राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३३७
कर्मेणा तेन सिद्धाया व्योमाक्रमणसूचकम् ।
जानुमुद्राद्वयं तस्या दृषदद्यपि दृश्यते ॥ ३३४ ॥
३३४. उस कर्म द्वारा सिद्ध उस योगेश्वरी के व्योम गमन सूचक, दोनों जानुओं की मुद्रा,
शिला पर आज भी देखी जाती है ।
देवः शतकपालेशो मातृचक्रं शिला च सा ।
खेरीमठेषु तद्वार्तास्मृतिमद्यापि यच्छति ॥ ३३५ ॥
३३५. देव, शतकपालेश, मातृचक्र तथा वह शिला खेरी १ के मठों २ मे आज भी उस वार्ता
की स्मृति दिलाती है ।
कल्हण देवीचक्र का उल्लेख करता है न कि मातृ-
चक्र का । अतएव 'देवी' तथा 'मातृचक्र'
में निश्चय उस समय अन्तर रहा होगा ।
अनुवादकर्ताओं ने इसका अनुवाद किया है
कि देवीचक्रपर राजा को बलिदान कर दिया गया
था । यहा पर बलि शब्द का प्रयोग न कर 'उप-
हार' शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है । 'बलि'
तथा 'उपहार' में अन्तर है । बंगाल में बलि चढ़े पशु
के मांस को महाप्रसाद कहते हैं। शाक्त लोग 'प्रसाद'
ही ग्रहण करते हैं । अन्य मांस उनके लिये वर्जित है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३३४ में 'दृषदद्यपि का 'दृश-
द्यदापि' तथा 'दृष्ट्यद्यापि' पाठभेद मिलता है ।
श्लोक संख्या ३३५ में 'खेरीमठेषु' का 'क्षीर-
मठेषु' तथा 'खैरेमठेषु' और 'यच्छति' का पाठभेद
'गच्छति' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३३५ (१) खेरी : राजतरंगिणी के तरंग
८ : १२६८ श्रीवर ३ : १८७ तथा ४ : ४४८ से
यह स्पष्ट हो गया है कि खेरी एक जिला का नाम
था । इसे परगना खुरनार वाव कहते हैं । यह
गुलाबगढ़ तथा पीर पन्तमल के मुह दर्रा की ढालुआ
उपत्यका मे विसाऊ नदी तक फैला है । गाँव खुर
सर्वेक्षण मानचित्र में कूरी दिखाया गया है ।
खुर तथा खेरी को समान उच्चारण के कारण
एक नहीं कहा गया है । कल्हण ( रा० त०
४३
८ : १२६० ) तथा श्रीवर ( ४ : ४४८ ) ने खेरी
का उल्लेख परगना देबसरसा ( दिवशर ) और
अर्धवान ( अदविन ) के सन्दर्भ में किया है। दोनों
परगना विसाऊ नदी के उत्तर खुर नारवाव मे
मिलते हैं । इसका प्रशासन विशेष रूप से किया
जाता था । यह कल्हण के 'खेरी कार्य' शब्द प्रयोग
मे प्रकट होता है । ( रा० त० ८.९६०, १११८,
१४८२, १६२४ ) । सिख तथा डोगरा राजकाल
में खुर नरवाव जागीर पुरानी प्रथा के अनुसार
राजवंशियों को दी गयी थी ।
(२) मठ : कल्हण ने किस स्थान के लिए
खेरो मठ शब्द का व्यवहार किया है कहना कठिन
है । यहाँ से दरों तक पहुँचने के लिए चलता रास्ता
है । सम्भव है । खेरो मठ इस भाग पर स्थित
किसी धर्मशाला के लिए व्यवहृत किया गया है ।
श्रीवर कश्मीर के सुलतान हसन शाह के समय
खेरी मे धर्मशाला स्थापित करने की बात कहता
है ( ३ : १९० ) ।
श्रीवर के समय तक खेरी का महत्वपूर्ण स्थान
था । वह स्पष्ट प्रकट हो जाता है ।
शाहाभिधास्य भार्यापि मठं सुकृतकर्मठम् ।
खेरीविषयमार्गान्तर्निर्ममे सप्रतिग्रहम् ॥ ३:१८७
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खैरी चार्थव्रजं राष्ट्रं भ्रातृमन्त्रिसखेव सा ।
अतापयन्महोष्माद्य प्रविष्टा कटकद्वयी ॥
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