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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 984 में से

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पृष्ठ 445

३३० राजतरंगिणी
[स्तम्भ १]
बृहद् संहिता में—कुलूत, तंगण, खश,
काश्मीरा उल्लेख किया गया है। (१० : १२)।
ऋग्वेद सहिता (१ : ११७) में खस जाति का
उल्लेख मिलता है।
खसा : प्राचीनतम दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी
की कन्या थी। कश्यप प्रजापति को दी गयी थी।
उससे यक्ष राक्षसादि हुए। मार्कण्डेय पुराण में
‘कुरवो गुर्गणा खसा:,’ ‘वायु पुराण में ‘क्षुपणास्त-
ङ्गण खसा:’ ‘कुणपास्तगणा: खसा:,‘ ‘धुपनास्तङ्ग-
णास्त्वसा:’ ‘क्षुपनास्तङ्कणा स्वसा:’। ब्रह्माण्ड
पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा: खसा:,’ मत्स्यपुराण मे
‘कुपथा अपयास्तया’ वामन पुराण में ‘कुपयास्तङ्गणा
खसा.’ कुपय किंवा अपथ हिमालय मे कोई
स्थान था।
खस देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया
है। मत्स्य पुराण में बर्बर तथा यवनों के साथ
खसों का उल्लेख किया गया है। ‘बर्बरान् यवनान्
खसान्’। वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में ‘पारदान,
सौगनान्खसान्’ ‘पारदास्ताङ्गणान्खसान्’, ‘किम्पुरुषान्
खसान्’ का उल्लेख पारद तङ्गण तथा किम्पुरुष के
साथ आया है। द्रोण पर्व महाभारत में खस जाति
का उल्लेख दरद आदि के साथ किया गया है।
तैस्तु पुनर्व्याप्तमुखास्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः ।
अयोहस्ताः शूलहस्ता दरदास्तङ्गणाः खसाः ॥
( १२१ । ४२ )
काशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में
पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया
है। मार्कण्डेय पुराण में खश जाति का नाम मगध
तथा लोहित्य के साथ पूर्व दिशा मे रखा गया है।
परन्तु यह काश्मीरी साहित्य में वर्णित जाति खस
नहीं है। अपितु आसाम खासी पर्वत में रहने
वाली खासी जाति हो सकती है। अथवा खस जाति
जिसका उल्लेख बंगाल के पाल राजाओं के शिला-
लेखों में है वे ये जिनका आवागमन बंगाल, आसाम
[स्तम्भ २]
तक होता रहा है, अथवा कहीं यही आबाद रहे
होंगे।
शूद्राभीराश्च दरदाः काश्मीराःपशुभिः सह ।।६७।।
खाशीराश्चान्तचाराश्च पद्गया गिरिगह्वराः ।
आत्रेयाः सभरद्वाजास्तथैव स्तनपोषिकाः ।।
(भीष्मपर्व ९ : ६८ )
दरद और काश्मीर के साथ ही खस का उल्लेख
किया गया है। खाशीर, खसा, खश एवं खस शब्द
एक ही जाति के लिए प्रयुक्त किये गये हैं। (भीष्म
पर्व ९ : ६८)।
भागवत पुराण ( २ : ४ : १३ ) के अनुसार
खस जाति पतित हो गयी थी परन्तु भागवत भक्ति
के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण ( २ :
२६ : १४५ तथा ३ : ६९ १२० ) में उल्लेख
आता है। विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली एक
निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी
कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने
उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया।
और वे म्लेच्छ माने गये। हरिवंश पुराण
( १४ ० ७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें
पूर्व का एक जनपद माना है। जिसमे होकर चक्षु
नदी बहती है। ( ब्रह्माण्ड पुराण २ : १६ : ४६
तथा मत्स्य पुराण १२१ : ४३, १४४ : ५७ )
वायु पुराण मे एक पर्वतीय जनपद कहा गया
है। यहाँ खस के स्थान पर खश शब्द का प्रयोग
किया गया है। वायुपुराण ( ४५ : ३१५ तथा
४७ : ४७,) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी
माना गया है। बंगाल के पाल राजाओं के शिला-
लेख मे हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता
है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि
खस लोग बंगाल तक आते जाते थे।
हरिवंश पुराण ( १३ : २३-३४ ) में उल्लेख
आता है। रघुवंशी राजा बाहु को हैहय तथा ताल-
जंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद