राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 499, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें३७० राजतरंगिणी
अन्य धातुओ से भी धनुष बनाये जाते थे ।
धनुष का दण्ड बनाने में भैस, गंडा, शरभ की
सींग तथा चन्दन, शाल, बेंत, ककुभ अथवा धवल
की लकड़ी का भी प्रयोग होता था। अग्निपुराण
में धनुष का विशद वर्णन किया गया है।
धनुष की डोरी को प्रत्यंचा कहते हैं। प्रत्यंचा
तांत, बाँस या अन्य रेशेदार पदार्थों से बनायी जाती
थी। चाणक्य ने मुर्वी, मुंज, पास, अर्क, सन, गवेधु
तथा स्नायु तन्तुओ से प्रत्यंचा बनाने का वर्णन
किया है।
धनुष का दण्ड ६ फुट का उत्तम माना जाता
है। उससे कम का निम्न श्रेणी का होता है। आर्ष
काव्य कालीन धनुष का दण्ड ५॥ फुट तथा बाण
३ फिट का होता था। धनुष का दण्ड दो प्रकार का
होता था। साधारण धनुष में दण्ड के दोनों छोरों
को प्रत्यचा से सम्बन्धित कर दिया जाता है। यह
सुगमता से बन जाता है। दूसरा प्रकार दण्ड में
दोनों छोर अर्ध वृत्ताकार धनुष के दोनों ओर दण्ड
वैदिक आर्यों का मुख्य आयुध धनुष था। उसका
इतना महत्त्व था कि मृतक के दाहिने हाथ में धनुष
रख दिया जाता था। दाह क्रिया के पूर्व, उसके हाथ
से धनुष ले लिया जाता था ताकि वह भस्म न
हो जाय। उसे मृतक द्वारा प्रदत्त थाती समझते थे।
धनुर्ज्या को रूप देने पर धनुष के दोनों अग्र
भागों को अर्त्नी कहते थे। अप्रयोगावस्था में प्रत्यंचा
उतार देते थे। चलाने के समय रूप दिया जाता था।
(ऋ० १० : १६६ : ३) कान के समीप तक धनुर्ज्या
को खींचकर छोड़ते थे। अतएव उसे कर्णयोनि कहा
जाता था। ऋ० ६:७५ : २ तथा ऋ० : २:२४ :८
ग्रीक अर्थात् यूनानी कवि होमर के वर्णन के
अनुसार धनुष को वक्षस्थल तक खींचकर छोड़ते थे।
अर्थात् भारतीय तथा पाश्चात्य धनुष चलाने में यह
भेद था। (इलियाड :४:१२५)
धनुष भारत से विश्व में चारों ओर फैला था।
भारत से ईरान होता पश्चिमी एशिया तथा वहाँ
से यूनान, रोम, मिस्र तथा यूरोप में पहुँचा था।