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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 984 में से

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पृष्ठ 512

[द्वितीये तरंग] [३७९]

[बायाँ स्तम्भ]
विक्रमादित्य ५ लाख मुद्रा दान देना चाहता था।
परन्तु मन्त्रि परिषद् ने रोक दिया कि प्रजा का अप-
शब्द सुनना पड़ेगा। वार्दजलि जातक में कथा मिलती
है कि मन्त्रियों ने वार्दजलि को उसकी मूर्खता के
कारण युवराज नहीं बनने दिया।
अशोक कश्मीर का राजा था। अतएव कश्मीर
के शासन में वह मन्त्रि परिषद् जैसी संस्था को
किसी न किसी रूप में अवश्य रखा होगा। शक
राजाओं के समय में भी मन्त्रि परिषद् थी। शक
राजाओं ने कश्मीर पर शासन किया था। गुप्त काल
के पश्चात् उत्तर भारत में मन्त्रि परिषद् का उल्लेख
नही मिलता।
कल्हण के वर्णन से पता चलता है कि कश्मीर
में मन्त्रि परिषद् का कभी लोप नहीं हुआ। वह
अत्यन्त शक्तिशाली संस्था थी। निस्सन्देह उत्तर
भारत, उत्तर गुप्त काल में, केवल कश्मीर ही अपवाद
था। जहाँ मन्त्रि परिषद् सक्रिय थी।
शुंग काल में भी राजाओं ने मन्त्रि परिषद् को
कायम रखा था। दक्षिण भारत में चोल राज्य में
दसवीं शताब्दी तक कश्मीर के समान मन्त्रि परिषद्
सक्रिय एवं शक्तिशाली थी।
मन्त्रि परिषद् को राजा नियुक्त करता था।
नियुक्त मन्त्रियों के समवेत रूप का नाम मन्त्रि-
परिषद् था। कश्मीर में राजा ही मन्त्री नियुक्त
करते थे। सब मन्त्री मिलकर मन्त्रि परिषद् अर्थात्
मन्त्रि मण्डल बनाते थे। मन्त्री राजा के प्रति और
अप्रत्यक्ष रूप से जनता के प्रति उत्तरदायी था।
मन्त्रियों की शक्ति एवं प्रतिष्ठा उनके व्यक्तित्व पर
निर्भर थी। धर्मशास्त्र ही उनका विधि ग्रन्थ था।
नीति तथा स्मृतियों का उल्लंघन न तो मन्त्री कर
सकता था और न राजा। दोनों ही अपने अधिकार
की सीमा तत्कालीन प्रचलित नीति, स्मृति तथा धर्म
शास्त्रों से निर्धारित करते थे।

[दायाँ स्तम्भ]
राजा के शक्तिशाली होने पर 'राजयत्त तन्त्र'
तथा मन्त्रियों के शक्तिशाली होने पर 'सचिवायत्त-
तन्त्र' शासन कहा जाता था। सामान्य स्थिति का
नामकरण 'उभयायत्त' शासन कहा जाता था।
('मुद्राराक्षसः अंक ३; कथासरित्सागर १ : ५८-५९)
कश्मीर में मन्त्रियों ने अनेक राजाओं को राज-
सिंहासन पर बैठाया, अनेकों को सिंहासन से उतारा
है उनका उल्लेख यथा स्थान किया गया है।
मन्त्रियों ने राजा युधिष्ठिर को बन्दी गृह में रखा
और इसी वंश के प्रथित को राजसिंहासन पर
बैठाया। यह मन्त्रि परिषद् के अधिकार सीमा के
अन्तर्गत था। जिसका प्रयोग समय समय पर कश्मीर
में होता रहा है। यह नीति, स्मृति व्यवहार एवं
न्याय सम्मत था।
(२) प्रतापादित्य : श्री विलसन ने अभिषेक का
समय ईसापूर्व १६८ वर्ष ९ मास तथा समांकृत काल
ईसा पूर्व १० वर्ष तथा राज्य काल ३२ वर्ष माना है।
श्री स्टीन ने राज्याभिषेक काल कल्हण
के वर्ष गणनानुसार लौकिक संवत् २८९६ वर्ष तथा
राज्यकाल ३२ वर्ष रखा है। श्री एस. पी. पण्डित
ने यह समय ईसापूर्व १६९ वर्ष रखा है। श्री चन्द्रकान्त
बाली ने अपनी ज्योतिषगणना के अनुसार प्रतापादित्य
का सप्तर्षि संवत् ३७८५ तथा सन् १५ ई० दिया है।
आइने अकबरी में प्रतापादित्य का नाम
परतोपदत्त लिखा है। उसमें लिखा है कि वह
विक्रमादित्य का वंशज था। उसका राज्यकाल
अबुल फजल २३ वर्ष देता है।
हसन प्रतापादित्य के सन्दर्भ में लिखता है—
राजा प्रतापादित्य २८८६ क० बहुक्म सिकन्दर
और महल कश्मीर के इत्तफाक से हुकूमत कश्मीर
पर सरफरोज हुआ। और ममलकत और फौज
और रैय्यत को आराइश में जान दिल से कोशिश
की। तीस साल हुकूमत में गुजरे। (पृ०५२-५३)