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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 984 में से

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पृष्ठ 501

३७० राजतरंगिणी
अन्य धातुओं से भी धनुष बनाये जाते थे।
धनुष का दण्ड बनाने में भैंस, गंडा, शरभ की
सींग तथा चन्दन, शाल, बेंत, ककुभ अथवा धवल
की लकड़ी का भी प्रयोग होता था। अग्निपुराण
में धनुष का विशद वर्णन किया गया है।
धनुष की डोरी को प्रत्यंचा कहते हैं। प्रत्यंचा
तांत, बाँस या अन्य रेशेदार पदार्थों से बनायी जाती
थी। चाणक्य ने मुर्वी, मुंज, घास, अर्क, सन, गवेधु
तथा स्नायु तन्तुओं से प्रत्यंचा बनाने का वर्णन
किया है।
धनुष का दण्ड ६ फुट का उत्तम माना जाता
है। उससे कम का निम्न श्रेणी का होता है। आर्ष
काव्य कालीन धनुष का दण्ड ५॥ फुट तथा बाण
३ फिट का होता था। धनुष का दण्ड दो प्रकार का
होता था। साधारण धनुष में दण्ड के दोनों छोरों
को प्रत्यंचा से सम्बन्धित कर दिया जाता है। यह
सुगमता से बन जाता है। दूसरा प्रकार दण्ड में
दोनों छोर अर्ध वृत्ताकार धनुष के दोनों ओर दण्ड
अर्धचन्द्राकार से उठे रहते थे। उनके छोर पर
प्रत्यंचा लगा दी जाती थी। धनुष छोड़ते समय
प्रत्यंचा दोनों छोरों पर घूमे अर्धचन्द्राकार दण्ड पर
शक्ति से चढ़ायी जाती थी। इसे प्रत्यंचा का
चढ़ाना कहते हैं। यह धनुष दण्ड बाँस का भी
बनता था। उसे अग्नि से सिकाकर अर्धवृत्ताकार
दोनों छोरों पर बना देते थे। किन्तु इस प्रकार का
धनुष धातु का अधिक होता था। मध्ययुग में इस
प्रकार धातु निर्मित धनुष बहुत प्रचलित थे।
धनुष के झुकाव अर्थात् चाप का भी वर्णन
मिलता है। चाप के अनुसार प्रत्यंचा भारी या हल्की
होती थी। 'कोदण्ड मण्डन' में १८ प्रकार के धनुषों
का उल्लेख मिलता है। चाप का विभिन्न भार भी
दिया गया है। योगिन् के धनुष का भार २०० पल
तथा दूर प्रहार वाले धनुष का भार ९५० या
१००० पल दिया गया है। नीति प्रकाशिका में
१४ प्रकार के चापों का वर्णन मिलता है।
वैदिक आर्यों का मुख्य आयुध धनुष था। उसका
इतना महत्त्व था कि मृतक के दाहिने हाथ में धनुष
रख दिया जाता था। दाह क्रिया के पूर्व, उसके हाथ
से धनुष ले लिया जाता था ताकि वह भस्म न
हो जाय। उसे मृतक द्वारा प्रदत्त धातो समझते थे।
धनुर्ज्या को कस देने पर धनुष के दोनों अग्र
भागों को अर्त्नी कहते थे। अप्रयोगावस्था में प्रत्यंचा
उतार देते थे। चलाने के समय कस दिया जाता था।
(ऋ० १० : १६६ : ३) कान के समीप तक धनुर्ज्या
को खींचकर छोड़ते थे। अतएव उसे कर्णयोनि कहा
जाता था। ऋ० ६:७५ : २ तथा ऋ० : २ : २४ : ८
ग्रीक अर्थात् यूनानी कवि होमर के वर्णन के
अनुसार धनुष को वक्षस्थल तक खींचकर छोड़ते थे।
अर्थात् भारतीय तथा पाश्चात्य धनुष चलाने में यह
भेद था। ( इलियड ४:१२५ )
धनुष भारत से विश्व में चारों ओर फैला था।
भारत से ईरान होता पश्चिमी एशिया तथा वहाँ
से यूनान, रोम, मिश्र तथा यूरोप में पहुँचा था।
भारतीय सैन्य विज्ञान का नाम ही धनुर्वेद दे दिया
था। यूनानियों के साथ पर्शिया का युद्ध प्राचीन
काल में कई बार हुआ था। उसमें भारतीय धनुष
विद्या विशारदों ने भाग लिया था। उन्हें सर्वश्रेष्ठ
धनुर्धर माना गया था। धनुष विद्या भारत में
अत्यन्त विकसित थी।
कल्हण यहाँ पर धनुष के अग्र भाग में अज तथा
गाय के सींग अर्थात् श्रृंग लगने का उल्लेख करता
है। प्राचीन काल में धनुष के दोनों सिरों को दृढ़
और मजबूत बनाने के लिए, सींग तथा किसी धातु
को जड़ कर, उसे अधिक टिकाऊ बना देते थे।
डोरी अथवा प्रत्यंचा को चढ़ाने के लिये उसमें खाँचा
बना रहता था। उसमें प्रत्यंचा लगा दी जाती थी।
कश्मीर में गाय तथा अज का सींग, भैस, भैंसा,
गैंडा तथा शरभ की अपेक्षा छोटा होता था। वह
धनुष दण्ड बनाने के अयोग्य था। अतएव उसे दोनों
छोरों पर लगाया जाता था।