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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 984 में से

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पृष्ठ 505

३७४ राजतरंगिणी
भूयो राज्यार्जनोद्योगस्तेनात्यज्यत भूभुजा ।
जरसा शमिशवाण्या च कर्णमूलमवाप्तया ॥२॥
२. अपनी जरावस्था तथा शमियों १ की श्रुत वाणी के कारण उस राजा ने पुनः राज्य
प्राप्ति का उद्योग त्याग दिया।
अनयद्विनयोदातः समं स्वविषयेण तान् ।
विषयान्वशिनाग्र्यः स तान्पश्चादपि विस्मृतिम् ॥३॥
३. जितेन्द्रियों में अग्र एवं विनयोदात्त उस राजा ने विषय१ (स्वदेश) के साथ अपने
पंचेन्द्रिय विषयों को भी विस्मृत कर दिया।


[बायाँ स्तम्भ]
शिव के साथ उनकी अर्धांगिनी हैं। वह अलग नहीं
सचमुच एक ही शरीर, एक ही विश्व, एक ही
ब्रह्माण्ड के पुरुष एवं शक्ति, सृष्टि के मूल कारण
नर-नारी हैं। मूलतः प्रजापति एक थे। अकेले थे।
उनमें सृष्टि रचना का संकल्प उदय हुआ। उन्होंने
अपने शरीर के दो खण्ड कर दिये। उसमें एक
अर्धभाग स्त्री एवं दूसरा भाग पुरुष हुआ। अर्ध-
नारीश्वर सृजन स्रोत के प्रतीक हैं। वह मिलन
के साकार स्वरूप हैं।
अर्धनारीश्वर की अनेक मूर्तियाँ मिलती हैं।
एक प्रभावशाली मूर्ति एलोरा के कैलास मन्दिर में
हैं। अब तक उपलब्ध सबसे प्राचीन मूर्ति मथुरा
संग्रहालय में प्रथम शती कुशान कालीन है।
दक्षिण पूर्व एशिया का मैंने पर्याप्त पर्यटन किया
हैं। यह आदि शक्ति हैं कम्बूज के एंगकोर वाट में
दारु, पाषाण एवं मृण्मयी अनेक मूर्तियाँ मैंने अर्धना-
रेश्वर की देखीं हैं। श्याम अर्थात् थाईलैण्ड में अर्ध-
नारीश्वर की मूर्ति तथा उसका पूजन किसी समय
खूब प्रचलित था। (द्रष्टव्य हैं दक्षिण पूर्व एशिया )
पाठभेद :
श्लोक संख्या २ में 'जरसा' का 'रजसा' और
'शमि' का 'दमि' पाठभेद मिलता है।
२. (१) शमी : शमी का अर्थ शान्त, संयमी
तथा जितेन्द्रिय होता है। स्वदोषों को शमन करने
वालो को शमी कहते हैं।


[दायाँ स्तम्भ]
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३ मे 'दातः' का पाठभेद 'दातुः'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३ (१) विषय, विशः-विषय : वैदिक काल
में एक समिति थी। समिति का अर्थ एक स्थान पर
सबका एकत्रित होना था। एक समिति जन-
साधारण की 'विशः' थी। राष्ट्रीय सभा थी। वैदिक
काल में हिन्दू समाज जनो अथवा वर्गों में विभक्त
था। यथा-मनु, यदु, कुरु। साथ ही वे लोग
यह भी समझते थे। हमलोग एक ही जाति के हैं।
क्योकि वे सब लोग अपने आपको आर्य कहते थे।
वर्गों के लोग 'विशः' कहलाते थे। जिससे वैश्य
शब्द निकला है।
यूनानियों ने भारत पर आक्रमण किया।
भारतीयों के सम्पर्क में आये। परन्तु पंजाब से
आगे नहीं बढ़ सके। यूनानी लेखको ने राष्ट्र
एवं विशः को एक ही माना है। ये प्रत्येक राज्य
के नागरिको को विशः की संज्ञा देते हैं। सिन्ध
तथा पंजाब के प्रायः सभी राज्यों के विषय में
उन्होंने यही कहा है। किन्तु भारतीय लेखक उन्हें
जनपद तथा देश कहते थे। (पाणिनि : ४ : १ :
१६८-१७०) कल्हण ने विषय शब्द का प्रयोग
देश किंवा उसके राजा के सम्बन्ध में किया है।
विषय, विश्य अथवा विशः निसन्देह देश एवं राज्य