राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 984 में से
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राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ]
रहट शब्द प्राचीन संस्कृत शब्द 'अरघट्ट' का
अपभ्रंश है । 'अर' का अर्थ होता है पहिये की
अरा । नेमि के मध्य की खड़ी लकड़ी । उसे
पहिये का आरा भी कहते हैं । राष्ट्रीय झण्डों पर
चक्र के मध्य केन्द्र बिन्दु से परिधि पर लगी
लकड़ियां 'अर' अथवा 'आर' कही जाती है ।
'घट' का अर्थ है घड़ा । अर + घट मिलकर बनता
है 'अरघट' । अथवा जिसका अर्थ होगा 'घड़ा
युक्त आर अथवा अर' ।
उदयपुर का प्राचीन शैली का 'रहट' आधु-
निक रहट से भिन्न है । वह प्राचीन परिभाषा
से मिलता है । खड़ा 'अरा' घूमता है । वह चक्र
अर्थात् चर्खा को घुमाता है । चर्खा अथवा पहिया
पर 'घट' रस्सियों से बँधे रहते हैं । यह 'घट'
पहिया से आधुनिक 'रहट' के 'वाल्टी' अथवा
'डब्बो' की तरह नीचे जाते और पानी लेकर
घूमते पहिया पर आते हैं । 'अरहट' शब्द इसी
'घरघट' शब्द का अपभ्रंश है ।
'मृच्छकटिकम्' नाटक में अरघट, अरघट्टा,
रहट का नाम 'कूपयन्त्रघटिका' दिया गया है ।
(१० : ५६) 'कूपयन्त्रघटिका' वही रस्सी में बँधा
घटिका यन्त्र था । जल लेकर ऊपर आता तथा नीचे
फिर जाता था । कवि शूद्रक ने उसको उपमा उन्नति
एवं अवनति तथा दैव से दी है । भाग्य इसे यन्त्र-
घटिका के समान मनुष्य को नीचे गिराता तथा ऊपर
उठाता है ।
'कांश्चित्तुच्छयति प्रपूरयति वा
कांश्चिन्नयत्युन्नतिं
कांश्चित् पातविधौ करोति च पुनः
कांश्चिन्नयात्याकुलाम् ॥
अन्योन्यप्रतिपक्षसंहतिमियां
लोकस्थितिं बोधय-
न्नेष क्रीडति कूपयन्त्रघटिका
न्यायप्रसक्तो विधिः ॥
[दायाँ स्तम्भ]
कालिदास ने 'मालविकाग्निमित्रम्' नाटक
के द्वितीय अंक श्लोक १२ में यन्त्र शब्द का प्रयोग
कल्हण के समान किया है । उसका भी अर्थ
रहट ही है :
बिन्दुच्छेद्यान्पिपासुः परिसरति शिखी
भ्रान्तिमद्वारियन्त्रं
धर्मैः सम्प्रेक्ष्यमिव नृपगुणे-
र्दीर्यते मत्तभसिः ॥ (२:१२)
अरघट्ट अरघट्टा, अरघट्टक अथवा रहट को
मराठी में 'रहाट' सिन्धी में 'अरट्ट' पंजाबी 'रह्ट'
राजस्थानी में 'घरहट' तथा हिन्दी में 'रहट' कहते
हैं । यह सब मूल अरघट्ट के अपभ्रंश हैं । इसी प्रकार
'अर' को हरियाणा में 'आरा' हिन्दी में 'आरा गज'
कहते हैं । यह लकड़ी या पटिया अथवा चक्र और
नेमि के बीच की लम्बी लकड़ी है ।
परसियन व्हील तथा भारतीय रहट में मौलिक
अन्तर था । परसियन व्हील का चलाने वाला
पैदल बैल अथवा ऊँट को हाँकता, उसके पीछे स्वयं
घूमता है ।
भारतीय रहट दो प्रकार के होते थे । और
हैं । एक तो परसियन रहट की तरह । चलने
वाला स्वयं पशु के पीछे हाँकता चलता है । दूसरा
रहट पर स्वयं आदमी बैठता है । तेली के पुराने
कोल्हू के समान बैठने के लिये स्थान बना रहता
है । उसी पर आदमी बैठ कर घानी चलाता है ।
यही प्रकार मेवाड़ के रहट में विशेष प्रचलित है ।
रहट पर चलाने वाला स्वयं बैठ जाता है । बैठे
ही बैल को हाँकता है । परसियन' रहट में
यह बात नहीं है । इस दृष्टि से भारतीय रहट
'परसियन रहट' की अपेक्षा अधिक विकसित था
और है ।
'परसियन रहट' में मृत्तिका पात्र गोले हंडिया
शैली के लगते हैं । ये भी रस्सी से बाँधकर माला
रूप चेन की तरह बनाये जाते हैं । उदयपुर के