राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 984 में से
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३४८ राजतरङ्गिणी
अन्यांश्चानीय देशेभ्यः पुण्येभ्यो वश्चिकादिषु ।
पावनानग्रहारेषु ब्राह्मणान्स न्यरोपयत् ॥ ३४३ ॥
३४३. उसने पुण्यदेशों¹ से अन्य पवित्र ब्राह्मणों² को लाकर वश्चिक³ आदि अग्रहारों में
बसाया।
उत्तमो लोकपालोऽयमिति लक्ष्म प्रशस्तिषु ।
यः प्राप्तवान्विना यज्ञं चक्षमे न पशुक्षयम् ॥३४४॥
३४४. जिसने प्रशस्तियों¹ में यह 'उत्तम लोकपाल है', उपाधि प्राप्त की थी। यज्ञ के
अतिरिक्त पशु क्षय² वह सहन नहीं कर सकता था।
है। मैं स्वयं नहीं खाता। सनातनी ब्राह्मण गण
आज भी लहसुन प्याज का भक्षण नहीं करते। उन्हें
अभक्ष्य माना गया है। वैष्णव तथा वैश्य वर्ग में एक
बहुत बड़ा समाज लहसुन तथा प्याज से परहेज
करता है। मारवाड़ी बासा में अबतक प्याज एवं
लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता।
(२) भूक्षीर वाटिका: वर्तमान बुछो
और प्राचीन भूक्षीर वाटिका स्थान है। यह पतला
भूखण्ड है। शंकराचार्य पर्वत के मूल में उत्तर-
पश्चिम स्थान से डल के एक भाग गगरी बल तक
फैला है। 'वोर' शब्द संस्कृत वाटिका का अपभ्रंश है।
भूका अर्थ भूमि, क्षीर का अर्थ दूध, तथा वाटिका का
अर्थ छोटा उद्यान होता है। शुद्ध संस्कृत नाम।
सम्भव है वहाँ पर ऐसे वृक्ष हैं जिनके पत्ते या
डंठल तोड़ने पर गूलर, वटादि की तरह दूध
निकलता रहा हो।
(३) खासटा : इस स्थान को सुदर बल के
समीप होना चाहिए। निश्चयात्मक रूप से नहीं
कहा जा सकता कि वास्तव में यह स्थान कहाँ
पर था। पृष्ठ १९० सुदर बल टिप्पणी द्रष्टव्य है।
३४३ (१) पुण्यदेश : यहाँ पर पुण्यदेश का
प्रयोग महत्वपूर्ण है। राजा सम्भवतः कश्मीर को
पुण्यदेश इसलिये नहीं समझता था कि वहाँ के
ब्राह्मणादि आचारभ्रष्ट हो गये थे। कई बार वहाके
ब्राह्मणो के सुधार की चेष्ट की गयी। कितनी ही
बार ब्राह्मण बाहर से लाकर कश्मीर में बसाये गये
परन्तु प्रतीत होता है कालान्तर मे आने वाले ब्राह्मण
भी स्थानीय ब्राह्मणों से मिलकर आचार का त्याग
कर देते थे। अतएव राजा कश्मीर के बाहर
'पुण्यदेश' उत्तरी भारत के तीर्थस्थानों आदि से लाकर
ब्राह्मण कश्मीर में बसाये।
(२) पवित्र ब्राह्मण : कश्मीर की तुलना
में पुण्यदेश के ब्राह्मणों को पवित्र कहा गया
है। पवित्र ब्राह्मण का यहाँ अर्थ—विद्वान्, आचार-
नियम स्वाध्यायप्रिय, पठन-पाठन-यज्ञादि कर्मकाण्ड
में पारंगत ब्राह्मणों से है।
(३) वश्चिक : यह वर्तमान गांव उची
है। रामख्यार नदी की पूर्व दिशा मे अधोभाग मे है।
सन् १८९१ में पं० काशीराम को यहाँ कुछ
खण्डित मूर्तियां मिली थीं। उनके अनुसार स्थान
विशेष प्राचीन महत्व नहीं रखता था। मात्र एक
देवस्थान रूप में स्थित था। इसके पूर्व में नदी कुछ
दूर पर पड़ेगी। उत्तर मे रामख्यार नदी है। पश्चिम
मे दुरवाग तथा सपनगर हैं। दक्षिण मे अवन्ती है।
यह विजयेश्वर के पश्चिम पड़ता है।
३४४. (१) प्रशस्ति : निसन्देह गोपादित्य
ऐतिहासिक व्यक्ति था। उसके नाम से सम्बन्धित
गोपाद्रि पर्वत, गोपपुर (गोपा अग्रहार) तथा
अनेक स्थान हैं। शंकराचार्य पर्वत पर स्थित
मन्दिर इस राजा का निर्माण था। यहाँ पर,