राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३७१
एक अनुवादकर्ता ने शिव के धनुष का नाम
'अजगव' दे दिया है। किन्तु शिव के धनुष अर्थ में
यहाँ यह शब्द बैठता नहीं। गणेश तथा धनुष
दोनों शिव के पास थे। इसे हम एक रूपक भी
इस प्रकार मान सकते हैं कि भगवान् शिव के पार्श्व
में बुद्धि के प्रतीक गणेश तथा शक्ति का प्रतीक
धनुष दोनो उपस्थित हैं। वह शास्त्र एवं शस्त्र
दोनो से समन्वित हैं। शिव ने किरात रूप में अर्जुन
से युद्ध कर अपनी अपार शक्ति का परिचय दिया
था। बुद्धि अर्थात् गणेश तो उनके पुत्र ही हैं।
गणेश : गणेश वैदिक शब्दो में ब्रह्मणस्पति
भी है। वह शंकर तथा पार्वती की सन्तान
होने पर भी अयोनिज है। (ब्रह्म वै० पु० ८
तथा लिंग० १०२, पार्वती ने अपने शरीर के
उबटन की मूर्ति बनाकर उसे सजीव किया था।
(पद्म० सृः ४३ ; स्कन्द० ७:१:३८ ; मत्स्य०
१५३) ।
प्रत्येक युगों में गणेश के अवतार, उनका
नामादि भिन्न माना गया है। कृत अर्थात् सत्युग
में गणेश कश्यप पुत्र विनायक थे। उनका वाहन
सिंह था। इस अवतार काल में देवांतक
नरांतक का दलन किया था। त्रेतायुग में शिवपुत्र
मयूरेश्वर तथा वाहन मयूर था। सिंधू का संहार
किया था। द्वापर युग में शिवपुत्र गजानन हुए थे।
सिंदूर का विनाश किया था। अरण्य राजा को
गणेश गीता सुनाया था। कलियुग में अश्वारूढ
धूम्रकेतु नाम नाग में अदिति के गर्भ से जन्म लेंगे।
महोत्कट रूप में म्लेच्छों का संहार करेंगे। (गणेशः
२:१-६)।
गणेश के एकदंत होने का कारण दिया गया
है। भगवान् परशुराम ने शंकर-द्वारा प्रदत्त परशु गणेश
पर फेंका। परशु शंकर का था। पिता का था
अतएव उसका प्रतिकार नही किया जा सकता था।
दाँत पर आक्रमण सह लिया। एक दाँत टूट गया।
परशु हाथ में ले लिया। उस समय से उनका एक
आयुध हो गया। यही कारण है। गणेश के हाथों
में परशु आयुध बना मिलता है। कश्मीर में प्राप्त
मूर्तियों में परशु आयुध दिखाया गया है।
हाथी का मस्तक लगने की भी एक कथा है।
भगवती पार्वती स्नान कर रही थी। गणेश द्वार
पर बैठे थे। गणेश द्वारपाल किंवा रक्षक का कार्य
कर रहे थे। शंकर का प्रवेश रोक दिया।
शंकर क्रुद्ध हो गये। पिता-पुत्र का संघर्ष होने
लगा। शंकर ने गणेश का मस्तक तोड दिया।
पार्वती के आग्रह पर, शंकर ने मानव मस्तक के
स्थान पर इन्द्र के गज का मस्तक लाकर, लगा
दिया। उस समय से उनका नाम गजानन
हो गया। (शिव० कु० १६) एक कथा और है।
शनि के दृष्टिपात से गणपति का मस्तक भस्म हो
गया। देवताओं ने उसके स्थान पर हाथी का
मस्तक लगा दिया। (ब्रह्मवै० ३:१८ भवि०,
प्रति० ४:१२)
गणपति को सिंदूर प्रिय है। हनुमान की मूर्ति
के समान उनकी मूर्ति पर सिंदूर का लेपन किया
जाता है। गणपति वध करेंगे, यह कल्पना उठते
ही, सिन्दूरासुर ने गणपति को उठाकर नर्मदा में
डाल दिया। गणपति के रक्त से नर्मदा का जल
रक्तिम हो गया। कालान्तर में गणपति ने सिन्दूरा-
सुर का वध किया। उसका लाल रक्त शरीर में
लेप किया। उनका समस्त शरीर सिन्दूर के रक्त
से रक्त वर्ण हो गया। (गणेश० २:१३७)
गणेश की सिद्धि तथा बुद्धि दो पत्नियां हैं।
(गणेश० : १:१५) इनकी उपासना से कार्तवीर्य
अद्यंग हुआ था। (गणेश० : २ : ७३-८३) गणेश
चतुर्भुज है। उनका वाहन मूषक है।
गणपति का एक रूप निकुंभ है। वाराणसी
स्थित निकुंभ की उपासना करने पर भी दिवोदास
की पत्नी सुयशा को पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। दिवोदास
क्रोधित हो गया। निकुंभ मन्दिर ध्वस्त करा दिया।