राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 984 में से
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प्रथम तरंग
३०७
[बायाँ स्तम्भ]
कल्हण मिहिरकुल के लंका आक्रमण की तुलना
भगवान् श्री राम के आक्रमण से करता है। लंका
पति रावण से राम की सेना देखकर भयग्रस्त
राक्षसों ने संवाद कहा था। अन्धकारमय भविष्य
कहा था। राम की सेना से उत्पन्न भय कहा था।
यही अवस्था मिहिरकुल की सेना देखकर राक्षसों
की हुई थी। वे भयभीत हो गये थे।
(२) सौध से सेना अवलोकन : लंका
का जैसा सर्वनाश बन्दरो तथा राम की सेना द्वारा
हुआ था। कहीं उसी की पुनरावृत्ति न हो जाय।
इसे स्मरण कर लंका वासी आशंकित हो गये थे।
लंका के सौधों अर्थात् प्रासादों से उन्होंने
मिहिरकुल की सेना देखी। इसी प्रकार सेना देखने
का वर्णन वाल्मीकि ने रामायण में किया है।
'लंका सौध से सेना अवलोकन क्या सम्भव
था ?' प्रश्न उपस्थित होता है। क्या भारतीय तट
पर पड़ी सेना लंका के सौधों से रामायण तथा
मिहिरकुल काल में देखी जा सकती थी। मैं इसका
यही उत्तर दे सकता हूँ कि यह सम्भव था।
मण्डपम स्टेशन से रेलगाड़ी रामेश्वर द्वीप की
ओर बढ़ती है तो बीच में सागर मिलता है। यह
बंगाल की खाड़ी तथा मन्नार की खाड़ी के जल
को मिलाता है। जल डमरूमध्य है। इस पर
लम्बा रेलवे का पुल बना है। रेल गाड़ी बहुत धीरे
धीरे चलती है।
समुद्र का जल जिस दिन भाटा के कारण
नीचे आ जाता है तो लहरें नहीं उठतीं। जल
स्थिर हो जाता है। यही समय है। जब निश्चय
किया जा सकता है कि भारतीय भूखण्ड और
पम्बन को जोड़ने के लिए कभी सेतु वहाँ बाँधा
गया था या नही। ज्वार के समय जल बहुत
ऊपर उठ जाता है। पम्बन के पुल के नीचे वेग से
लहर उठती है।
मैने यही समय इस स्थान को देखने का
निश्चय किया। अपने साथ सिविल विभाग के
एक इंजीनियर को भी ले लिया।
[दायाँ स्तम्भ]
पहली वस्तु ध्यान आकर्षित करने वाली समुद्र
तल में पड़ी विशाल चट्टानें हैं। दोनों भूखण्डो
के मध्य विशाल शिलाखण्ड समुद्र तल में पड़े
हैं यह केवल वहीं मिलते हैं। समीप पर्वत
नही है। जहाँ से विशाल शिलाखण्ड लाया
जा सके।
यह शिला खण्ड इतने विशाल हैं कि
उन्हें मानवी शक्ति द्वारा उठाना सम्भव नही हैं।
उन्हें उठाने के लिये क्रेन अथवा कल्हण वर्णित
यन्त्र की आवश्यकता पड़ सकती है। वाल्मीकि
रामायण में उल्लेख मिलता है। नल तथा नील
तत्कालीन अभियन्ताओं के निरीक्षण में सेतु बाँधा
गया था। विशाल शिलाखण्ड बन्दर लाते थे और
समुद्र में छोड़ते थे। यन्त्र का प्रयोग किया गया था।
पम्बन पुल के मोचे के विशाल शिलाखण्ड और
कश्मीर के भूतेश्वर, मार्तण्ड, परिहासपुरादि में लगे
विशाल शिलाखण्डों को देखकर अनायास प्रश्न
उठता है। उनका लाना कैसे मानवीय शक्ति के
सामर्थ्य की बात हो सकती थी ?
कल्हण इसका उत्तर देता है। कल्हण ने शिला-
खण्डों को उठाने के लिए 'यन्त्र' शब्द का प्रयोग
किया है। यह यन्त्र क्रेन थे। वह स्पष्ट उपमा
देते हुए कहता है कि 'यन्त्र' से गिरे शिला
तुल्य, अर्थात् यन्त्र शिला को क्रेन की तरह
ऊपर उठाता था। वह किसी समय गिरती थी
तो राज्यच्युत होते राजा के समान उसे रोकना
कठिन था। यही बात क्रेन के सम्बन्ध में कही
जायगी। क्रेन से गिरते सामान को किसी प्रकार
भी रोका नहीं जा सकता। वह गिर कर
ही रहेगा।
रामायण ने इसका उत्तर बन्दरों की अलौकिक
शक्ति का वर्णन कर दिया है। इससे प्रतीत होता
है। प्राचीन काल में कश्मीर से रामेश्वरम् तक
'यन्त्र' अर्थात् क्रेन का शिलाओं के उठाने तथा
निर्माण कार्य में प्रयोग किया जाता था। यद्यपि वे क्रेन