राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ राजतरंगिणी
ने मधुमती नदी का उल्लेख किया है । यह वर्तमान
नदी ( मोहर ) है ।
पिपीलिका का वर्णन महाभारत में मिलता है ।
तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः ।
जातिरूपं द्रोणमेयमहापुंः पञ्चशो नृपः ॥
( सभापर्व : ५२-४, )
हिरोडोटस भी पिपीलिका का वर्णन करता है
जो चींटियों द्वारा एकत्रित किया जाता था ।
( ३:१:१०५ )
परशुराम भगवान् ने क्षत्रियों का २१ बार
संहार कर, मधुमती के तटपर केशव की मूर्ति स्था-
पित की थी । यहाँ पर बलि के साथ पूजा की
जाती थी । परशुराम ने गृद्धकूट पर्वत पर भी विष्णु
की प्रतिमा स्थापित की थी । नीलमत पुराण
परशुराम को भगवान् का अवतार नहीं मानता ।
इन्द्रकीलम् समारुह्य गोसहस्रफलम् लभेत् ।
तथा मधुमतीतीरे शाण्डिल्येन निवेशितम् ॥
—1230 : १४४३, १४४४
शाण्डिलीमधुमत्योश्च स्नातो यः संगमे नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोक स गच्छति ॥
—1233 : १४४६
मधुमत्यास्तयोश्चैत्र स्नातस्य नृप संगमे ।
कथितं मुनिभिः पुण्यमश्वदानस्य यत्फलम् ॥
—1239 : १४५२, १४५३
ततः प्रभवमासाद्य मधुमत्या मनोहरम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते ॥
—1240 : १४५३, १४५४
काश्मीर में एक दूसरी मधुमती का वर्णन मिलता
है । यह वितस्ता नदी में मिलनेवाला बन्द पोर
नाला है ।
कृष्णावितस्तासंयोगे गोसहस्रफलम् लभेत् ।
वितस्तामधुमत्योश्च संगमे त्रिदिवम् व्रजेत् ॥
—1229 : १४४२
कुलारणी पापहरा च कृष्णा
नदीसुपुण्या मधुमत्यथापि ।
नदी परुष्णी च तथात्र पुण्या
प्रयान्ति दिव्या वरदां वितस्ताम् ॥
—1390 : १५०८
(३) सरस्वती : शारदा तीर्थ के ठीक दूसरी
तरफ उत्तर मे तुषारमण्डित पर्वतमाला है । चिलास
से वही एक बड़ी नदी कृष्णगंगा में आकर मिलती
है । इस नदी को कनकतोरी कहते हैं । यही शारदा
माहात्म्य मे वर्णित सरस्वती नदी है। यह नदी पंजाब
की सरस्वती नदी नहीं है । एक और नदी शाण्डिली
का उल्लेख मिलता है । मधुमती तथा दुर्गा मन्दिर
के समीप इसका स्थान माना गया है ।
नीलमत पुराण में पंजाब की सरस्वती तथा
काश्मीर दोनों का उल्लेख मिलता है :
यमुनां यमपाशाङ्गी शतद्रु ं द्रुतगामिनीम् ।
सरयू ं यूपसंपन्नां तथा देवीं सरस्वतीम् ॥
—91 : १३२, १३३
उत्तीर्य यमुनां देवीं तथा देवीं सरस्वतीम् ।
कुरुक्षेत्रं तथा दृष्ट्वा सञ्चितैर्यन्त्र विधुता ॥
—126 : १६९
मकरेण ययौ गंगा कूर्मेण यमुना नदी ।
वृषारूढ़ा शतद्रुश्च महिषेण सरस्वती ॥
—153 : २०४, २०५
ऋद्धियुग्दिस्तथा निद्रां धनेशं नलकूबरम् ।
शंखपद्मौ निधी पूज्यौ भद्रकाली सरस्वती ॥
—585 : ७०६
सरस्वत्यौघनाशा च सुवेरुः विमलोदका ।
पुष्करादीनि तीर्थानि वितस्ताद्याश्च निम्नगाः ॥
—600 : ७२१, ७२२
शुद्धा सरस्वती चैव संयोगं यत्र गच्छतः ।
तत्र स्नातस्य रामस्य करौ शुद्धिमुपागतौ ॥
—1183 : १३९५