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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 984 में से

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पृष्ठ 504

सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है कि स्त्री का
मूल पुरुष से भिन्न नहीं है। (कि० : ३४ : ३८)
ऋग्वेद में यद्यपि अर्धनारीश्वर शब्द का
उल्लेख नहीं मिलता, तथापि उसकी कल्पना मिलती
है। पुरुष एवं प्रकृति इस सृष्टि प्रक्रिया के केन्द्र
बिन्दु हैं। प्रतीकात्मक स्वरूप हैं। इसकी व्यंजना
स्पष्ट प्रतीत होती है। द्यावा-पृथ्वी लोक की
मध्यवर्ती सृष्टि हैं। माता-पिता, योषा-वृषा प्राण हैं।
अग्नि-सोम, पुरुष-स्त्री हैं। पति-पत्नी के द्वन्द्व द्वारा
प्राणी जगत् का सृजन होता है।
पुरुष में अग्नि तत्त्व तथा स्त्री में सोम तत्त्व
प्रधान है। स्त्री के आभ्यंतर में अर्धभाग पुरुष का
विद्यमान रहता है। जहाँ अग्नि है। वहीं अर्धभाग
सोम है। अतएव ऋग्वेद (१ : १६४ : १६)
कहता है—'स्त्रियः सतींस्वा उ मे पुंस आहुः।' स्त्री
का शोणित आग्नेय एवं पुरुष का शुक्र सौम्य भाव से
युक्त रहता है। शुक्र एवं शोणित ही वैज्ञानिक
भाषा में वृषा एवं योषा अर्थात् नर-नारी है। स्त्री
तथा पुंलिंग हैं।
सृष्टि के इस आदि भूत मातृत्व एवं पितृत्व को
प्रतीक रूप में पुराणों में पार्वती एवं परमेश्वर कहा
गया है। शिव पार्वती ही रुद्र एवं अम्बिका हैं।
शतपथ ब्राह्मण (५ : ३ : १ : १०) में उल्लेख
है—'अग्निर्वै श्नितः।' इसी को तैत्तिरीय ब्राह्मण
दुहराता है—'एवं रुद्र. यदग्निः।' (१:१:५:८-६)
ऋग्वेद कितनी वैज्ञानिक भाषा में कहता है -
'अग्निर्जगतितमयं सोम आह तवाह्मस्मि सहर्
न्योकाः।' (५ : ४४ : १५) अग्नि एवं सोम
जगत् के माता पिता है। अग्नि अन्नाद है। सोम
उसका अन्नरूप द्वारा संभरण करता है।
सृष्टि रचना के लिये पुरुष एवं स्त्री दोनों तत्त्व
अनिवार्य हैं। वनस्पति से लेकर समस्त प्राणधारियों
की उत्पत्ति इन दोनों तत्त्वों के मिलन का परिणाम
हैं। पुरुष नारी में बीज वपन करता है। नारी
गर्भ में पुरुष के अग्निकण को लेकर सम्वर्धन करती
है। वह बीज विराट रूप धारण करता है। बीज
की शक्ति के अनुसार, जो मात्रा का आधान करती
है, वही माता है। वही पिता एवं माता शिव एवं
शक्ति के प्रतीक हैं।
शक्ति विहीन शिव रुद्र हैं। उनका स्वरूप
घोर हो जाता है। शक्ति के साथ मिलने पर उनका
स्वरूप शिव होता हैं। इसे दूसरी तरह से समझे
तो अर्थ होगा। यदि अग्नि को सोम स्वरूप अन्न
प्राप्त नही होता, तो वह जिसमें रहती हैं, उसी
को भस्म करती हैं। यह रुद्र रूप है। यह संहार का
स्वरूप है। किन्तु अग्नि में सोम की आहुति याग
है। इस यज्ञ का स्वस्ति भाव होता है। वह स्वस्ति
भाव शिव-शक्ति किंवा अग्नि-सोम का समन्वित रूप
है। यही अर्धनारीश्वर है।
वैदिक साहित्य में नैसर्गिक एवं व्याधि-जनित
उत्पात-संहारक देवता को रुद्र कहा गया है। किन्तु
उन्हीं उत्पातों का शमनकारी देवता शिव बन
गया है। अतएव रुद्र एवं शिव एक ही देव के रौद्र
एवं शान्त स्वरूप हैं।
कालान्तर में रुद्र के नाम, रुद्र, भव, शर्व (शिव)
पशुपति, भीम, ईशान, उग्र एवं महादेव पड़ गये।
रुद्र की पत्नी सुवर्चला किंवा सती, पुत्र शनिश्चर
तथा निवास स्थान सूर्य, भव की पत्नी उमा (उषा)
पुत्र शुक्र निवास स्थान जल; शर्व (शिव) की पत्नी
विकेशी, पुत्र मंगल, निवास स्थान मही, पशुपति की
पत्नी शिवा, पुत्र मनोजव, निवास स्थान वायु, भीम
की पत्नी स्वाहा (स्वधा) पुत्र स्कन्द निवास स्थान
अग्नि; ईशान की पत्नी दिशा, पुत्र स्वर्ग, निवास
स्थान आकाश; उग्र की पत्नी दीक्षा, पुत्र संतान,
निवास स्थान यशीय ब्राह्मण तथा महादेव की पत्नी
रोहिणी, पुत्र बुध और निवास स्थान चन्द्र कहा गया
है। यही अष्ट रुद्र हैं। (विष्णु० १:८; माव०
४९; पद्म०, सृ० ३; वायु, २७; स्कन्द ७ : १ : ८७)
इस रूप में प्रत्येक के साथ शक्ति स्वरूप पत्नी
है। सभी पार्वती किंवा आदि शक्ति की प्रतीक हैं।