पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
१७२ उपसंहारिणी टिप्पण ।
चार नित्त हैं-तथापि एक यह दोहा भी हम कविवचनसुधा से उद्धृत कर के प्रमाण में प्रवेश
करते हैं-"सत्त सुबचन कबीर के, चित्त देय सुन लेहु ॥ अरु नानक गुरु के वचन, सत्त मत्त करि
गेहु" ॥ तथा लालशाकृत विनयपत्रिका में:-"दान्च मोत पात्र देख हर्ष सर्व सत्त लेप मे।
दीन रेख मेख मार भाल मन्द के" । यह शब्द ऐसा अप्रसिद्ध नहीं है कि जिस के प्रयोग के
विषय में हिन्दी भाषा के विद्वानों को किंचित् भी संदेह होय अतएव हम अधिक उदाहरण
नहीं लिखते हैं ॥
२ श्रीमद्वल्लभ संप्रदाय में जो अष्ट-छाप कर के प्रसिद्ध हैं उन में के एक कुंभनदासजी ने
"चावद्विसि हरि रूप रम्या" अपने एक कीर्त्तन में कहा है ॥
३ इन भारत्थ । सारत्थ । और पारत्थ शब्दों के प्रयोग के विषय में हमने हमारी प्रथम संख्या
में बहुत कुछ कह ही है परंतु फिर भी हम एक प्रमाण अष्ट-छापवाले छीत स्वामी के एक
कीर्त्तन में से यह बताते हैं "भारत्थ में सारत्थ है हरि जू कहाये सारथी" और पंडित कन्हैयालालजी
कृत छंद ! प्रदीप नामक ग्रंथ से वैसे ही अन्य शब्दों के प्रयोगों के उदाहरण भी विदित करते
हैं यथा :-(१) करि गहि भार समत्थ । (२) यश पायो नृप मत्थ । (३) मत्यन नत करि
लज्जित दिगज । (४) सुसज्जिय अगति । (५) उत्थिय समुद वट्ठिय लहरि । (६) रहि
तदत्यक्ति जियसुलरि (७) लखि दव्वत सब नृपति (८) सिंहवली समरत्थ हत्थिवर मत्य विदारन ॥
४ अब शेष चूक शब्द के विषय में भी हमारी लिखित संख्या में लिखे के सिवाय हमको यह
कहना है कि उस के शब्दार्थ तौ वहीं हैं कि जो डाक्टर होर्नली साहब ने हिन्दी शब्दों की
धातुओं के संग्रह में वर्णन किये हैं, किन्तु यह शब्द जिस विषय के प्रसंग में प्रयोग होता है
वैसा ही उसका भावार्थ हो जाता है जैसे कि छन के अर्थ में अष्ट-छापवाले परमानन्ददासजी
ने उस को प्रयोग किया है "अहो हरि बाँल सों चूक करी" इसी तरह समझ लेना चाहिये कि जब
वह छल से मारने के प्रसंग में प्रयोग होता है तब उस का वैसा भावार्थ, ग्रहण किया जाता
है । राजपूताने के किसी २ कवि को हमने ऐसा भी कहते हुए सुना है कि यह चूक शब्द
राजपूताने की भाषा में ही प्रयोग हुआ मिलता है और हिन्दी भाषा के किसी काव्य में
किसी भी अर्थ में यह शब्द प्रयोग नहीं हुआ है परंतु उनका यह कहना हमारे नीचे लिखे
प्रमाणों से बिलकुल ही असत्य प्रतीत होता है ॥
॥ वृन्द सतसही ॥
दोहा ॥ पिशुन छल्यो नर सुजन सों, करत विसास न चूक ।
जैसे दाध्यो दूध को पीवत छाछहि फूंक ॥
मूरख गुन समझै नहीं, तौ न गुनी में चूक ।
कहा भयो दिन की विभौ, देखौ जौ न उलूक ॥
॥ नाथ कवि अर्थात् कवि लोकनाथजी चौबे कृत ॥
कवित्त ॥ सुखद रसाल को रिसाल तह तापै बैठि, ऐंठि बोल बोलै पिक, मधुप दुहू दुहू ॥
कुंज कुंज कारे हैं कुटिल अलि पुंज पुंज, गुंज गुंज फूल रस, चुहकै चुहू चुहू ॥
चूक बिन प्यारीं कीन्ह मेरो मन टूक टूक, कूक सुनै हूक परै, करत उहू उहू ॥
नाथ दिसि चार अंधियार ही जनात मोहि तातें किल कोकिला, कहत कुहू कुहू ॥
उपसंहारिणी टिप्पणी । १७३
॥ सूरसागर ॥
राग काफी ॥
मैं अपने कुलकानि डरानी । कैसे श्याम अचानक आये मैं सेवा नहीं जानी ॥
यहै चूक जिय जानि सबी सुनि मन लै गये चुराई । तनतैं जात नहीं मैं जान्यौं लियो श्याम अपनाई ॥
ऐसे ठगत फिरत हरि घर घर भूलि कियो अपराध । सूर श्याम मन देहि न मेरो पुनि करिहौं अनुराग ॥
राग विहागरा ॥ कहा करौं गुरजन डर मान्यां ।
आये श्याम कौन हित करि कैं मैं अपराधििन कछु न जान्यों ॥
ठाढे श्याम रहे मेरे आँगन तब तैं मन उन हाथ विकान्यों ।
चूक परी मोकों सबही अंग कहा करौं गई भूल सयान्यों ॥
वै उनही को नए रूप मन मेरी करनी समुझि अयान्यों ।
सूर श्याम संगम उठि लाग्यौ मो पर बारं बार रिसान्यों ॥ ३७ ॥
बीच कियो कुल लज्जा आई ।
सुनि नागरी बकस यह मोकों सन मुख आये धाई ॥
चूक परी हरि तैं मैं जानी मन लै गये चुराई ।
ठाहे रहे सकुच तो आगैं राख्या बदन दुराई ॥
तुम हो बडे महर की चेटी काहे गई भुलाई ।
सूर श्याम हैं चोर तुम्हारे छांडि देहु डरपाई ॥ ९० ॥
॥ कवि लल्लूलाल कृत ॥
दोहा ॥ धरम राज सौं चूक करि । दुरजोधन लै लीन्ह ॥
राज पाट अरु वित्त सब । घनेवास दै दीन्ह ॥
करी चूक प्रहलाद पै । हिरन असुर परचंड ॥
हरि सहाय हित अवतरे । असुरन किये बिखंड ॥
॥ रामायण ॥
छमहु चूक प्रान जानत केरी । चहिये विप्र अरु कृपा घनेरी ॥
॥ स्त्रियें गाया करती हैं ॥
मेरा भया चुक्यान हियारी । कार करत मैं घर वर चूकूं
फुंका जात सई जीया री ॥
॥ कबीर ॥
काशी का मैं बासी कहिये, करम दशा का हीना ।
राम भजन में चूक पडी तब पकर जुलाहा कीना ॥
: ॥ कहावत ॥
आहार चूके वह गये व्योहार चूके रह गये ।
दरबार चूके बह गये सुसराल चूके बह गये ॥
१७४ उपसंहारिणी टिप्पणी ।
॥ चूरनवाले ॥
है चूरन खट्टा चूक । जिस सें नित्त लगेगी भूक ॥
५ हम अनुस्वार सहित शब्दों के प्रयोग के विषय में जो ऊपर कह आये हैं उस के नीचे लिखे
उदाहरणों को अवलोकन करने से आशा है कि हमारे पाठकों को पूर्ण संतोप हो जावेगाः-
॥ सूरसागर ॥
राग भैरवी ॥ भजि श्री विट्ठल चरण सरोजं । नखमणि दीधिति दमित मनोजं ॥
