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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 984 में से

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पृष्ठ 162

प्रथम तरंग ७९
आलोक्य शारदां देवीं यत्र संप्राप्यते क्षणात् ।
तरङ्गिणो मधुमती वाणी च कविसेविता ॥ ३७ ॥
वहाँ देवी शारदा की तीर्थयात्रा के समय यात्री कवि पूजित तरंगिणी मधुमती एवं
सरस्वती दोनों के समीप पहुँच जाता है ।
पर लोगों से उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन किया ।
परन्तु कश्मीरियों ने उसपर विश्वास नहीं किया ।
उनका कहना था । जिस शिखर पर श्री स्टीन पहुँचे
थे । वह हरमुकुट नहीं था । वहाँ किसी प्राणी का
पहुँचना कठिन है । श्री स्टीन के साथ एक मुसलमान
कुली था । उससे पूछा गया । शिखर पर पहुँचे थे
या नहीं । उसने शिखर पर चढ़ने की बात पूर्णतया
अस्वीकार कर दी । वह शिखर पर चढ़ने की
कल्पना भी नहीं कर सकता था ।
३७ ( १ ) जनश्रुति है । आद्य श्री शंकराचार्य
का कश्मीर मे आगमन हुआ था । वे शारदा मन्दिर
में जाना चाहते थे । उन्हे मन्दिर प्रवेश करने की
आज्ञा तत्कालीन पण्डितों ने नहीं दी । शारदा
पीठ प्राचीन काल में काशी की तरह विद्या की
राजधानी थी । वहाँ के विद्वानो का समस्त भारत में
आदर तथा सम्मान किया जाता था ।
शारदा पीठ के विद्वानों ने पुरानी परम्परा के
अनुसार शंकराचार्य के सम्मुख एक शर्त रखी ।
वे यदि शारदा पीठ के विद्वानो के प्रश्नों का
उत्तर दे दें तो उनका प्रवेश मन्दिर में हो
सकता था ।
कल्हण वर्णित चन्दन बिन्दु के सम्बन्ध में श्री
स्टीन ने श्लोक की टिप्पणी में लिखा है कि उन्हें
किसी पुस्तक तथा स्थानीय जनश्रुति परम्परा से
इसका समर्थन नही मिल सका । श्री स्टीन सितम्बर
मास में शिखर पर पहुँचे थे । उन्होने विस्तृत वर्णन
नहीं लिखा है । कश्मीर में यह महीना श्रेष्ठ समझा
जाता है । बरफ गिरने का भी यह समय नहीं है ।
कश्मीर का एक पुराकालीन नाम शारदा
पीठ अथवा शारदा क्षेत्र था । शारदी का स्थान पठन
पाठन तथा विद्याध्ययन के लिये प्रसिद्ध था । विद्या
का केन्द्र माना जाता था ।
बौद्ध जगत् के तक्षशिला तथा नालन्द विद्या-
केन्द्र थे । हिन्दू जगत् में यह धर्म तथा विद्या का
केन्द्र था । कश्मीर में उसे वही स्थान प्राप्त था
जो उत्तर भारत में काशी, पूर्व मे नवद्वीप तथा
दक्षिण मे कांची को था ।
मैं भूतेश्वरादि स्थानो तथा हरमुख पर्वत के
मूल तक पहुँचा था । शिखर १७ हजार फोट की
ऊँचाई पर है । मैं हाईब्लड प्रेसर का मरीज हूँ ।
पैदल इतनी ऊँचाई पर चढ़ना मेरे लिए असम्भव
था । मैने जो वर्णन लिखा है उसका मुझे गौण ज्ञान
है । श्री स्टाइनादि लेखकों तथा स्थानीय लोगो द्वारा
सुनी बातो के आधार पर लिखा है ।
इस स्थान के विषय में श्रीनगर स्थित वृद्ध
ब्राह्मणों से मैने कुछ जानकारी प्राप्त करनी चाही ।
एक आस्तिक वयोवृद्ध पण्डित ने बताया । पुरानी
पद्धति के अनुयायी पण्डितो में अब भी प्रथा प्रच-
लित है । जिस दिन शारदा में स्नातको को प्रमाण
पत्र दिया जाता था उसे ही किसी न किसी रूप में
प्रचलित देखने के लिये आज भी सनातन धर्मावलम्बी
ब्राह्मण अपने विद्यार्थियो को प्रमाणपत्र देते हैं ।
अथवा विद्यार्थी को स्नातक बना देते हैं ।
किसी युवक अनुसन्धानप्रिय विद्वान् को यहाँ
की यात्रा कर वास्तविकता का पता लगाना चाहिए ।
कल्हण ने जो बातें लिखी है वे प्रायः सत्य सिद्ध
हुई हैं । चन्दन बिन्दु किस रूपक के आधार पर
लिखा था । इन्हें जानना चाहिए । पर कथानक
कपटेश्वर में तैरते काट टुकड़ों से मिलता है ।