राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २८९
सिद्धः सिद्धः सदेहोऽयमिति शब्दं सुरा दिवि ।
प्राघोषयंस्ताडयन्तः पटहं सप्त वासरान् ॥ २८५ ॥
२८५. 'सिद्ध, १ यह सदेह सिद्ध है ।' सुरगण इसका घोष करते हुए सात दिन तक पटह२
बजाते रहे ।
रहट का मृत्तिका घट अण्डाकार होता है । प्रत्येक
ग्रामों में कुम्हार यह घट अथवा घड़ा बनाते हैं ।
वह ज्यादा पानी उठाता है । वैज्ञानिक दृष्टि से
परसियन-पुराने रहट से यह अधिक विकसित
कहा जायगा ।
कल्हण का वर्णन आठ शताब्दी पूर्व का है ।
उस समय भारत में और कश्मीर में रहट चलता
था । कल्हण ने पुनः 'अरघट्ट' का वर्णन रा० त०
६ : ४८ में किया है ।
मैंने उदयपुर तथा समीपस्थ स्थानों के वृद्धों
से पूछा । उनका 'अरहट' कब से चलता है ।
वे बोले—"बाप दादों ने अपने बाप-दादों से सुना
था । यह बहुत दिन से चलता रहा है । हम भी चला
रहे हैं ।"
मेवाड़ को छोड़कर शेष भारत में यह नवीन
सिंचाई की प्रथा है । उत्तर प्रदेश तथा बिहार में
इसका प्रचलन गत तीस या चालीस वर्षों से हुआ
है । पंजाब में निस्सन्देह यह बहुत पूर्व आ गया
था । परसियन भाषा, लिपि तथा सभ्यता का
उत्तरी भारत में मुगल समय में अधिक प्रचार
हुआ था । यदि यह पुराना भी रहा होगा तो
इसका नाम परसियन दे दिया गया । अंग्रेजी
सभ्यता के समय परसियन तथा अंग्रेजी नाम मिल
कर उसका नामकरण 'परसियन व्हील' हो गया ।
निस्सन्देह 'अरघट' अर्थात् रहट भारतीय आवि-
ष्कार था । कश्मीर में हजारों वर्ष पूर्व प्रचलित
था । मेवाड़ में आज भी अपने मूल रूप में प्रचलित
है । वह परसियन व्हील से अधिक विकसित तथा
चलाने में सरल, सुगमता से ग्रामीण साधनों-द्वारा
प्राप्य है । रहट को विदेशी आविष्कार कहना तथ्यों
एवं प्रमाणों के विपरीत बात होगी ।
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पाठभेद :
श्लोक संख्या २८५ में 'प्राघोष' का 'प्रोद्घोष',
'ताडयन्तः' का 'तानुयन्तः' 'न्तो ह्यनन्' पाठभेद
मिलता है ।
२८५ (१) सिद्ध : दश देव योनि में एक योनि
सिद्धों की है । मनुष्यों में जिसका साधन पूरा हो
जाता है उसे सिद्ध कहते हैं । जिन संतों तथा
योगियों को सिद्धि प्राप्त हो जाती है उन्हें सिद्ध
कहते हैं ।
राजा का नाम सिद्ध था । कल्हण उसके
नाम के अनुसार सिद्ध प्रमाणित कर उसे सदेह
स्वर्ग भेजता है । सदेह स्वर्ग जाना अत्यन्त कठिन
कार्य है । विश्वामित्र तथा त्रिशंकु की कथा सदेह स्वर्ग
गमन के लिए प्रसिद्ध है । त्रिशंकु विश्वामित्र की
तपस्या के बल से भी सदेह स्वर्ग नहीं जा सका
था । आज भी अधर में लटक रहा है ।
कल्हण ने राजा सिद्ध में भी जलोक के
समान अलौकिक गुणों के वर्णन का प्रयास किया
है । राजा जलोक आध्यात्मिक तथा राजनीतिक
दोनों दृष्टियों से श्रेष्ठ था । परन्तु वह भी सदेह
स्वर्ग नहीं जा सका । उसने साधना-द्वारा अपने
शरीर का त्याग किया था ।
राजा सिद्ध को कल्हण सदेह स्वर्ग पहुँचा
कर, आध्यात्मिक जगत् में उसे मनुष्य वर्ग से
ऊपर उठा कर, सिद्ध अर्थात् देव वर्ग में रख
देता है ।
सदेह स्वर्ग महाभारत के पात्रों में केवल धर्म-
राज युधिष्ठिर गये थे । भगवान् राम तथा श्री
कृष्ण ने भी शरीर त्याग इसी भूमि पर किया था ।
राजा सिद्ध युधिष्ठिर तुल्य धर्मात्मा था । अपने
पिता नर के चरित्र तथा आचरण से उसका चरित्र