इच्छसि यदि सततं सुख सारं । त्यजसि न किमिति विषय धृतभारं ॥
यदि बांछसि हरि भक्ति सुखं । कुरु चपलं शरणागत यत्नं ॥
प्राप्य सुदुर्ल्लभ नर वर देहं । परि हर सकल निगम संदेहं ॥
मानय हृदय मयोदित वचनं । तदया सिनो चेदतिशय पवनं ॥
वत्सपदं भावय भव जलधिं । अंत समै भवधिन बर्बधिं ॥
नाथ तबाह मतीरण रावं । पूरय सततं मिमं मयि भावं ॥
तब गुण गण कथिता मृत गाये । प्रार्थ्य मिदं दिश तव रघुनाथे ॥
॥ दासयशा ॥
छंद ॥ दै भक्ति रमा निवास त्रास हरण शरण सुखदायकं ॥
सुपधाम राम नमामि काम अनेक कवि रघुनायकं ॥ १०४ ॥
सुर वृंद राजत द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलित बलं ॥
ब्रह्मादि शंकर सेव्य राम नमामि करुणा कोमलं ॥ १०५ ॥
तोटक छंद ॥ गुण ज्ञान निधान अमान मजं । निति राम नमामि विभुं विरजं ॥
भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं । खल वृंद निकंद महाकुशलं ॥ १०६ ॥
बिनु कारण दीन दयालु हितं । छवि धाम नमामि रमा सहितं ॥
भव तारण कारण कार्य परं । मनसं भव दारुण दोष हरं ॥ ९० ॥
शर चाप मनोहर तूणि धरं । जल जारुण लोचन भूप वरं ॥
सुप मंदिर सुंदर श्रीरमणं । मद मार महा ममता शमनं ॥ ९१ ॥
॥ खालशा कृत विनय पत्रिका ॥
भैरवी ॥ रे मन सन्त चरण धरु माथं ।
निस वासर जिनके जग नायक वास करत हैं साथं ॥ १ ॥
तिन को छोड़ विश्व में भटके वेश्याको करि नाथं ।
भक्ति सहित सेवा तुम करते वह मारत है लाथं ॥ २ ॥
तत्रापी कहु लाज न आवत मलत चरण धरि हाथं ॥
सिंह मदन गोपाल साधु पद गहु अघहर सम पाथं ॥ ३ ॥
उपसंहारिणी टिप्पण । १७५
॥ गोस्वामी श्री लक्ष्मीनाथजी परमहंस कृत पदावली ॥
नमो नमो गीता हरि वंशं । सुर नर मुनि सज्जन अवतंसं ॥
कोमल पद उपनिष श्रुति अंगं । हरि मुख कथित सन्त हिय हंसं ॥
विमल श्याम भाषित गन संगं । देव दनुज मानव अघि घंसं ॥
भक्ति विराग ज्ञान परगाशं । काम क्रोध मद मोह विनाशं ॥
सकल शास्त्र सम्मत निति शोशं । आर्य धर्म सुत्र दायक हंस ॥
श्रुति सागर तीरथ फल देशं । कलि मल तिमिर प्रकास दिनेशं ॥
गुण अनन्त कहि गावत शेषं । चतुरानन गण देव महेशं ॥
सुनत सकल मन होत हुलाशं । लक्ष्मीपति अति पाप विनाशं ॥ १ ॥
॥ नरहरदास कृत अवतार चरित्र ॥
भुजंगी ॥ सुगन्धं विगन्धं न अस्तुति गारी । विभेदं न सत्रुं न मित्रं विचारी ॥
न मंहिमा न माया न मूढं न मोहं । न रंगं विरंगं न दावा न द्रोहं ॥
न सीतं न तापं न संगं कुसंगं । न भावं न भिष्यान अंगं अनंगं ॥
मुखं भूमि सज्या न हासं न वासं । यहै बाहैं आनै ततौ पंच यासं ॥
सम विष्वहं भूमि पंथ सहज्ज । बसंतं दिगं बीत रागं विलज्जं ॥
विमोहं विदेहं न इन्द्री विकारं । अघानैं रहे नित्ति वातं अहार ॥
विलेपं न ओपंऽ आगो विचार । धरी पुष्प माला गलै बिष्य धारं ॥
प्रकासी जु निंदा महा मोद पावै । हसे ताल दे आप औरै हसावे ॥
अलेपं अकेले रहे अप्रकासं । निरा पेत निर्बंध नग्नं निरासं ॥
अनाजूत अवधूत माया अतीतं । अमोहं अछोहं अद्रोहं अभोतं ॥
अनाम अकामं अठामं अजेयं । अनाधार आकार महिमा अमय ॥
पशु वृत्ति लीने भषै पान पानी । विचारं प्रचारं विहारं बिमानी ॥
यह महाकाव्य आज तक महाकवि चंद का बारहवीं शताब्दी का रचा हुआ
एक बड़ा प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ कर के हमारे स्वदेश में प्राचीन काल से चला आता है
अकृत्रिमता
और उसकी यथार्थता में आज तक क्या तो स्वदेशी और क्या किसी
विदेशी विद्वान को कोई ऐसी शंका नहीं हुई है कि जैसी हमारे परम
प्रिय मित्र महामहोपाध्याय कविराजजी श्री श्यामलदासजी को बैठे बैठाये
हो गई है । यद्यपि हम इस महाकाव्य को अभी तक अनुकूल दृष्टि से ही देखते हैं किन्तु उसी
के साथ हम उसकी परीक्षा करने में प्रतिकूल दृष्टि देकर उसके गुण-दोषों को भी देखते जाते
हैं और जब हमको उस में कोई दोष देने जैसी बात नहीं मिलती तब उसी स्थान पर हम
अपनी टिप्पण में अपना अभिप्राय लिख प्रकाश करते हैं। हमारे पाठकों को यह भले प्रकार
समझ रखना चाहिये कि जिस दिन जिस स्थान में जो कुछ हम को क्रित्रिम दीखेगा उसे हम
उतने ही बल पूर्वक दोष देकर प्रकाश कर देंगे कि जैसे हम उसके गुणों को प्रकाश करते हैं
और जो कोई बात हमको उस में दोष देने जैसी मिलेगी ही नहीं तो फिर हम अशक्त हैं।
इस महाकाव्य की क्रित्रिम अनुमान करने में जितने हेतु दिये गये हैं उन में से प्रत्येक के विषय
में हम निम्न लिखित कुछ निवेदन करते हैं:-
९७६ उपसंहारिणी टिप्पण ।
१ इस महाकाव्य में संवत् लिखे हुवे हैं वह मुसलमानी तवारीखों में लिखे और संवत शोध
हुवे संवतों से नहीं मिलते और उन में ९० वा ९१ वर्ष का अन्तर पड़ता है अतएव इस बात
का निर्णय करने को हमारी टिप्पण १६८ और ३५५ । ५६ वादी पढ़ें कि उनके पढ़ने और
पक्षपात रहित मनन करने से हम आशा करते हैं कि वादी की संवत् के अंतर विषयिक
शंका निवारण हो जायगी ॥
२ इस ग्रंथ में मुसलमानी भाषादि के शब्द प्रयोग हुवे दृष्टि आते हैं उनके विषय का
समाधान हमारी इसी उपसंहारिणी टिप्पण का भाषा संबन्धी चौथा लेख खंड अवलोकन करने
से भले प्रकार हो सक्ता है ॥
३ अब तक पृथ्वीराजजी के समकालीनों में से केवल रावल समरसीजो को ही आक्षेप करने
वाले ने उदाहरण में ग्रहण किये हैं कि उसके विषय में केवल आबू और चीतोड़ की पांच
