राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २३९
ज्योतिषियो के अनुसार नागार्जुन की आयु केवल
७ दिनो की थी । उसके माता-पिता के धर्माचरण के
कारण देवताओ ने उसको ७ सप्ताह बढा दिया ।
तत्पश्चात् पुनः आयु ७ वर्ष बढा दिया । सात
वर्ष पूर्ण होने के पूर्व वह नालन्द बिहार में विद्याध्ययन
निमित्त भर्ती किया गया वहाँ उसने अमितायु की पूजा
आरम्भ की । देवता प्रसन्न हो गये । उसकी आयु
३०० वर्षों की हो गयी । उसको मृत्यु के सम्बन्ध
में विचित्र कथा है । उसने स्वयं अपना मस्तक अपने
हाथों से काटकर मृत्यु का आलिंगन किया था ।
कहा जाता है । नागार्जुन आन्ध्र प्रदेश के गन्तूर
जिला में श्रीपर्वत पर रहते थे । कालान्तर में इसे
विजयपुरी तथा नागार्जुन कोंडा कहने लगे । जन-
श्रुति है । राजा शातवाहन के समय नागार्जुन ने काशी
छोड़ने के पश्चात् श्रीपर्वत पर अपना निवास स्थान
बनाया । कश्मीरी बौद्ध भिक्षु तथा बौद्ध धर्मानुयायी
वहीं की यात्रा करने लगे ।
नागार्जुन कोण्डा में भगवान् बुद्ध की धातु
एक स्तूप में पायी गयी है । उस स्तूप मे भगवान्
की धातु एक गोले सुवर्ण मंजूषा मे मिली थी ।
सन् १९३३ में यह धातु महाबोधि संग्रहालय
सारनाथ वाराणसी में केन्द्रीय सरकार ने सुरक्षित
रखने के लिये दे दिया है । मैं प्रातः प्रतिवर्ष
कार्तिक पूर्णिमा मे भगवान् के इस पवित्र धातु
का दर्शन करता हूँ । यह धातु मूल गन्धकुटी
विहार में सुरक्षित है । यहाँ के खनन कार्य में
बडे स्तूप, विहार, मन्दिर, मूर्तियो, लघु स्तूप,
देहली, अधिष्ठान आदि अमरावती शैली के
प्राप्त हुए है ।
प्राकृत अभिलेख ब्राह्मी लिपि में दूसरी तथा
तीसरी शताब्दी के मिले हैं । वहाँ एक अर्धचन्द्रा-
कार देवस्थान (संख्या २) नागार्जुन कोण्डा में
दान देने वालों की तालिका अंकित मिली है ।
समीपवर्ती स्थानों में श्रीलंका, गांधार, चीन
तथा कश्मीर के पर्यटकों तथा यात्रियों के लिये
स्थान बनाने का उल्लेख है ।
नागार्जुन की एक मूर्ति नालन्द के खनन
कार्य सन् १९१९–१९२० में प्राप्त हुई है ।
स्वर्गीय श्री राहुल सास्कृत्यायन तिब्बत से कुछ
चित्र लाये थे । उनमें एक नागार्जुन का है ।
यह इस समय पटना संग्रहालय बिहार मे सुरक्षित है।
रानी शांतिश्री ने अनेक चैत्य तथा विहारों
का निर्माण नागार्जुन कोंडा में कराया था ।
एक अन्य उपासिका बोधिश्री ने चैत्यगृह वहां
बनवाया था । उनमें विदेश तथा कश्मीर के
भिक्षु आकर रहते थे ।
चीनी अनुवादों में उसके १८ ग्रन्थों का
उल्लेख बुनियु नंजियो ने अपनी तालिका में दिया
है । नागार्जुन ने 'सुहृल्लेख' अर्थात् अपने उन
पत्रों का संग्रह किया था, जिसे उन्होंने पत्र
स्वरूप अपने मित्र यज्ञश्री गौतमीपुत्र को लिखा
था । नागार्जुन की जीवनी का अनुवाद चीनी
भाषा मे कुमार जीव ने सन् ४०५ ई० में किया
था । नागार्जुन का तिब्बती नाम है क्लुसग्रुव ।
प्राकृत आख्यायिका लीलावती के अनुसार नागा-
र्जुन पोट्टिस तथा कुमारिल के साथ शातवाहन
की राजसभा मे रहते थे ।
नागार्जुन सिद्ध हस्त लेखक थे । उनकी रचना
शैली तथा युक्ति विश्व साहित्य में प्रसिद्ध है ।
माध्यमिक कारिका नागार्जुन के पाण्डित्य, विद्वत्ता,
तर्कबुद्धि, दार्शनिक विचार तथा उसके व्यावहारिक
ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है ।
नागार्जुन शून्यवाद का आचार्य है । वह कहता है :
न सन् नासन् न सदसत् न चाप्यनुभयात्मकम् ।
चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥
नागार्जुन की दृष्टि में मूलतत्त्व शून्य है ।
किसी भी पदार्थ का स्वरूप निर्णय करने में
चार ही कोटियो का प्रयोग संभाव्य हैं । पहला
अस्ति है । दूसरा नास्ति है । तीसरा तदुभयम्
चौथा नोभयम् है । परमार्थ इन चारो कोटियों