राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३३५
लोकान्तरादिवायातं मेने धर्मं तदा जनः ।
अभयं च परावृत्तं प्रवासाद्गहनादिव ॥ ३२८ ॥
३२८. उस समय लोग धर्म १ को लोकान्तर से आया तथा अभय २ को चिर प्रवास से परावृत्त
मानते थे ।
स वकेशं वकश्वभ्रे वकवत्यापगां तथा ।
कृत्वा पुरं परार्थ्यश्रीर्लवणोत्साभिधं व्यधात् ॥ ३२६ ॥
३२६. उस अतुल श्री सम्पन्न राजा ने वकश्वभ्र में वकेश १ तथा वकावती आपगा २ का
निर्माण करके लवणोत्स ३ नगर बनवाया ।
तत्र त्रिषष्टिर्वर्षाणां सत्रयोदशवासरा ।
अत्यवाह्यत भूपेन तेन पृथ्वीं प्रशासता ॥ ३३० ॥
३३०. उस राजा ने वहां पृथ्वी का शासन करते' तिरसठ वर्ष तेरह दिन व्यतीत किया । २
३२८ (१) धर्म का अर्थ यहाँ राज्य के विधि
से है । जिसका आज कल प्रचलित शब्द कानून है ।
(२) अभय : शासन का फल अभय है ।
अभय उस समय जनता में होता है, जब शासन
सुव्यवस्थित होता है । राज्यदण्ड का भय अवां-
च्छनीय तत्त्वों को नियन्त्रण में रखता है ।
जनता में आन्तरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार के
भय का अभाव हो जाता है ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ३२९ में 'वकेशं' का 'वकेशे' तथा
'कवश्वभ्रे' का पाठभेद 'वकः श्वभ्रे' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३२९ (१) वकेश तथा वकश्वभ्र : इन दोनो
स्थानों का पता अभी तक नहीं चला है । कुछ
स्थान मुझे बताये गये किन्तु वे भ्रामक हैं ।
३२९ (२) वकावती आपगा : कल्हण न
आपगा शब्द का यहाँ प्रयोग किया है। जिसका
अर्थ नदी, सरित्, तरंगिणी, शैवालिनी, तटिनी, किंवा
सरिता होता है । आपगेय का अर्थ नदी से उत्पन्न
नहरादि होता है । यहाँ आपगा का अर्थ नहर
माना जा सकता है ।
(३) लवणोत्स : श्रीनगर से भारत आने वाले
मार्ग पर यह स्थान स्थित है । ( रा० त० ६:४६,
५७; ७:७६२, ७:१५३७, १६५८) । श्रीनगर से पूर्व
काल में एक ही पड़ाव में लवणोत्स पहुँचा जा सकता
था । पामपुर या पद्मपुर मार्ग में पड़ता था । विजये-
श्वर के घेरा के सन्दर्भ में ( रा० त० ७-१५६७ तथा
१६५८ ) लवणोत्स का वर्णन कल्हण ने किया है ।
उसमे प्रतीत होता है । विजयेश्वर तथा लवणोत्स में
अधिक फासला नहीं था । श्रीनगर में बाहर से आने
वाली एक सड़क पर लवणोत्स के होने का उल्लेख
है । (रा० त० ५६,५७) । लवणोत्स वास्तव में किस
स्थान पर था, अभी तक निश्चय नहीं हो सका है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३३० में 'वासरा' का 'वासराम्'
'अत्यवाह्यत' का 'अभ्यवाह्यत' तथा 'अव्यग्राह्यत'
और 'प्रशासता' का पाठभेद 'प्रशासता' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३३० (१) राज्यकाल : राजतरंगिणी राज्य
काल ६३ वर्ष तेरह दिन स्पष्ट देती है । श्री रणजोत