राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 415, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें३०६. राजतरंगिणी:
स सिंहलेन्द्रेण समं संरम्भादुदपाटयत् ।
चिरेण चरणस्पृष्टप्रियालोकनरूजां रुषम् ॥ २९७ ॥
२९७. उसने सिंहल नरेश को पदाक्रान्त करने तथा हेम पादांकित प्रिया के कंचुकी द्वारा
उद्भूत क्रोध को शान्त किया ।
दूरात्तत्सैन्यमालोक्य लङ्कासौधैर्निशाचराः ।
भूयोऽपि राघवोद्योगमाशङ्क्य प्रचकाम्परे ॥ २९८ ॥
२९८. जब लंका के सौधों से निशाचरों ने उसकी सेना का दूर से ही अवलोकन किया, तो
'राघव' के आक्रमण की पुनः आशंका हुई ।
रूप तथा वर्ण बनाती है । हवाई जहाज में यात्रा
करने पर यह बात स्पष्ट दिखायी पड़ती है । तट-
वर्ती समुद्र का पानी भूरा तथा गदला लगेगा ।
तट से जितना ही दूर जाय, उतना ही जल का
रंग गाढा नीला हो जायेगा । समुद्र में जहाँ
नदियां आकर मिलती हैं वहां दो तीन मील
तक का जल गदला रहता है । गंगा सागर के
पास यह बड़ी अच्छी तरह दिखाई देता है । प्रशान्त,
अटलांटिक महासागर, तथा भूमध्य महासागर का
जल अत्यन्त नीला मिलेगा । इसी प्रकार बंगाल
की खाड़ी के मध्य पहुँचने पर भी जल की नीलिमा
बढ़ जाती है । तटवर्तीय जल होने के कारण समुद्री
जल का वर्णन नीलजा यमुना के जल के समीप
रंग रूप में पहुँच जाता है ।
कल्हण ने बड़ी ही उत्तम उपमा यहां दी है ।
नील समुद्र में नीलजा का जल मिलना प्रिय
तथा प्रिय के मिलन तुल्य है । नील जल युक्त
समुद्र पुल्लिंग है और नील जल के साथ नीलजा
अर्थात् यमुना स्त्रीलिंग है । नर-नारी का मिलन
ही प्रेम है । वही काम की चरम सीमा है । निस्सन्देह
कल्हण की उपमा की जितनी प्रशंसा की जाय वह
थोड़ी मानी जायगी ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २९७ में 'रुषम्' का पाठभेद
'दृशम्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२९७ (१) सिंहल आक्रमण : मुजम्मुल तुल
तवारीख में लगभग इसी प्रकार का वर्णन दिया गया
है । कश्मीर के एक राजा ने सिंघ पर आक्रमण किया
था । कश्मीर के राजा का नाम नहीं दिया है ।
सिंघराज हाल ने मिहिरकुल को सन्धि करने
के लिए बाध्य कर दिया था ।
(२) क्रोध : कल्हण यहां दोनों क्रोधों की
शान्ति का उल्लेख करता है । प्रथम क्रोध हेम-
पादांकित कंचुकी देखने के कारण उसमें उत्पन्न
हुआ था । दूसरे क्रोध का उदय सिंहल आक्रमण काल
में शत्रु को पराजित करने के लिए हुआ था ।
सिंहल विजय के कारण हेम पादांकित वस्त्र के
स्थान पर यमुपदेव वस्त्र प्राप्त किया था । इस
प्रकार उसके प्रथम क्रोध की शान्ति हुई । दूसरे
क्रोध की शान्ति सिंहलराज को सिंहासन च्युत
कर किया था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २९८ में 'सौधैर्न' का पाठ-
भेद 'सौधान्नि' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२९८ (१) राघव : यहा पर राघव शब्द भग-
वान् श्री रामचन्द्र जी के लिये आया है । श्री लंका
पर ऐतिहासिक किंवा गाथा के आधार पर सर्व
प्रथम श्री राम की सेना ने सफल आक्रमण कर
विजय प्राप्त की थी ।