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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 984 में से

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पृष्ठ 451

३३४ राजतरंगिणी
तत्रापि पूर्वसंस्कारादुक्तत्रासं दधे जनः ।
श्मशानविहिते लीलावेश्मनीव नृपास्पदे ॥ ३२६ ॥
३२६. श्मशान में बने लीलावेश्म सदृश पूर्व संस्कार के कारण उसके सिंहासन के सम्मुख
भी लोग उक्त त्रास की आशंका से भयभीत रहते थे ।
अतिसंतापदाज्जातं स जनाह्लादकोऽभवत् ।
जलौघा जलदश्यामात्तपात्ययदिनादिव ॥ ३२७ ॥
३२७. अति संतापदायी से उत्पन्न' वह जन आह्लादक, उसी प्रकार हुआ, जैसे जलद
द्वारा श्याम ग्रीष्मान्त दिन से उत्पन्न वृष्टि ।


पर इसके आशनाओ और क़रीबी रिश्तेदारो समेत
जियाफ़त पर ले गयी थी । इस औरत ने जादू के
जोरसे उन तमाम को मार डाला । सिर्फ एक
लड़का खितो नन्द नाम का ज़िन्दा रहा । मुद्दत
हुकूमत बासठ बरस ९ महीने ।' (पृष्ठ ४९ ) ।
(२) पौरों द्वारा राज्याभिषेक : कल्हण इस
स्थानपर नागरिको द्वारा राजा चुनने की बात
करता है । मालूम होता है कि मिहिरकुल के पुत्रो
से किसी सदाचारी पुत्र को लोगो ने राजा बनाने
का निश्चय कर उसे राजा बनाया । अन्यथा कल्हण
यहाँ पर केवल यही लिखता कि मिहिरकुल का पुत्र
उसके पश्चात् राजा हुआ ।
काश्मीर में प्रायः राजा का निर्वाचन प्राचीन काल
में होता रहा है । राजतरंगिणी में वर्णन आता है
कि यशस्कर ब्राह्मण को काश्मीर की परिषद् ने राजा
चुना था । (रा० त० ५ : ४६९, ४७७ ) ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ३२६ में 'दुक्तत्रासं' का 'मुक्तत्रास'
'दुब्ता त्रास' 'मुक्ता सन्द', मुक्त तासं', 'दुत्त्रांसं
स' तथा दुक्त्रात्रामं' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३२६ (१) नृपास्पद: यहाँ कल्हण ने सिंहा-
सन नहीं 'नृपास्पद' शब्द का प्रयोग किया है । श्री


स्तीन तथा श्री रणजीत सीताराम पण्डित आदि
ने सिंहासन ही 'नृपास्पद' का अर्थ लगाया है ।
नृप + आस्पद मिलकर नृपास्पद शब्द बना है ।
नृप का अर्थ राजा और आस्पद का अर्थ स्थान,
अधिष्ठान, इत्यादि होता है । यहाँ राजस्थान तथा
राजा के बैठने की जगह अर्थात् अधिष्ठान भी हो
सकता है । यहाँ पर सिंहासन की अपेक्षा राजा के
स्थान करना अथवा उनके बैठकों के आसपास अर्थ
अधिक कल्हण के समीप होगा । नृपास्पद शब्द का
भावार्थ सिंहासन मे आ जाता है । किन्तु यह
शाब्दिक अर्थ के अधिक समीप नही है ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ३२७ में 'अति' का 'अपि'; 'जातः'
का 'जाताः', 'जनाह्लादको' का 'जनाः ह्लादको' तथा
'मात्तपा' का 'मोत्तपा', 'मातापा' और 'मात्तापा'
पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३२७ (१) संतापदायी : कल्हण यहाँ पर
दूसरा उदाहरण संतापदायी राजा से उत्पन्न उत्तम
तथा जन आह्लादक पुत्र का देता है । पहला उदा-
हरण उसने नृशंस नर के पुत्र सिद्ध का दिया है ।
यहाँ दूसरा उदाहरण भूलोकभैरव मिहिरकुल के
पुत्र बक का देता है ।