राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 446, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३३१
अवतारयतस्तस्य चन्द्रकुल्याभिधां नदीम् ।
अशक्योन्मूलना मध्ये शिलाऽभूद्विघ्नकारिणी ॥ ३१८ ॥
३१८. जबकि चन्द्रकुल्या१ नाम्नी नदी को राजा अवतारत२ कर रहा था, बीच में
न हटनेवाली शिला विघ्नकारक हो गयी ।
ततः कृततपाः स्वप्ने देवैरुक्तः स भूपतिः ।
यक्षः शिलायां बलवान्ब्रह्मचार्यत्र तिष्ठति ॥ ३१९ ॥
३१९. तदनन्तर उस राजा ने तपस्या की। स्वप्न में देवताओं ने उससे कहा—'बलवान्
एवं ब्रह्मचारी यक्ष शिला पर आसीन है।'
साध्वी स्पृशति चेदेनां निरोद्धुं न स शक्नुयात् ।
ततोऽपरेद्युः स्वप्नोक्तं शिलायां तेन कारितम् ॥ ३२० ॥
३२०. 'यदि साध्वी स्त्री इस शिला का स्पर्श करे, तो वह यक्ष कार्य निरोध में असमर्थ
होगा।' दूसरे दिन उसने स्वप्नोक्त क्रिया शिला पर करायी ।
तथा पल्लव की सहायता से बाहु तथा उसके राज्य
को नष्ट कर दिया । ( १४ : ४ ) यवन, पारद,
काम्बोज, पल्लव तथा खस पांचगणो ने हैहय राजाओं
के विजय निमित्त पराक्रम किया था। यहाँ स्पष्ट
उल्लेख मिलता है कि खसों की राज्य-व्यवस्था
गणतन्त्रीय थी । खसो ने बाहू राजा तथा उसके
राज्य को नष्ट करने में सम्भवतः प्रत्यक्ष भाग नही
लिया था क्योंकि ( १३ : ३० ) खस का उल्लेख
नहीं आता । हैहय तथा तालजंघ राजो के साथ
शको का उल्लेख है । उसने बाहू के राज्य को
छीन लिया था। वही पर ( १४ : ४ ) केवल यह
उल्लेख आता है कि पाचगण राज्य जिनमें खस
भी एक गणराज्य था, हैहयों के लिए पराक्रम किया
था । खस लोग शकों की तरह बाहु के राज्य को
लेते हुए दिखाई नही देते ।
पादटिप्पणियाँ :
३१८ (१) चन्द्रकुल्या : मुहम्मद आजिम
कहता है कि राजा मिहिरकुल ने चन्द्रकुल्या नहर
बनवायी थी । उसके समय तक वह नहर
वर्तमान थी ।
(२) अवतारित : श्री स्तीन तथा सीताराम
पण्डित ने यहाँ जल प्रवाह को डाइवर्ट अर्थात् जल
प्रवाह को मोडने का अर्थ किया है। अन्य अनु-
वादकों ने भी विभिन्न अर्थ किये है । अतएव मैने
यहाँ मूल 'अवतारित' शब्द दे दिया है। 'गंगावतरण'
शब्द अत्यन्त प्रचलित है । भगीरथ ने गंगा का
अवतरण किया था ।
कल्हण के मस्तिष्क में 'गंगावतरण' की बात
रही होगी । भगीरथ की 'गंगा' के समान 'चन्द्र-
कुल्या' को राजा मिहिरकुल अवतारित करा रहा
था । यही भाव यहाँ प्रदर्शित किया है। कुल्या शब्द
का अर्थ नहर, नाला एवं नाली होता है। कुल्या का
मार्गावरोध शिला के कारण ( रा० त० १ : ३२०
३२१ ) हो गया था। जलावतरण नही हो रहा था।
इससे प्रकट होता है कि चन्द्रकुल्याका राजा निर्माण
करा रहा था ।
कुल्या शब्द का प्रयोग कल्हण ने ( रा० त० १ :
९७ ) सुवर्णमयी कुल्या के संदर्भ में किया है।
कुल्या शब्द पर विशेष पृष्ठ १३० द्रष्टव्य है ।
२. ... :
श्लोक संख्या ३१९ में 'यक्ष.' का पाठभेद 'यक्षा'
तथा 'यक्षाः' मिलता है ।
श्लोकसंख्या ३२० में 'चेदेनां' का 'चेदेनं' तथा
'न स' का पाठभेद 'न च' मिलता है ।