चार प्रशस्तियों से ही संशय-करने वाले को संशय होता है अर्थात् संशय का आधार उन ही
प्रशस्तियों पर है। यदि उन प्रशस्तियों के संवतों को विद्वान लोग भले प्रकार परीक्षा कर के
यह निश्चय कर लें कि वे रावल समरसी जी के ही समय की हैं और उनके संवत् अमुक
प्रकार के हैं और इसको पृथ्वीराजजी समरसीजी और पृथाबाईजी के जो पखाने प्राप्त हुवे हैं
उन के संवतों को भी उसी प्रकार जांच देखें तो फिर रावल समरसीजी के समकालीन होने
में कुछ झगड़ा ही न रहेगा क्योंकि झगड़ा तभी तक रहता है कि जब तक किसी विद्वान
को किसी प्रकार का पक्षपात होता है और वह दर्पण लेकर मुख दिखते हुवे भी नहीं दूर
होता है। जहां तक हमने रावल समरसीजी के विषय में शोध किया है वहां तक हमको
इस बात में कुछ संदेह नहीं है कि वे पृथ्वीराजजी के बहनेऊ और समकालीन थे। आबू
और चीतोड की प्रशस्तियों के संवतों को समझ लेने के लिये एक रोज की बात हमने हमारी
टिप्पण ३५५ । ५६ में अति संक्षिप्त रूप से कही है। इस के अतिरिक्त हम एक बड़ी अद्भुत
अपूर्व बात पर विद्वानों को ध्यान दिलाते हैं कि कविराजजी ने इस महाकाव्य के संवत्
१६४० से १६७७ के भीतर जाली बनने के सिद्ध करने में नीचे लिखे प्रमाण कहा है :-
“इस किताब में मेवाड़ के राजाओं की बहुत सी प्रशंसा रावल समरसिंहजी के नाम से
की है और एक स्थान में उनको आशिंस देने में यह शब्द लिखे हैं-
(१) कंलकियां राय केदार ॥
(२) पापियां राय प्रयाग ॥
(३) हत्यारां राय वणारसी ॥
(४) मदवान राय राजान री मंग ॥
(५) सुलतान यहण मोरखन ॥
(६) सुलतान मान मलन ॥
इन पदवीयों से मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंहजी (सांगा) की ओर संकेत है”—इत्यादि ॥
अब विद्वानों को रासे के उस रूपक को अवलोकन कर के परीक्षा कर समझना चाहिये कि
जिस में से यह वाक्यखंड उद्धृत किये गये हैं, वह रूपक नीचे लिखे प्रमाण हैं :-
छंद पद्धरी ॥ सामंत सब्ब मनुहार कीन । प्रोहित्त राम आसीस दीन ॥
हरि सिंहि दिदु वरदान भट्ट । उच्छल्यो चंद पैपै सु घट्ट ॥
हुहु पष्ष चँवर सिर धरिय छत्र । वरदाइ दंत आसी तत्र ॥
उपसंहारिणी टिप्पणी । १७७
दृट्टियो सिंघ बरदाइ देपि । बोलंत विरद बहु बिधि विसेपि ॥
चीतोर राज कारम्म कौन । पुम्मान पाट पग अचल दीन ॥
मेर गिरि सरिस चित्तौर मानि । किरनाल तेज बढ्ढे पुमान ॥
जैचंद समह जिन जुद्ध कीन । मानों कि उरग जनु मौर पीन ॥
कलंकिया राय केदार राय । कवदेत विरद मनउमँग चाय ॥
पापी राय प्राग वड समान । कृषन दरिद्र करतार जान ॥
हित्यार राइ कासी अभंग । मद्रुआंन राइ गंगा उतंग ॥
सुरतान मलन बंधन समोप । हिंदूक राइ टालच दोप ॥
उज्जैन राइ बंधन समत्थ । आचार राइ जुज्वरह पथ्थ ॥
भीमंगराइ भंजन सुपेत । जस लयो धवल रानिंद जेत ॥
रिनथंभ राय सिर दंड कीन । अव्वुन्ना राइ गढ लेइ दीन ॥
उय्याप राइ छापन समत्थ । सोपन सरीर प्रथिराज सत्थ ॥
दप्यनी साह भंजन अलग । चंदेरि लिहु किय नाम जग ॥ ४१ ॥
हमारे पाठकों को इस रूपक का तात्पर्य निकालने के पहिले यह जान लेना अत्यावश्यक
है कि वह रासे के समरसी दिल्ली सहाय नामक समय में का है। रासे की किसी पुस्तक में तो
यह समय पृथक है और किसी में वह बड़ी लड़ाई नामक समय के आदि में ही मिला हुआ है।
इस रूपक के अन्तर्गत वृत्त का प्रसंग यह है कि रावल समरसीजी अपनी महाराणीजी श्री पृथा-
बाईजी सहित अपने साले पृथ्वीराजजी की सहायता करने को चीतोड़ से दिल्ली पहुंचे और वहां
उन का आदर सम्मान वहां के सब राज-पुरुषों ने करना प्रारंभ किया कि उसी प्रसंग में महाकवि
चंद बरदाई ने भी वैसे ही रावलजी को आशीष दियो कि जैसे वर्तमान काल में प्रत्येक देशी
राजस्थानों में चारण और राव आदि स्तुति पाठक दिया करते हैं । रावलजी श्रीसमरसीजी में
जो २ मुख्य गुण थे और उनों ने जो २ बड़े २ काम अर्थात् शौर्य किये थे उन सब को उन की
प्रशंसा में कवि चंद ने प्रयोग कर के यह बिरदावली कही है । अब इस में यह बात विचारने
की है कि कविराजजी ने जो इस रूपक में के-“कलंकिया राय केदार”-जैसे विशेषणों का
महाराणाजी श्रीसंग्रामसिंहजी (सांगा) की ओर संकेत होना अनुमान करके रासे के जाली बनने
के समय के प्रारंभ का सं० १६४० निश्चय किया है वह इस मूल रूपक के अवलोकन करने से
सत्य मालूम होता है कि नहीं । यदि हम कविराजजी के अनुमान को यथार्थ होना भी मान लें
परन्तु इस रूपक में-“कलंकिया राव केदार”-आदिकों के साथ ही-“जैचंद समह जिन जुद्ध
कीन-” और-“सोंपन सरीर प्रथिराज सत्थ” जैसे स्पष्ट विशेषणों के वाक्यखंडों को हम महाराणा
जी श्रीसांगाजी में कैसे घटा सकते हैं । क्या यह बात विद्वानों के कहने की है कि-“जैचंद समह
जिन जुद्ध कीन”-और-“सोंपन सरीर प्रथिराज सत्थ”-जैसे स्पष्ट विशेषणों को छोड़ देना-और-
“कलंकिया राय केदार”-आदिक को सांगाजी पर घटा कर केवल उन ही तुकों को क्षेपक बताईं होतीं तो भी
यह एक प्रकार से कुछ ध्यान में बैठने जैसी बांतें होतीं । हम यह भी नहीं समझ सक्तें हैं कि
इस रूपक से सं० १६४० कैसे सिद्ध होता है क्योंकि महाराणाजी श्रीसांगाजी का राज्य समय
कविराजजी के मानने के अनुसार सं० १५६५ से सं० १५८४ तक ही और संवत् १६४०
