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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 984 में से

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पृष्ठ 327

२३८ राजतरंगिणी

के साथ आर्य एवं बोधिसत्व दोनों शब्द होने के
कारण प्रकट होता है । बौद्ध जगत् में उसका अत्य-
धिक आदर था । भूमीश्वर शब्द का प्रयोग कल्हण ने
यहाँ राजा के अर्थ में नहीं किया है । बोधिसत्त्व राजा
नहीं हो सकता । वह भौतिक जगत् से, उसकी
सम्पदाओ से, उसके ऐश्वर्यो से अलग रहता है । यहाँ
कल्हण ने उसे कश्मीर मण्डल का अधीश्वर उसी
प्रकार कहा है जैसे 'एकलिंग' जी मेवाड़ के अधीश्वर
हैं। यहाँ पर यह शब्द नागार्जुन की कश्मीर राज्य में
महत्ता तथा उसके प्रभाव के कारण प्रयोग किया
गया है । उसका प्रभाव राजा पर था । राजा का
प्रभाव कश्मीरमण्डल पर था । अतएव वास्तव में
कश्मीर मण्डल का वह भूमीश्वर तुल्य था ।
नागार्जुन बौद्ध दर्शन के माध्यमिक सम्प्रदाय का
समर्थक था । उन्हें शून्यवादी कहा जाता है । उनका
प्रसिद्ध ग्रन्थ 'माध्यमिक कारिका' अथवा 'माध्यमिक
शास्त्र' है । वह २७ प्रकरणों में विभक्त है ।
कारिकाएं ४०० हैं। यह माध्यमिक दर्शन का प्रधान
ग्रन्थ है। महायान सूत्रो को संक्षेप रूप से इनमे
संकलन किया गया है । इस महान् ग्रन्थ द्वारा नागार्जुन
की अन्तर्दृष्टि, विवेक, तर्क तथा मेधा शक्ति का
परिचय मिलता है ।
हिमालय निवासी एक अति वृद्ध भिक्षु से
नागार्जुन सूत्र प्राप्त हुआ था । एक मत और है ।
अश्वघोष से काशी मे नागार्जुन ने शिक्षा प्राप्त की
था । यही उसे महायान सिद्धान्त से प्रथम बार
सम्पर्क स्थापित हुआ था। मै स्वयं निश्चय करने में
अपने को असमर्थ पाता हूँ कि उनमे कौन बात
सत्य है।
युवानचाग ने बौद्ध धर्म को विश्व मे प्रकाशित
करने वाले चार सूर्यों का वर्णन किया है। उसमें वह
अश्वघोष, कुमारलब्ध, आर्य देव तथा नागार्जुन को
स्थान देता है । इस समय तक नागार्जुन की २०
रचनाओं के चीनी अनुवाद प्राप्त हो चुके है ।
नागार्जुन द्वारा प्रतिपादित शून्यवाद के मुख्य
व्याख्याकार पांचवी शताब्दी मे बुद्ध पालित तथा
भाव विवेक हुए हैं ।
कथा है। नागार्जुन विदर्भ में एक ब्राह्मण के घर
जन्म लिया था । अपने पिता का एक मात्र पुत्र था ।
पिता को बडी उम्र में पैदा हुआ था । ज्योतिषियो ने
कहा । नागार्जुन केवल ७ वर्ष जीवित रहेगा । माता
पिता दुःखी हुए । सातवें वर्ष उसे नालन्द विश्वविद्या-
लय मे विद्यार्जनार्थ भेज दिया। उसने ९० दिनो मे
त्रिपिटको का अध्ययन कर लिया था ।
आचार्य राहुल से नालन्दा में नागार्जुन का
सम्पर्क स्थापित हुआ । वह भिक्षु बन गया । लोग
नवयुवको का स्वरूप धारण कर उसका प्रवचन सुनते
थे । नाग जाति के आमन्त्रण पर उनके बीच तीन
मास व्यतीत किया। नागाओ के सम्पर्क के कारण
उसका नाम नागार्जुन पड़ गया ।
एक कथा और है कि अर्जुन वृक्ष की छाया में
उसका जन्म हुआ था। अतएव नाग तथा अर्जुन
मिलाकर उसका नाम नागार्जुन पड गया था ।
नागार्जुन महायान सम्प्रदाय का प्रवर्तक था ।
उसने तिब्बत में अपने दर्शन एवं मतका प्रचार किया ।
वह कवि, दार्शनिक तथा वैद्य था । एक और
कथा तिब्बत में नागार्जुन के विषय में प्रचलित है ।
नागार्जुन के जन्म के समय से माता पिता ने ज्योति-
षियों से सम्पर्क स्थापित किया । यह प्रथा आज भी
प्रचलित है । ग्रामो में यह कार्य पुरोहित करते हैं ।
उनके पास पत्रा होता है । एक रिकार्ड भी रखते हैं ।
उनमें ग्राम के प्रत्येक व्यक्ति के जन्म एवं मृत्यु का
दिन तथा समय लिखा रहता है । मुझे भी अपना
जन्म दिन तथा काल मालूम नही था । हमारे ग्रामीण
पुरोहित से लगभग २० वर्ष पश्चात् मिला था । यह
यह प्रथा कम होती जा रही है । साक्षरता के प्रचार
के कारण लोग अपने यहाँ डायरी आदि में लिखने
लगे हैं । अतएव अब ग्रामों के पुरोहितों के यहाँ
रिकार्ड मिलना कठिन होता जा रहा है।