राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 576, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग ४३३
प्रतिलिङ्गं महाग्रामाः प्रत्यपाद्यन्त तेन ये ।
पर्षदामद्य तद्भोगः कालेनान्तर्धिमागतः ॥ १३२ ॥
१३२. उसने पर्षदों को प्रति लिंग पर जिन महाग्रामों को चढ़ाया था काल वस
उनका भोग आज नष्ट हो गया है ।
अकरोत्स महाहर्म्यैर्महालिङ्गैर्महावृषैः ।
महात्रिशूलैर्महतीं महामाहेश्वरो महीम् ॥ १३३ ॥
१३३. उस महा माहेश्वर ने इस पृथ्वी को महा भवनों, महा लिंगों, महा वृषों एवं
महा त्रिशूलों से महान् बनाया ।१
१३२ ( १ ) पर्षद्, परिषद् : परिषद् वैदिक
शब्द है । इसका शाब्दिक अर्थ चारों ओर बैठना
होता है । उपनिषदों में दार्शनिक विचारों के लिये
होने वाली गोष्ठी को परिषद् कहा गया है । उपनिषद्
का उपदेश नितरां निकटवर्ती लोगों को ही देते थे ।
उपनिषद् का एक अर्थ रहस्य होता है । इस
रहस्य को अत्यन्त निकटवर्ती परिषद् किंवा पर्षद् में
देते थे । उस चर्चा एवं ज्ञान का नाम ही उपनिषद्
हो गया । ( बृ० उ. ६ : १ : १, जै० श्रौ०
२ : ११ : १३, १४ तथा गो० गृ० सू० ३ : २ : ४०,
आचार्यों के साथ उनकी परिषद् का उल्लेख सर्वत्र
मिलता है ।
पर्षद् शब्द का अर्थ सभा तथा धर्मोपदेशक
पण्डितों का समाज होता है । हिन्दी में परिषद् तथा
पर्षद् को समानार्थक मानते हैं । परन्तु उनके भाव
तथा अर्थ में किंचित् भेद हैं । यहाँ पुरोहित किंवा
ब्राह्मणों के समूह अथवा समाज के अर्थ में ही कल्हण
ने पर्षद् शब्द का प्रयोग किया है ।
पुरोहितों की परिषद् थी । कल्हण के अनुसार
परिषद् के पुरोहितगण दान का स्वयं उपभोग
करने लगे थे । परिषदों की उपयोगिता समाप्त हो
गयी थी । आगे चलकर ब्राह्मणों तथा पुरोहितों की
इन परिषदों ने प्रायोपवेशन द्वारा राजा तथा मन्त्रियों
से कार्य निकालने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है ।
मन्दिरों तथा तीर्थों के पुरोहितगण परिषद् बनाते
थे । परिषद् के सदस्यों को पारिसद्य किंवा पारिषद
कहा जाता था । इस प्रकार के पारिषद जहाँ एक
ही मन्दिर से सम्बन्धित अनेक कुटुम्ब वंश के होते हैं
वे अबतक अपना अस्तित्व रखती हैं । हरपर्वत पर
शारिका देवी, क्षुव को ज्वालामुखी, अनन्तनाग,
विजयेश्वर वीरनाग, मत्तार मूला, कोटि तीर्थ
बारहमूला में पुरोहितों के कुल रहते हैं । उन्हें
कल्हण के शब्दों में स्थानपाला कहते थे । ( रा० त०
८।८११)
पुरोहित दक्षिणा यात्रियों से जो लेते हैं । यह एक
साथ मिलाया जाता है । भवनों तथा मन्दिरों के
प्रबन्ध के लिये खर्च काटकर वे परस्पर बांट लिया
करते हैं । उनके द्रव्य विभाजन का भाग निश्चित
रहता है । इसी प्रकार अग्रहार द्वारा प्राप्त सम्पत्ति
का भी प्रबन्ध तथा विभाजन परिषद् करती थी ।
उनका राजनीति पर विशेष प्रभाव था । कल्हण के
वर्णन ( रा० त० ५ : ४६५ तथा ८ : ९०० ) से
प्रकट होता है ।
१३१ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
५१ वाँ श्लोक है ।
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