राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७८ राजतरंगिणी
में 'रत्नी' शब्द का उल्लेख मिलता है। (पं०ब्रा०
१९ : १ : ४) 'रत्नी' को 'वीर' की पदवी से
सम्बोधित किया गया है। कालान्तर में यही 'रत्नी'
'राजरत्न' 'नवरत्न' आदि की सर्व श्रेष्ठ उपाधि
रूप से प्रयुक्त होने लगा।
वैदिक काल के 'रत्न' परिषद् में—पुरोहित,
पट्टरानी, युवराज, राजन्य, अक्षावाप, क्षत्ता, सेनानी,
सूत, संग्रहीता, रथकार आदि प्रमुख राज्याधिकारी
होते थे। 'रत्नियों' का स्थान बहुत ऊँचा माना
जाता था। वाजपेय यज्ञ काल में राजा 'रत्न बलि'
प्रदान हेतु स्वयं 'रत्नियों' के निवास स्थान पर जाता
था। वैदिक यज्ञों का प्रचार क्षीण होने के साथ ही
साथ, रत्नो वर्ग का अन्त हो गया। वायु पुराण में
रत्नियों को दो वर्गों में विभक्त किया गया था।
उन्हें सजीव तथा निर्जीव की संज्ञा दी गयी थी।
सजीव वर्ग में पट्टरानी, पुरोहित, सेनानी, सूत,
मन्त्री, आदि का समावेश होता था। निर्जीव वर्ग
में मणि, कृपाण, धनुष, भाला, रत्न, पताका एवं
कोपादि थे। (वायु० ५७ : ६८-७१)
कालान्तर में 'रत्नी' का स्थान एक अत्यन्त
प्रभावशाली संस्था ने ग्रहण कर लिया था उसे
'मन्त्रि परिषद्', 'अमात्य परिषद्' एवं 'साँचव
परिषद्' कहते थे। मगधराज अजातशत्रु, कोसल-
राज प्रसेनजित के समय मन्त्रियों का स्पष्ट उल्लेख
मिलता है। जातक कथाओ में भी इस प्रकार का
उल्लेख मिलता है। (जातक स० ५२८ तथा ५५३)
मौर्य एवं शुंग राजाओ की 'मन्त्रि परिषद्' थी,
(अर्थ शास्त्र : १; अशोक के अभिलेख स० ३ तथा
६ एवं मालविकाग्निमित्र नाटक अंक ५) पश्चिम
भारत में शक राजा मन्त्रिपरिषद् की मन्त्रणा से
राज्य शासन करते थे। उसके 'मन्त्रि सचिव' तथा
'कर्म सचिव' सदस्य होते थे। (रुद्रदामा का
जूनागढ़ शिलालेख) गुप्त राजाओ के अभिलेखों में
भी मन्त्रियों का उल्लेख मिलता है।
मन्त्रियों का अधिकार असीमित होता गया है।
शक्तिशाली राजा का मन्त्रिमण्डल उसका सलाह-
कार था। राजा उनकी मन्त्रणा की अवहेलना कर
सकता था। दुर्बल राजा पर मन्त्रिपरिषद् हावी हो
जाती थी। मौखरि वंश के निस्संतान होने पर,
मौखरिसामान्य का सिंहासन मन्त्रियों द्वारा हर्षवर्धन
को दिया गया था।
मन्त्रि परिषद् की संख्या निश्चित नहीं थी।
मनु के मतानुसार मन्त्रियों की संख्या सात या आठ
होनी चाहिए। (म० ७ : ५४) महाभारत का
मत है कि मन्त्रियों की संख्या आठ होनी चाहिए।
'अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारयेत्।'
अर्थशास्त्र में उल्लेख आता है—मानव सम्प्र-
दाय १२; बार्हस्पत्य पंथी १६; औशनस पंथी २०
मन्त्रियों की संख्या देते हैं। (अ १ : १५) शुक्रा-
चार्य १० राज्य की प्रकृति में मन्त्रियों की गणना
करते हैं। (शु० २ : ६९-७९) किन्तु मनु एवं
कौटिल्य इस विषय पर एक मत हैं कि मन्त्रियों की
संख्या देश के विस्तार एवं समय की आवश्यकता-
नुसार होनी चाहिए। शुक्राचार्य मन्त्रिमण्डल में
पुरोहित का रखना आवश्यक नही मानते हैं।
(शुक्र० : २ : ७२) किन्तु शुक्र का कथन है कि
पुरोहित का भय प्रदर्शन ही राजा को सुपथ पर
लाने के लिये पर्याप्त था। (शुक्र० २ : ९९)
अशोक के तृतीय तथा षष्ठ अभिलेखों से 'मन्त्रि
परिषद्' की कार्य प्रणाली पर प्रकाश पड़ता है। षष्ठ
लेख से स्पष्ट पता चलता है कि अमात्यों के निर्णय
पर, मन्त्रि परिषद् पुनर्विचार कर सकती था।
सम्राट् के आदेशो में भी परिषद् आवश्यकतानुसार
संशोधन करती थी। परिषद् में मत वैभिन्नय होने पर
सम्राट् अशोक का निर्णय अन्तिम माना जाता था।
एक स्थान पर अशोक के दान पर उसकी मन्त्रि-
परिषद् ने सीमा लगा दी थी। युवान च्वांग ने
पर्यटन संस्मरण में लिखा है कि श्रावस्ती का राजा