ।
अत्यद्भुतं राज्यलाभमित्थं सफलयन्कृती ।
पञ्चाशतं त्रिवर्षोनामत्यक्रामत्स वत्सरान् ॥ १४२ ॥
१४२. कृती यह (नृप) अत्यद्भुत राज्य लाभ को इस प्रकार सफल करता हुआ
तीन कम पचास (४७) वर्ष व्यतीत किया ।
शमव्यसनिनस्तस्य राज्यकार्याण्यपश्यतः ।
तस्मिन्काले प्रकृतयो विरागं प्रतिपेदिरे ॥ १४३ ॥
१४३. उस समय राज्य कार्य न देखने के कारण उस शान्ति प्रेमी से प्रजा विरक्त
हो गया ।
अन्वैष्यत नृपस्ताभिः कश्चिद्राज्याय शुश्रुवे ।
राजपुत्रो जिगीषुश्च श्रीमान्यौधिष्ठिरे कुले ॥ १४४ ॥
१४४. उन लोगों ने राज्य के लिये किसी नृपका अन्वेषण किया, तब सुना कि
युधिष्ठिर के कुल में एक विजयच्छुक श्रीमान् पुत्र है ।
आते ही भूमि पर तुषार पात होने लगता है । पौष
और माघ मासो में सम्पूर्ण पर्वतमाला तुषार
मण्डित हो जाती है । वृक्ष ठूंठे दिखायी पड़ते हैं ।
पुष्करिणियाँ, डल और उलर झीलें जम जाती हैं ।
कश्मीर मण्डल की भूमि कश्मीरियों के गौर वर्ण
से स्पर्धा करने लगती है । पादपों की शाखायें श्वेत
तुषार मण्डित हो जाती है । एक भी पत्ती दिखाई
नहीं पड़ती । आकाश पक्षी शून्य, वन पशुशून्य ओर
भूमि जनशून्य दिखायी पड़ती है ।
कश्मीर का यह काल दुःखप्रद होता है । साधा-
रण जनता अपने घरों में बन्दी बन जाती है ।
यदि अधिक तुषार पात हो गया तो द्वार खुलना
कठिन हो जाता है । इस समय केवल कांगड़ी एक-
मात्र सहायक होती हैं । रात दिन घर में रहने के
कारण जैसे दोनो में कोई अन्तर नहीं रह जाता ।
यह अवस्था फाल्गुन मास तक चलती है ।
कल्हण ने पाँच ऋतुओ का वर्णन किया है ।
शिशिर तथा शीत ऋतु के चार मास का एक ऋतु
रूप दिया है । एतदर्थ उन्होंने शिशिर तथा शीत
ऋतु का नाम लेकर उल्लेख नही किया है । यह
चार मास कश्मीर के जीवन का अत्यन्त कष्ट साध्य
मास है । ग्रीष्म, वर्षा तथा शरद ऋतु जितनी
सुहावनी होती है वैसा ही कष्टप्रद शीत के चार
मास होते हैं ।
इस कष्ट काल में जब बाहर निकलना कठिन
हो जाता है । रात दिन तुहिन वर्षा होती रहती है ।
सन्धिमान बाहर निकलने में असमर्थ होकर अपने
भवन में भगवान् के ध्यान में ही मग्न बिता देता
था । उसकी रात्रियाँ निष्फल नहीं हुईं । जब कि
शेष जनता तुहिमपात से पीड़ित तुषार के मध्य में पंगु
तुल्य वै वसन्त के आगमन की कामना करती है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४३ में 'शम' का पाठभेद
'सम' मिलता है ।