सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426

प्रथम तरंग ३१३
है। कर्नाटक देशवासियों की भाषा कन्नड़ है। उनका
साहित्य कन्नड़ साहित्य कहा जाता है। वर्तमान
मैसूर राज्य समस्त कन्नड़ भाषियों का राज्य है।
कन्नड़ शब्द संस्कृत कर्णाट का अपभ्रंश है।
उक्त तन्त्रों के अनुसार प्राचीन कर्णाटक देश
रामनाथ से श्रीरंग तक विस्तृत था। श्रीरंग शब्द
वर्तमान श्रीरंगपत्तन के लिए आया है। श्रीरंग
कावेरी नदी के दूसरे तट पर तंजोर के दूसरी
तरफ है। रामनाथ स्थान रामनाथपुरम् अर्थात्
पूर्व रामनद जिला अथवा रामनाथ मठ मदुरा
जिला अथवा तुंग और भद्रा नदियों के संगम
पर रामेश्वर तीर्थ हो सकता है।
कश्मीरी महाकवि विल्हण ने कुन्तल देश को
कर्णाट देश का समानार्थक कहा है। विक्रमादित्य
षष्ठ को 'कुन्तलेश' तथा 'कर्णान्ते' कहा गया है।
कुन्तल देश कर्णाटक का एक भाग हो सकता है।
हरिहर राजा द्वितीय के एक लेख सन् १३०७ ई०
मे पता चलता है कि कुन्तल विषय कर्णाट देश
में था।
विजय नगर साम्राज्य के विस्तार के साथ
कर्णाट प्रदेश की सीमा दक्षिण मे बहुत विस्तृत हो
गयी थी। तल्लीकोट के युद्ध (सन् १५६५ ई०)
के पश्चात् विजयनगर के राजा चन्द्रगिरी
अर्थात् चित्तूर जिला तत्पश्चात् वेल्लोर जिला,
उत्तरेश अरकाट तक पीछे चले आये थे। उनका
राज्य परिमित हो गया था। लघु राज्य होने
पर भी उन्हें कर्नाटक का राय कहा जाता है। सन्
१६६२-१७०१ ई० मे जुलफिकार अली खा कर्ना-
टक का नवाब बना दिया गया था।
(४) लाट : दक्षिण तथा गुजरात के मध्य का
प्रदेश जिसे ताप्ती तथा नर्मदा नदियां सींचती है।
लाट देश था। एक मत है। ताप्ती और माही के मध्य
का देश लाट था। बन्धुवर्मा के मन्दसोर शिलालेख में
लाट का उल्लेख मिलता है। प्रतिहार राजा कक्कुक
ने लाट देश मे बहुत ख्याति प्राप्त की थी। एक
४०
और मत है माही और किम नदियों के मध्य
यह अंचल था। उत्तरी कोंकन और गुजरात
का पुराना नाम कहा जाता है। एक मत है कि
यह मध्य गुजरात का भाग है। खेडु के कर्ण के
शिलालेख से मालूम होता है कि इसमें मध्य तथा
दक्षिणी गुजरात क्षेत्र सम्मिलित थे। बौद्ध साहित्य
दीपवंश तथा महावंश के अनुसार लाटराष्ट्र गुजरात
था जिसकी राजधानी दीपवंश के अनुसार सिंह-
पुर थी। पुराने राष्ट्रकूट और गुजरात के कागजा-
तों से प्रतीत होता है कि लाटेश्वर देश गुजरात
था। लाटेश्वर राज्य की राजधानी इलापुर थी।
महाभारत अनुशासन पर्व (३५ : १७-१२) मे
वर्णन आता है कि लाट एक क्षत्रिय जाति थी
परन्तु ब्राह्मणों के साथ ईर्ष्या करने के कारण
नीच हो गये थे।
संमोह तन्त्र में (२ : ३) देशों की तालिका
में लाट देश का नाम दिया है। यथा •
चोल्यां (पां) चालगौश्च मलपांढ (पालश्च सिंहल।
व्योक विडो व्योगश्चैव (१) का(क)र्णाटो लाट एव च॥
शक्ति संगम तन्त्र (३:७ ५५) में लाट देश का
उल्लेख मिलता है।
अवन्तीतः पश्चिमे तु वैदर्भाद् दक्षिणोत्तरे।
लाटदेशः समाख्यातो वरारं शृणु पार्वति ॥
लाट देश उक्त उद्धरणों के आधार पर अवन्ती
के पश्चिम तथा विदर्भ (वरार) के उत्तर पश्चिम
ठहरता है। लाट देश अधोगामी माही तथा ताप्ती
के मध्य में था। राजाओं की शक्ति एवं राज्य
विस्तार के कारण यह सीमा कभी-कभी माही से
और परे तक चलो जाती थी। उसने भृगुकच्छ
(भड़ौच) तथा नवसारिका (नवसारी) के अंचल
सम्मिलित थे। कामसूत्र (६:५:२६) के अनुसार
लाट देश मालवा के पश्चिम दिशा में था।
सन् १४२५ ई० के एक दक्षिणी अभिलेख से पता
चलता है कि पंच द्राविड़ ब्राह्मणों में कन्नडिग,
तामिल, तैलंग, इयाल अर्थात् गुजरात के ब्राह्मण