राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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मिलता है। धृष्टद्युम्न द्वारा निर्मित, क्रौंच व्यूह के
दक्षिण पार्श्व में यहाँ के सैनिक रक्षा निमित्त तत्पर
थे। कर्ण पर्व (१२:१५) में उल्लेख आता है।
पाण्डवों के पक्ष से चोलवासियों ने महाभारत युद्ध
में भाग लिया था। द्रोण पर्व (११:१७) में वर्णन
मिलता है। भगवान् कृष्ण ने इस देश को जीता था।
कात्यायन ने पाणिनि के वार्तिक में चोल तथा
पाण्ड्य का उल्लेख किया है। पाणिनि ने अपनी अष्ट-
ध्यायी में (४:१:१७५-७) कांचीपुरम का उल्लेख
किया है। अशोक ने द्वितीय तथा तेरहवें शिलालेख में
चोल, पाण्ड्य, केरल पुत्तो (केरल पुत्र) तथा
सतियपुत्तो (सत्यपुत्र) का उल्लेख अपने राज्य के
दक्षिणान्त के सीमान्त देश के रूप में किया है।
तिब्बतीय बौद्ध ग्रन्थों से मालूम होता है।
मौर्यों ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। इसका
समर्थन आधुनिक अनुसन्धानों से हो गया है। महावंश
में चोल तथा कावेरीपत्तनम का उल्लेख है। जातक
में कावेरीपत्तन का उल्लेख मिलता है। चोल का
इतिहास उतार-चढाव से भरा पड़ा है।
पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में चोल का उल्लेख
किया है। बौद्ध ग्रन्थों में समन्त पसादिका, जातक,
पिटकादि में 'कोरु' जनपद का अर्थ चोल जनपद
लगाना चाहिए।
परमार राज लक्ष्मण देव की प्रशस्ति में चोल
विजय का वर्णन है। परन्तु यह कल्पना मात्र प्रतीत
होता है। प्लौतमी ने चोल का उल्लेख 'सोर' शब्द
से किया है। उस पर अरकाट का शासन होना
बताता है।
मार्कण्डेय पुराण (५७:४५), वायु. पुराण (४५:
१२४), मत्स्य पुराण (११२:४६) में चोल देश का
उल्लेख है। मार्कण्डेय पुराण में—'चोलाः कुल्या-
स्तथैव च' वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में-'चोल्याः
कुल्यास्तथैव च' मत्स्य पुराण में 'चोलाः कुल्यास्तथैव
च।' वामन पुराण में 'चोल कुल्याश्च राक्षस' का
उल्लेख आया है।
शक्ति संगम तंत्र (३:७:२२) में उल्लेख किया
गया है :
द्राविडेतैंलंगयोर्मध्ये चोलदेशः प्रकीर्तितः ।
लम्बकर्णाश्च ते प्रोक्ता भद्रोग्याव्याम्भरी भवेत् ॥ २२
इससे प्रकट होता है कि चोल देश द्रविड़ तथा
तैलंग देश के मध्य स्थित था।
२. कर्णाट : वर्तमान कर्नाटक क्षेत्र है।
भागवत (५:६:७,) महाभारत भीष्म पर्व (९:१९)
में कर्णाटक को दक्षिण भारत का एक जनपद कहा
गया है। जातक (भाग १:४४७,) महावंश (६:५,
६:३५, ८:६-७)
भागवत पुराण (५:६:७) में कर्णाटक का उल्लेख
आया है। इसे गरा मंडल कहा गया है। स्कन्द
पुराण के देशों की तालिका में कर्णाट का स्थान
४४वाँ तथा ग्राम-संख्या १२५००० दी गयी है।
बृहत् संहिता में केरल के साथ कर्णाट का उल्लेख
किया गया है।
सम्मोह तन्त्र जिसकी रचना सन् १४५० ई०
के पूर्व हुई थी, में उल्लेख आता है :
सौराशे द्रविड़ेऽथैवं (च) स्तैंलिग मल्याद्र (द्रि) कौ।
कर्णाटान्यन्य वैदर्भं मर्यां (श्रा) मौर (राः) समालवा
(याः) ॥ ४
शक्ति संगम तन्त्र (३:७:११४:६) में उल्लेख आता है
मार्जारतीर्थराजेन्द्रे कोलापुरनिवासिनी ।
तावद्देशो महाराष्ट्रः कर्णाटस्याभि गोचर ॥ ११
रामनाथं समारभ्य श्रीरंगान्तं वरेश्वरि ।
कर्णाट देशो देवेशि साम्राज्यभोगदायकः ॥ १९
शक्ति संगम तन्त्र ३:८:१५
पूर्वे बैजनाथस्तूत्तरेऽमरकण्टकम् ।
कांचीपुरममध्यभागे मोहनावत्तं मे (ए) व च ॥
१५
उक्त उद्धरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि
कल्हण ने कर्णाट नाम ठीक दिया है। कर्नाटक
प्राचीन नाम नहीं है। कन्नड़ भी प्राचीन नाम नही