का वर्ष महाराणाजी श्री बड़े प्रतापसिंहजी के राज्य समय सं० १६५३ से १६५४ तक के में आता
१९२
१७८ उपसंहारिणी टिप्पण ।
है । रासे की सं० १६३१ । ३२ और १६४५ की लिखित पुस्तकें हमारे पास विद्यमान हैं । तथा
अकबर बादशाह ने पृथ्वीराज रासे की कथा अपने दरबारी भाट गंगजी से सं० १६२७ । २८ में
सुनी थी कि जिस के वृत्तान्त की एक सं० १६२९ की लिखी हुई चंद छंद वर्णन की महिमा
नामक पुस्तक हमको प्राप्त हो चुकी है और उसी के साथ जो समय स० १६४० से १६९० तक
का रासे के जाली बनने का अनुमान किया गया है उस समय में मेवाड़ में एक राणारासा नामक
ग्रंथ राव दयाल कवि ने बनाया है कि जिस को भी हमने शोध काढ़ा है । इस राणारासे की
पुस्तक सं० १६७५ की लिखी हुई से हम ने हमारे पुस्तकालय के लिये एक प्रति करवाई है और
हमारी प्रति से बहुत से अन्य भद्रपुरुष प्रतियें करवाते हैं । खैर यह सब बातें तो जाने दीजिये
और एक इस छोटी सी बात पर ही ध्यान दीजिए कि रासे की उन सब पुस्तकों के अंत में कि
जो मेवाड़ राज की एक पुस्तक से प्रति हुई हैं मूल पुस्तक के लिखने वाले लेखक के लिखे हुए
नीचे लिखे छंद प्राप्त होते हैं कि जिन में यत्किंचित वृत्त लिखा हुआ है । यह छंद हम आशा करते
हैं कि उन पुस्तकों में भी अवश्य होंगे कि जो एशियाटिक सोसाईटी बंगाल के पुस्तकालय में हैं :-
कवित्त ॥ मिलि पंकज गन उदधि । करद कागद कातरनी ॥
कोटि कवी काजलह । कमल कटिकतैं करनी ॥
हितिथि संख्या गुनित । कहै कक्का कवियांने ॥
दृह श्रम लेपन हार । भेद भेदै सोइ जाने ॥
दून कष्ट ग्रन्थ पूरन करय । जन सभ्या दुप नां लहय ॥
पालिये जतन पुस्तक पवित्र । लिपि लेपक बिनती करय ॥ १ ॥
गुन मनियन रस पोइ । चंद कवियन कर दिट्ठिय ॥
छंद गुनीतें तुट्टि । मंद कवि भिन भिन किट्ठिय ॥
देस देस विष्परिय । मेल गुन पार न पावय ॥
उद्दिम करि मेल वत्त । आस बिन अलस आवय ॥
चित्रकूट रान अमरैस नृप । हित श्रीमुप आयस दयौ ॥
गुन बीन बीन कहना उदधि । लपि रासो उद्दिम कियौ ॥ २ ॥
दोहा ॥ लघु दीरघ ओको अधिक । जो कछु अंतर होइ ॥
सो कवियन मुष सुद्धतैं । कहो आप बुधि सोइ ॥ ३ ॥
इन छंदों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि किसी कक्का नामक पुरुष ने मेवाड़राज्य के
अधीश बड़े श्री अमरसिंहजी (चित्रकोट रान अमरैस नृप) के आज्ञानुसार राज के पुस्तकालय के
लिये उक्त पुस्तक लिखी थी । इन महाराणाजी का राज्य समय कविराजजी के मानने के अनु-
सार सं० १६५३ से १६७६ तक का है । जब कि मेवाड़ राज की पुस्तक का उसकी अन्य प्रतियों
से सं० १६५३ से १६७६ के बीच में लिखा जाना अनुमान होता है तो फिर इस समय में जाल
बनना भला कोई कैसे मान सक्ता है । अब रहा संवत १६७१ की भविष्य बातों का विदित करने
वाला दोहा उसके विषय में हमने हमारी संरक्षा के लेखखंड २७ पृष्ठ ३५ में सविस्तर कह दिया
है अतएव यहां कुछ अधिक नहीं वर्णन करते हैं ॥
४ यद्यपि इस महाकाव्य के जाली बनने के अनुमान का प्रश्न तो रीति से किया गया है कि
"इस ग्रन्थ में लिखे पृथ्वीराजजी के समय के मनुष्यों के नाम और वृत्त उस समय की मुसलमानी
तवारीखो में लिखे हुओं से नहीं मिलते हैं परन्तु जिस प्रकार से उस प्रश्न का निर्णय किया
उपसंहारिणी टिप्पण । १७६
गया है उस से प्रश्नकर्त्ता की प्रतिज्ञा हानि और हेत्वाभास स्वयम् सिद्ध हैं । हमने इस विषय
में हमारी लिखी पृथ्वीराज रासे की सारता की अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ १५ और ३७ लेखखंड ११
और २८ और हिन्दी की के पृष्ठ १८ और ३६ और लेखखंड ११ और २८ में बहुत कुछ लिख
कर प्रकाश किया है। क्या जितना अंश इस महाकाव्य का मुसलमानी तवारीखों से मिलता
हुआ है वह उसके बनाने वाले ने उन तवारीखों को सोलहवीं सदी में पढ कर यह जाल
निर्माण किया है? क्या उस समय की हसन निजामी की तवारीख, तबक़ात नासरी, और
अबुलफ़िदा, आदि नामक तवारीखों में परस्पर कोई ऐसे विरोध नहीं हैं और क्या वे एक
दूसरे से सर्व प्रकार से परम सम्मत हैं? कविराजजी ने स्वयम् यह स्वीकार किया है कि तब-
क़ात नासरी ने मनुष्यों के अशुद्ध नाम लिखे हैं और अबुलफ़िदा ने संवत ही नहीं लिखे हैं
फिर उनके दोषों से यह महाकाव्य क्योंकर दूषित हो सक्ता है? क्या उक्त मुसलमानी तवारीखों
के कर्त्ताओं ने सब वृत्त यथातथ्य लिख कर केवल सत्य ही लिखने और मिथ्या कुछ भी न
लिखने का एक भंडा हाथ में लिया है? देखो क्या यह शोक की बात नहीं है कि तबक़ात
नासरी का ग्रंथकर्त्ता विचारा स्वयम् कहता है कि जिस वर्ष में पृथ्वीराजजी की अंतिम लड़ाई
हुई थी उसमें तौ वह उत्पन्न हुआ था और उसके ३५ वर्ष पीछे वह पहिले ही पहिल हिन्द
में आया था, उस ने जो कुछ इस विषय में लिखा है वह उसने एक मनुष्य से सुनकर लिखा
है, फिर हम नहीं जानते कि कविराजजी मिनहाज-इ-सिराज जैसे एक भले आदमी को क्यों
प्रत्यक्ष प्रमाण की साक्षी में घेरते हैं। हम पृथ्वीराजरासे और उस समय की सब मुसलमानी
तवारीखों को एक दृष्टि से देखकर यह कहते हैं कि जिस २ ग्रन्थकर्त्ता ने जो, जितना, और
जैसा, देखा और सुना, वह उसने अपनी इच्छा और शैली के अनुसार लिखा है; यदि उन में
से किसी की कोई बात हमको अयथार्थ प्रतीत और सिद्ध हो तौ हम उसको अस्वीकार कर.
