राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 455, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ राजतरंगिणी
देव्या कुलतरोः कन्दः क्षितिनन्दोऽवशेषितः ।
ततस्तस्य सुतस्त्रिंशद्वत्सरानन्वशान्महीम् ॥ ३३६ ॥
क्षितिनन्द—
३३६. देवी की कृपा से वंश वृक्ष का मूल क्षितिनन्द बच गया था । उस के पुत्र ने
तीस वर्ष तक भूमि का शासन किया ।
द्वापञ्चाशतमब्दान्क्ष्मां द्वौ च मासौ तदात्मजः ।
अपासीद्वसुनन्दाख्यः प्रख्यातस्मरशास्त्रकृत् ॥ ३३७ ॥
वसुनन्द—
३३७. प्रसिद्ध कामशास्त्र² प्रणेता उसके पुत्र वसुनन्द ने बावन वर्ष दो मास³ धरती की
रक्षा की ।
३३६ (१) आइने अकबरी में 'कुलनुन्द'
नाम तथा उसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया गया है ।
हसन लिखता है—'राजा शितोनन्द क० २४८२ में
अराकीन हुकूमत मुत्तफिक मशविरा से तख्त पर बैठा
और तीस साल हुकूमत किया ।'
(२) क्षितिनन्द : श्री स्टीन के अनुसार
लौकिक संवत् २५०५ वर्ष ४ माह १३ वें दिन राज्य
सिंहासन पर बैठा था । श्री एस० पी० पण्डित ने
यह समय ईसा पूर्व ५७४ वर्ष दिया है । वक
का पुत्र नहीं था । सम्भव है राजा वक का सम्बन्धी
रहा हो । क्योंकि राजा के पुत्र तथा पौत्र सभी
भट्टा द्वारा बलि चढ़ा दिये गये थे ।
३३७ (१) आइने अकबरी में 'विशनुन्द'
नाम तथा उसका राज्यकाल ५२ वर्ष दो मास
दिया गया है ।
श्री स्टीन के अनुसार लौकिक २५३५
वर्ष ४ मास १३ वें दिन राजा ने राज्यरोहण
किया था । श्री एस० पी० पण्डित ने वह समय ईसा
पूर्व ५४४ वर्ष दिया है ।
हसन—राजा वसुनन्द क० २५०२ में बाप के
कायम मुकाम रौनक बख्श तख्त बादशाही हुआ ।
इन्तहाई राजा था । अक्लमन्द और बाहोश आदमी
था । अक्लमन्द और आलिमों की कदर व
मन्जिलत हद से ज्यादा करता था । किताबों से
उस राजा का इश्क था । बावन बरस हुक्मरान
रहकर आलम मे हमेशा के लिये रुख़सत हो गया ।
पृष्ठ ४० ।
(२) काम किंवा स्मरशास्त्र : वसुनन्द के इस
प्रख्यात ग्रन्थ का अभी तक पता नहीं चला है ।
उसका उल्लेख अन्य ग्रन्थों में अवश्य मिलता है ।
स्मर का अर्थ, स्मृति, स्मरण, प्रेम, प्रणय तथा
कामदेव होता है । स्मर एक राग भी है । स्मरशास्त्र
का अर्थ कामशास्त्र होता है । मरीचि तथा उर्णा के पुत्रों
में से वह एक था । किन्तु यहाँ पर अर्थ कामशास्त्र
ही है । 'दशकुमार चरितम्' में दण्डी ने कामशास्त्र
के लिये 'अनङ्ग विद्या का प्रयोग किया है । २ : ६
(३) राज्यकाल : श्री रणजीत सीताराम पण्डित
ने अपने राजतरंगिणी के अनुवाद के पृष्ठ ५८१ पर श्री
एस०पी० पण्डित के लेख को उद्धृत किया है । उनके
अनुसार राज्यकाल केवल बावन वर्ष दिया गया है ।
दो मास और अधिक नहीं जोड़ा गया है । परन्तु
श्री स्टीन तथा सीताराम पण्डित दोनों ने अनुवाद में
५२ वर्ष २ मास राज्यकाल का अनुवाद किया है ।
अतएव यहाँ भी मूल का अनुवाद जो ५२ वर्ष दो
मास आता है दिया गया है ।