सक्ते हैं, किन्तु हम उनमें से किसी को भी लोर्ड हेस्टिङ्गस के समय में जैसे नन्दकुमार को
जाल के अपराध में फांसी की शिक्षा दियी गई है वैसी शिक्षा विद्वानों के हाथ से कदापि
नहीं दिलाना चाहते हैं। निदान हम फिर भी प्रसन्नता और विचार पूर्व्वक कह सक्ते हैं कि
प्रत्येक ग्रन्थकर्त्ता ने अपने २ ज्ञान के अनुसार ऐतिहासिक वृत्त लिखे हैं चाहे उसमें कोई बात
असत्य भी क्यों न हो परन्तु उस असत्य बात के कारण से आदि से अंत पर्यंत कोई ग्रन्थ
जाली नहीं हो सक्ता । इस बात के मान लेने में हमको कोई लज्जित होने की भी बात नहीं
है कि यह पृथ्वीराज रासा चंद का लिखा हुआ सच्चा है, उसके दो एक समय उसके बड़े बेटे जल्ह
के लिखे हुवे हैं और उसमें जो कहीं २ कुछ क्षेपक अंश पीछे से किसी ने मिलाया होगा वह
विद्वानों के परीक्षा करने से स्वयम् तरजावेगा। अब तौ कोई बात अड़चल की रही ही नहीं
है क्योंकि यह आदि पर्व्व तौ हमने यथाशक्ति संशोधित करके हमारे पाठकों की सेवा में
अर्पण कर ही दिया है, कि उसी से हम इस महाकाव्य की अकृत्रिमता की परीक्षा करना
प्रारंभ कर सक्ते हैं और प्रति मास में हम यह भी सिद्धान्तकर सक्ते हैं कि यहां तक तौ कुछ
जाली अंश है अथवा नहीं ।
इस बात के जानने से हमारे पाठकों को बहुत प्रसन्नता होगी कि हमको शोध करने से
पृथ्वीराजजी और रावलजी श्रीसमरसीजी और महाराणी श्रीपृथाबाईजी के थोडे से खास
रुक्के और पट्टे परवाने प्राप्त हुवे हैं कि जिन में वही आनन्द विक्रमी संवत् है कि जो पृथ्वीराज
रासे में लिखा हुआ मिलता है । इन सब के फोटोग्राफ हमने एशियाटिक सोसाईटी बंगाल को
१८० उपसंहारिणी टिप्पणी ।
{|c|} \hline पृथ्वोराजजी,
समरसीजो और
पृथाबाईजी के
खास रुक्के पट्टे
परवाने आदि
\hline भेंट करने तथा उनकी सत्यता की परीक्षा करने के लिये हमारे स्वदेशी
परम प्रसिद्ध विद्वान मित्र राय बहादुर डाक्तर राजा श्रीराजेन्द्रलालजी मित्र
ऐल० ऐल० डी०, सी० आई० ई० की सेवा में भेजे हैं । उक्त डाक्तर साहब
अकस्मात् रोगग्रस्त हो गये कि जिससे यह हमारे बड़े परिश्रम से शोध किये
हुवे लेख उक्त विद्वत् मंडली में प्रवेश नहीं हो सके हैं किन्तु हम को आशा
है कि राजा साहब के नैस्थ्य होते ही उक्त लेख सोसार्टी में प्रवेश होकर
यह विषय विद्वत् मंडली में छिडेगा । यह विषय अभी हमारा सौंपा हुवा एक महान पुरातत्ववेत्ता
विद्वान के हात में है अतएव हम उन लेखों की प्रतियें तथा अपने निज विचारों को प्रकाश
नहीं कर सक्ते परंतु इतना तो निःसंदेह कह सक्ते हैं कि अभी तक हम उनको अकृत्रिम समझते
हैं और ऐसा समझने को सतर्क सिद्ध भी कर सक्ते हैं । इसके साथ हमको इस कहने में कुछ
भी लज्जा नहीं है कि यदि उक्त डाक्तर मित्र, हमारे विद्या-गुरु डाक्तर होर्नली साहब, मिस्टर
याऊज साहब और मिस्टर ग्रियरसन साहब, जैसे पक्षपात रहित और सहसा सिद्धान्त न करने
वाले पुरातत्ववेत्ता विद्वान उनको अप्रमाणिक सिद्ध कर ग्रहण करेंगे तो हम भी उन्ही से सम्मत
होंगे क्योंकि हमको किसी बात का वास्तव में दुराग्रह नहीं है बरुक्त इसमें भी कुछ संदेह
नहीं है कि जो कोई अन्य मनुष्य बिना किसी योग्य कारण के हमारे स्वदेश और उसकी विद्या
पुस्तकों को दोष दे तो हम उस दशा में उन के एक बड़े कट्टर पक्षकार हैं ॥
अंत में हमारा सब विद्वानों से यही सविनय निवेदन है कि इस महाकाव्य को उस की
भले प्रकार परीक्षा कर के पढ़ें और पढावें और जो कहीं उस में कुछ हमारा कहना तथा कोई
अनुमानादि का करना अयोग्य प्रतीत हो तो हम को क्षमा करें । यही प्रार्थना हम विशेष कर
{|c|} \hline समाप्ति
\hline के हमारे मित्र महामहोपाध्याय कविराज श्रीश्यामलदासजी की सेवा में भी
करते हैं क्योंकि उनके विचारों और अनुमानों का हमने विशेष कर के एक
बलिष्ट भाषा में खंडन कर हमारे स्वदेशाभिमान और उसकी हिन्दी विद्या
की संरक्षा कियी है । इस के साथ यह भी वक्तव्य है कि जैसे हम ने इस उपसंहारिणी टिप्पण में
इस महाकाव्य के पांच चार विषयों के विषय में अपने विचार प्रकाश किये हैं वैसेही चंद के व्या-
करणादि जैसे शेष विषयों के विषय में भी हम यथावकाश लिखेंगे इत्यलम् ॥
मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ।
अथ दसम* लिख्यते
अर्थात्
द्वितीय समय ।
———•———
॥ हरि रूप का मंगलाचरण ॥
साटक ॥ सो ब्रह्मा सो इन्द्र ईति भजनं, ईपान ईयं घरं ।
पिठे निष्ठ कमठ साहूर उरं, जठराग्नि वारी वरं ॥
सो भानं विधि भान नेच कमलं, बाहौ गिरं ग्रब्भियं ॥
जंघा अष्ट कुला चलं न ग्रभितं, जै जै हरी रूपयं ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
॥ दशावतार का नाम स्मरण ॥
चौपाई ॥ मक्क कक्क वाराह प्रनम्मिय । नारसिंघ वामन फरसम्मिय ॥
सुअ दसरथ्य हलद्धर नम्मिय । बुद्ध कलंक नमो दह नम्मिय ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
॥ दशावतार की स्तुति ॥
विराज ॥ करे मक्क रूपं । धरेना अनूपं ॥ बधे संष धूपं । वरे वेद भूपं ॥ ३ ॥
* * * । * * * ॥ * * * । नमो मक्क रूपं ॥ ४ ॥
धरा पिष्ठ तिष्ठं । कनंगे गरिष्ठं ॥ जले धार दिष्ठं । नमो तो कमठ्ठं ॥ ५ ॥
स्वयं हे वराहं । हयग्रीव गाहं ॥ रदग्रे डूलाहं । उपम्माति चाहं ॥ ६ ॥
─────────────────────────────────────────────────────────────
* इस समय में दशावतार की कथा होने के कारण चंद ने उस का नाम दशम रक्खा है ॥
१ पाठान्तर :-सौ । सो । ईंद्र । भजनं । इयाल । हारे । हारिं । प्पिठैं । पिठे । निठ ।
निह । कमठ । कमह । साहूँर । जराग्नि । वर । सौ । भांन । नैच । कमल । बांहै । गरभितं ।
ग्रम्भितं । जघा । गभितं । हरि ॥
२ पाठान्तर :-मछ । कछ । प्रनंमियं । नारसिघ । फरस्सम्मिय । अस्ररंम्मियं । सुत । सूंच ।
दसरथ । हलधर । नंमियः । रंम्मीयं । बुध । कमल । नमौं । दह । नम्मोयं । रमिय ॥
३ पाठान्तर :-करै । मछ । सिरैनारंनुपं । बंधै । धुपं । धरै । वैद । भुपं । नमौ । मछ ॥ ३-४ ॥
पिठ । तिष्ठं । तष्ठं । तठं । कर्णजो । गरिठं । दिठं । नमो तै । कंमठं ॥ ५ ॥ सुवं । दै । हयं ।
ग्राहं । रंदयै । इलाई । उपम्भांति । उपंमाति । सैवराहं । नमौ । तै । त ॥ ६-७ ॥ हरंनप्प ।
१३
१८२ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय २
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- । * * * ॥ ससी सेष राहं । नमो ते वराहं ॥ ७ ॥
हिरंनष्व वीरं । प्रह्लाद पीरं । उठे षंभ चीरं । मचा बीर बीरं ॥ ८ ॥
- । * * * ॥ ससी सेष राहं । नमो ते वराहं ॥ ७ ॥
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-
-
- । * * * ॥ बढी पंक्र नीरं । नम्यो अम्म धीरं ॥ ९ ॥
मृगंकस्य जरं । नषं तोरि तूरं । बजी दठ पूरं । थपे जान जूरं ॥ १० ॥
दया सिंधु मूरं । कुक्रंषीस झूरं । नटी लक्कि नूरं । धवो अंषि धूरं ॥ ११ ॥
भयं देव दूरं । निये भत्ति झूरं । थुती पानि जूरं । नमो सिंघ सूरं ॥ १२ ॥
बली राइ अग्गो । छली भूमि मग्गो । लुके बंभ तग्गो । मुषं वेद जग्गी ॥ १३ ॥
निषे गंग लग्गी । सुलोकी सु भग्गी ॥ तिहूं लोक बानी । रिजे देव गानी ॥ १४ ॥
प्रसन्न बणिज्जा । दईओभि सज्जा । चिलोको तिडग्गी । नमो वाम लग्गो ॥ १५ ॥
पिता बाच मानं । हते ग्रभ्र थानं ॥ सहस्रं भुजानं । रुधिराधरानं ॥ १६ ॥
नक्त्री क्षितानं । दई विप्र दानं ॥ सुरानं प्रमानं । नमो पर्सरामं ॥ १७ ॥
हरे राम म्यानं । सु रामं सुरानं । रघूबीर रायं । दया देह्र कायं ॥ १८ ॥
सु वैदेहि दायं । सुभित्रै सषायं ॥ विसामित्र सष्यं । षरं दूष नष्यं ॥ १९ ॥
सुपनी सहायं । तडिक्की निछायं ॥ वटीपंच पत्ते । मृगं चाप हत्ते ॥ २० ॥
रजं वारि दंती । जमं जासमंनी ॥ मतं मेघ कंती । * * * ॥ २१ ॥
धनं धार भारी । मरीचं प्रहारी ॥ सुयं सुडकारी । हनुम्मान धारी ॥ २२ ॥
गऊतम्म नारी । सिला तुंग तारी ॥ जरी कंक चाची । पुरी हेम दांची ॥ २३ ॥
रिषं बानरायं । भए षो सषायं ॥ हनुम्मान तायं । दधी सीस आयं ॥ २४ ॥
पषानं तिरायं । सुचिद्रा सहायं ॥ हनूमान रही । समुद्देस बही ॥ २५ ॥
हिरनंष । हरिणाष्यादाहं । प्रहलाद । प्रह्लाद । उठै । मत्तौ । ध्रुंप । उरं । नूरं । जांनि । दया ।
दधिपुरं । कुक्रंपीस मूरं । लक्कि । नुरं । धषी । अंष । धुरं । धुर । दैव । दुरं । भंति । भति । भुरं ।
थूतो । बानि । पांनि । जुरं । नमौ । सि ॥ ८-१२ ॥ राप । आग्ने । लकी । छल्रै । भुमि । मग्गै ।
मद्यो । लुकै । तग्गै । तगी । मुष । मुषे । वैद । वेदं । जगै । जगी । नषै । नषे । लग्गौ । लगी ।
लौकी । स । झंगौ । भगी । तिहौं । लोक । ब्रांनी । रिझै । रिझें । दैव । ग्यांनी । गांनी । प्रसन्ना ।
बलीजा । दद्द । भुमि । भूमि । सजा । सिज्या । त्रिसौकेतडगो । ढगै रूठ ठगै । तडकी । वांम-
नमौ ॥ १३-१५ ॥ ता वच्चमारं । यभ । थांनं । सहस्रं । रुधिजां । रुधिजा । नखित्री । दद्द । प्रनांमं ।
नमौ परसरामं । पर्शुरामं ॥ १६-१७ ॥ हरै । रांम । राम । सुमित्रे । विश्वामित्र । मष्यं । मषं ।
हरैदुकरिषं । सपनो । सुपणी । सुर्पनी । तडिका । बढी । वढी । पती । मृगै । हतै । हते । रज ।
जंम जाम मतीः । मत । मेघ । भारी । भरी । मरीवं । सय संधिकोरी हनुमांन । गउतम् । गडमंत ।
सिलाक चुंग तारी । चाहा । हेन । हेम । रिषं । बांनरायं । बंनरायं । सौ । हनुमांन । दुरदो ।
- । * * * ॥ बढी पंक्र नीरं । नम्यो अम्म धीरं ॥ ९ ॥
-
टमम समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । १८३
तजे बीर चय्यं । संदेसं मु कय्यं ॥ जहां लंक गट्टं । तहां वग्ग वढ्ढं ॥ २६ ॥
उच्छां सीय दिप्पी । हुंती दुष्प सुप्पी ॥ दियं मुद्रि तामं । सचिन्नान रामं ॥ २७ ॥
दसानन्न आद्दं । गयं देघ नादं ॥ करे कुंभ चूरं । भरे वान भूरं ॥ २८ ॥
सती सीय अंभी । क्रियं काज वंभी ॥ चिकूटेस नाथं । वभीपन्न हाथं ॥ २९ ॥
प्रसूनं विमानं । चढे वेगि यानं ॥ अजोध्या सपत्ते । नमो राम मत्ते ॥ ३० ॥
वसुदेव औनी । वरी कंस भैनी ॥ वियं पानि वद्दे । पुरानं प्रसिद्धे ॥ ३१ ॥
जयं जग्ग धारी । दियं दान भारी ॥ रथं आप रूढे । समं कंस मूढे ॥ ३२ ॥
अकासे सु बानी । अवन्ने गियानी ॥ उवं पग्ग भारे । अनुज्जां प्रहारे ॥ ३३ ॥
वरं पांनि वद्धे । मु वाले अवद्धे ॥ इयं ग्रब्भ पुत्तं । रुके तथ्य दत्तं ॥ ३४ ॥
सनं किश्न दिस्सं । भये राम किस्सं ॥ प्रथमं सुभहं । निथी पप्प अद्धं ॥ ३५ ॥
नष्ठं सु रोही । भुजं जन्म सोही ॥ चतुर्बाहु चारं । किरीटं सुचारं ॥ ३६ ॥
सनं पच नेनं । क्रने कुंडलेनं ॥ नियं मुर्त्ति नासी । इयं अविनासी ॥ ३७ ॥
सदा लङ्किदासी । चरनं निवासी ॥ मुखं संद हासं । चतुर्वेद भासं ॥ ३८ ॥
भ्रगू लत्त गत्तं । प्रभासी प्रभुक्तं ॥ मनी नील सीतं । कटी पह पीतं ॥ ३९ ॥
त्वयं ब्रह्म देही । नियं नंद गेही ॥ विषं पूत नायं । पियं दूध तायं ॥ ४० ॥
सकहं प्रहारै । ब्रजज्जा विचारै ॥ तिनं वृत्त तानी । उवं आस मानी ॥ ४१ ॥
प्रभू ग्रीव लग्गे । तिनं नाम भग्गे ॥ रिपी आप आपं । नलं कूब तापं ॥ ४२ ॥
दृढं देवदारं । व्रजंजा कुमारं ॥ नवं नीत चोरं । दधी मह ढोरं ॥ ४३ ॥
रद्दी । समुद्देम । चद्दी । तिनै । छाथ्यं । हयं ! सट्टैसं । संदेमं । कथ्यं । कयं । तहा । गठं । तहा
वग वढं । उहा । दष्पी । दिपी । हुंती । दुष मुपी । दीयं । सहं । दानरामं । सहंनान । दसानन ।
आदी । मयं । नादी । करै । चुरं । भरै । वांनं । भुरं । अभी । क्रिय । घभी । कुंटं । वभीपन ।
प्रसूत । विमानं । चडैवेगि आनं । अनोध्या संपत्ते । संपन्न । नमो । राम । मते ॥ १७-३०॥ वसुदेव ।
औनी । वसूदेव । भैनी । वीयं । पांनि । प्रसिद्धे । प्रसट्टे । जगिधारी । सूठं । मूढै । अकासै । वांनी ।
अवन्नै । गियांनी । ऊवं । पग । भारै । अनुजं । प्रहारैं । पांनि । बध । बद्दै । बाले । अबहुँ ।
अवधे । गभ । पुतं । रुकै । तथ । दंतं । दतं । किसन दिसनं । किद्रमं । प्रथमं सभह्रं । प्रथमं
सभदं । परख । पष । पप्य । निपिप्री । निपिच्रं । रौही । सौही । चत्रुवहुं चारु । किसढो सुं
हारू । चनुवहि । किरीटी । नेनं । नैनं । क्रंनं । कुनै । कुडलैन । कुंडले मंनं । अयं अयं अविनासी ।
श्रयं । अविनासी । लद्धि । चरनै । चरंने । चतुर । वैदं । भ्रगू । भृगूं । प्रभुतं । दैही । येही ।
पूतनाथं । पीयं । धूत नाये । सकट्ट । सकटं । ब्रजंजा । व्रज्जजा । बिहारे । तिना । व्रत । प्रभु ।
योध लगे । तांम । भगेः । भये । रिपि आप आपं । दैव दारं । व्रजना । कुंमारं । चोरं । मटढौरं ।
१८४ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय ४.
कियं गोप खोरं । अनोर्ष किसोरं ॥ ग्रही दान पानी । जसोदा रिसानी ॥ ४४ ॥
सिसू उव्य सङ्गे । कियौँ बंध बंधे ॥ सुयं ब्रह्म लेष्यो । अचिञ्जस पेष्यो ॥ ४५ ॥
लघू दीर्घ इंदं । कला की गुविंदं ॥ ररोषं सघासी । सुकत्ती निवासी ॥ ४६ ॥
सुतं जष्ष राजं । कियं ऊर्द्ध काजं ॥ द्रुमं गात बीची । परे वृक्ष सिंची ॥ ४७ ॥
युती बंध पानं । प्रसिद्धे पुरानं ॥ वरूनं पिवासी । ग्रहे नंद आसी ॥ ४८ ॥
जिते लोक पालं । व्रजं जाल बालं ॥ बधी धेन मारे । प्रलंबं प्रहारै ॥ ४९ ॥
सुषे काल व्यालं । सिसू वच्छ पालं ॥ कली उत्तभंगं । कियं नृत्त रंगं ॥ ५० ॥
व्रजं बारि लोपं । मधू मेघ कोपं ॥ परी ब्रज्ज धारा । गिरं धारि धारा ॥ ५१ ॥
नषे सैल सारं । त्रिभंगी त्रिसारं ॥ पुरंदरे पुत्तानं । व्रजे वानि सानं ॥ ५२ ॥
निसा अंध घोरं । कियं गोप खोरं ॥ धरा नील रैनं । तज्यौ देव सैनं ॥ ५३ ॥
कचं वक्र बेनी । भ्रमी भूरि सैनी ॥ श्रुती कुंडलीनं । दुती काम खीनं ॥ ५४ ॥
चर्षं पुंडरीकं । वपुं मेघ लीकं ॥ नसं मुत्ति सारै । निसामेक तारै ॥ ५५ ॥
धरा सुद्ध हासं । करै देव बासं ॥ रदं च्छद्द मुहं । नगं कोक नहं ॥ ५६ ॥
ग्रिवा कंबु रेषं । भुजाक्लिप्त सेपं ॥ बयज्जंत मालैं । उरै स्वे विसालं ॥ ५७ ॥
लियं वेत शैली । बने जाम केली ॥ जसोदा जगायं । म्रगे सिंग वायं ॥ ५८ ॥
जिते गोप सख्यं । दही पत्त धक्ष्यं ॥ बनेजा बिचारी । गऊ वच्छचारी ॥ ५९ ॥
अगं कांन मुद्दे । दिये हेरि सहे ॥ नियं ग्रेह चारी । हँसे गोप भारी ॥ ६० ॥
सतं पत्र पुत्तं । अचिञ्जं सुचित्तं ॥ नियं तप्य लागं । हरे वच्छ आगं ॥ ६१ ॥
स्वयं स्याम चित्तं । धस्यो ध्यानं चित्तं ॥ नियं नंद पुत्तं । मन्ना नंस जुत्तं ॥ ६२ ॥
गौप । खैरं । अनोर्ष । किसोरं । गहीदानं पांनी । जसौदा रिसानी । सिसुर्डष्य । सोयं । आचिञ्जँस ।
लघु द्वीघ । जक्ष । उरहू । उर्द्ध । उदुं । द्रूम । परै वृष्य । सोचीं । सोची । घुंती । प्रसिद्धै । विपासी ।
गीहे । गृहे । जितै लोक माल । व्रज । वंधी धैन सारे । प्रलंबे प्रहारे । मुषै । वछ । उतमंग ।
क्रियनंत्यमंगं । नृत्यान्तरंग । त्रिज । बृजं । लोपं । मधुमेघ कौपं । वृज । धाए । गिर धारि बाए ।
नषै सैरसारं । शैल । त्रिभगी त्रिसालं । पुरदं । व्रजेवा । व्रजैवा निसानं । घौरं । कीयं व्रजसैरं ।
रैन । कंचवक्र श्रेणी । औंनी । भूमी । भमो । भुरि । सैनौ । स्तती कुंड लीनं । कांम । पुडरीकं ।
चषं मैघ लीकं । नासं सुतिसारे । निशा । मैक । तारे । सुद्धि । सुधि । करें । रद छंद मुहं । रद्रं
सद्द मुहं । नागं कौफ नद्रं । कबुं । रैषं । सैपं । शेषं । वयजत । उरे । सौ । वैत । सैनी । वनै
जांम कैली । जसौदा । मृगैसिंगवांयं । जितै । गोप सध्यं । दहीपन ह्यर्थ । वनैजा । गौवछ चारी ।
बछ । अग कांन मुद्दै । दिएै । सद्दै । निय गहै चारी । गेह । हसे । हसै । गोप । पत्र पत्रं ।
अचिर्ज सुहितं । तप । हरै । वछ । स्याम वितं । ध्यांन । हितं । निय । मिलानंस । कीयं । सौक ।
दसम समय ५ ] पृथ्वीराजरासौ । १८५
कियं सोल्ल कोपं । कचं वक्कल गोपं ॥ उरे ब्रह्म व्यानं । पुरष्पं पुरानं ॥ ६३ ॥
रचे किष्ण सोची । चियं अंब रोची ॥ तिनं रंग नेहं । अपं अप्प गेहं ॥ ६४ ॥
तनं संप चक्रं । चतुर्वाह वक्रं ॥ पियं पह बंधे । सहं स्वात्त नंधे ॥ ६५ ॥
अविज्जं विचारी । नले ब्रह्मचारी ॥ भ्रमे लोक पालं । बियापै सु कालं ॥ ६६ ॥
-
-
- । * * * ॥ थुती सा मुरारी । सुब्रह्मं विचारी ॥
छं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ ३ ॥
भुजंगी ॥ न रूपं न रेपं न सेपं न सापा । न चंद्रं न तारा न भानं न भाषा ॥
अविद्या न विद्या न सिद्धं न सादी । तुही ० तुही ए तुही एक आदी ॥ ६८ ॥
न अंभं न रंभं न रुद्रा न पाया । न सेतं न नीलं न पीतं न गाया ॥
न काया न साया न पाया न काया । तुही देव सदैव सिद्धे न पाया ॥ ६६ ॥
तुही सर्व माया दिपायान माया । तुही सर्व माया तुही घाम छाया† ॥
न वंभा न रंभा न रुद्रे न देहं । न मंद्रे न माया न राया न गेहं ॥ ७० ॥
न सैवं न गैलं न तापं न छाया । न गाथा न गीतं न श्रोता न ताथा ॥
न प्रब्बी न पालं अजादं न मादं । न तारी न चारी न छारी न नादं ॥ ७१ ॥
नवे मेप रेप न भूरो न भारी । नवे ध्यान सानं न लग्गे न तारी ॥
न लोकं न सोकं न मोहं न मादं । तुही ए तुही ए तुही एक आदं ॥ ७२ ॥
तहां पै न तारं न वारं न वीरं । नयं दट्ठ मट्ठं न ध्यानं न धीरं ॥
नहं जोति चस्तं न वस्तं सरूप्पं । तहां तू तहां तू तहां तू सुरुप्पं ॥ ७३ ॥
प्रक्रतं प्रथंमं चयं तत्त जोई । तहां नब्भ तेता सरोजं न सोई ॥
न माया न काया न छाया न होई । तुही देव सा देव साधा न होई § ॥ ७४ ॥
कोपं । कहा । वक्कल । गौपं । उरै । ध्यांनं । पुष्प । रचंकिष्य सोची । सोती । चय चंब रोची । चयं
अंब रोची । तिनं रंग नेहं । अप अप्प गेहं । तन । चतुर । वंधै । नंधे । भविज्जा । नले । भ्रमे ।
लोक । सारारी । ब्रह्मं । * पाठ नहीं मिले ॥ † सं० १८५९ में है अन्य में नहीं ॥
४ पाठान्तर :- रूपं । रैपं । सैपं । शेषं । शापा । चंद्र । नहूभान । भाषां । चंद्र । नहभान ।
भाषां । तुहीं । अदी । अभ्भं । अंभ । रभं । रुट्ठा । सैनं । नील । नं । नकाया । छाया । तुहीं ।
दैव । सदैव । सिद्धे । पीया । †यह तुक सं० १८५९ की में नहीं है अन्य में है । सरव । दियांधान ।
सरव । तुंही । धांम । थंभा । संभा । घंभां । रुद्रा । रुद्रा । मदै । नया । गेहं । येहं । शैलं ।
मगाहा । श्रोत । नं । प्रबीनं । नंपालं मृजांदं । मृजादं । नबारी नवांरी । हांरी । नांद्र । नवै ।
मैप । रैपं । भुरी । नवै । ध्यानं । भांनं । लगे । लौकं । सौक । शोकं । मोदं । पें । नंध । दठ ।
मठं । ध्यानं । धारं । तही ज्योति । नहायोंति । सरूपं । तु । तू । तौ । सुरुषं । पुरुष । प्रकतं ।
प्रथमं । अर्थ । तत । जोइ । तौही । तहा । नभ । तैता । सरोजं । सोइ । § सं० १७७० और १८४५
- । * * * ॥ थुती सा मुरारी । सुब्रह्मं विचारी ॥
-
१८६ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय ६
तुच्ची अंबुजा अंबुकासिन्नि कामं । तुच्ची तत्त कै तत्त रासं न रामं ॥
तुच्ची दीप सूरं सिरं नब्भ तैरं । भुजा इंद्र तूच्ची नभं नाभ फेरै ॥ ७५ ॥
सुयं सायरं पेट सा मुष्प आग्गी । तुच्चो तेज ब्रह्मांड सासीस लग्गी ॥
तुच्ची बाल वृद्धं तुच्ची एक आदी । तुच्ची तंत्र मंत्रं कवी चंद वादी ॥ ७६ ॥
तुच्ची राग जंचं जगचं बजावै । तुच्ची सार पंचै सु पंचै चलावै ॥
भग्गवांन जंची सु वज्जन्ति लोई । सुरं राग बंधै बँध्यौ आप सोई ॥ ७७ ॥
प्रल्लै अभ्र अबं तुच्छी हन्य बोधै *। तहां सोच्चि अग्या सु सिष्टं सुयोधै ॥
छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ४ ॥
साटक ॥ किं सन्मान ससैव देव रजयं, दुष्टान उस्सासय ॥
किं सुब्षानि दुषानि सेवन फलं, आयास भूमी मयं ॥
किं ईसं न सुरेस सेस सनकं, ब्रह्मान ग्यानं लहं ॥
किं रंनं क्रितया क्रितं सु कमलं, बंदे सदा विष्णयं ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ५ ॥
दूहा ॥ नंदकिसोर किसोर मग । निसि पुन्निम ससि अच्छ ॥
ब्रह्म सुति ब्रह्मा करिय । गोन मिले गुन बच्छ ॥ छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ६ ॥
॥ ब्रह्मोक्ति ॥
दूहा ॥ ब्रह्म कहै सुर सकल सों । गोकल चरि अवतार ॥
नारद सुर पति स्रुति करन । अप आए तिन वार ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ७ ॥
प्रथम कित्ति रवि ससि करो । अहो देव देवेस ॥
तुम गुन बरनत जनम लौं। पार न पायो सेस ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ८ ॥
की में नहीं है । तुहां । अम्बुजा । मनि । तत । तत । राम । सूर । नभ । तैं । तैरें । तैरैं । तुही ।
नभ । नांम । फेरैं । सोसुष । सामुष । अंगी । अष । ब्रहमड । सुसीस । लगी । वृद्ध । तत्र मंत्र ।
वाही । रागयंत्रं । तुही सार पंचै चलावै । भगवान । सुवजेति । लोई । बंधे । बंध्यां । सोही ।
- सं० १७९० की में नहीं है । प्रल्लै अभ्र अब तुही । हुन्यं बाधै शिट्टं । समोधै । समोधे ॥
५ पाठान्तरः-इसकी पहिली तुक सं० १७९० की में "किं प्रलै अभ्र अबं तूह्मा हन्य बोधै"
है । संन्मांन । सैव । दैव । दुष्टांन । उक्कासयं । उसासयं । संषानि । दूषांनि । सैवनि । कि ।
इसं । सुरैस । सैस । शेस । ब्रम्हान । ब्रह्रयान । भ्यांन । रन । दै सदा विषय । विषयं ॥
६ पाठान्तरः-नदकिसौर । किसौर । निशि । पुनिम । यूनिम । शशि । अछ । ब्रह्मस्तुति ।
ब्रम्हा । ब्रम्हां । गौन । गोन । मिलै । बछ । बच्छा ॥
७ पाठान्तर-ब्रंम्ह । कहे । सौः । गोकल । किरन ॥
८ पाठान्तरः-कित्ती । करिय । अहौ दैव दैवेस । देवेश । तुमि । लों । पावै । पायौ ।
शेष । सैस ॥
दसम समय ९ ] पृथ्यीराजरासौ । १८०
॥ मच्छावतार की कथा ॥
॥ वृद्ध नाराज ॥
प्रथम मंकृक् रूपयं, सरूप अंग नृपयं । सु पर्व्व रिष्पि तातयं, तमात संत भूपयं ॥ ८३ ॥
ठठुक्कि एक घहवांन, ता निसांन वज्जही । अनेक देव रंजण, सुरंभ ग्यांन सज्जही ॥ ८४ ॥
विवान क्तित रंग क्तित जित्त पंड पंडही । करन्न ण्क छैन सेत तां समंद मंडही ॥ ८५ ॥
सुरंभ हद्द तब्बिकांन क्तित कबिध चंहयं । वरन्न वांन संकरे, जमात मोद कहयं ॥ ८६ ॥
सु चंद सूर नेक भंति कित्ति जीह जंपही । कमल्ल केलि वंक मेल्लि बंधि सिंधु चंपही ॥ ८७ ॥
सु दौार दो दिसान छोरि तारि भोरि भंगही । सुरं ज नंज जेज जेत तिष्प किप्प रंजही ॥ ८८ ॥
सुरं सु देद्द विड्डचार क्तित कबिध चंदयं । सु जोग यांन जोगयं सपूरयं निकंदयं ॥ ८९ ॥
सुमान्यं न मान्न देव मान्यं सुरज्जयं । दिसान दिस्स उच्चरं सुरूप मक्कयं जयं ॥ ९० ॥
श्रवंत लोक लोक पाल फून मान्न रंभयं । सुमंन्त्र देव सीस रज्जि बंधयं जयं जयं ॥
छं० ॥ ९१ ॥ रू० ॥ ९ ॥
कवित्त ॥ सायर मद्धि सु ठाम । करन त्रिभुवन तन अँगुल ॥
देव सिंगि रषि धरिनि । सिरन चक्री चप संपन्न ॥
गैन भुजा ग्रज्जंत । रसन दसनं झुकि झांइय ॥
एक करन ओढंत । एक पचरंत सवांइय ॥
९ पाठान्तर :-मच्छ । सुरूपयं अनूपयं । सुपर्व्व । सुपरव । रिषि । भुपयं । टठुक्कि । घंटवान ।
घट्टवांन । निसांन । अनैक । दैव । सज । छिछीह । क्तित । रंकग । क्तित । जित । करन । सैन ।
हैंन । सुरभ । हर । हृद । तबिकान । क्तिति । कत । कथि । चंद्रयं । सु जोग थान । संकरैज ।
मौद । कंदयं । सुं चंद । सुर । नैक । भंति । लीह क्तिति । जंपही । भंति जीह कित्ति जंपही ।
कमल । कैलि । मैलि । मंधि । सुदौरि बौरि दौ दिसान दौरि छोरि भंपही । दिसाने । छोर ।
छोरि । सुरंगतनजननैन निपकिप रंजही । सुरंग । जतं । नञ । तेन । तिप । । तिप्प । किप ।
दैव । विट्टु । क्तिति । कथि । कायै । वंदयं । सुं । जोग पांन । जोगयं । संपूर्य । नमाजयं न ।
माल दैव माल्यं सुरजयं । दिशान । दिशि । दिसि । उचर । उचरं । सुरूप । मक्यं । श्रवन ।
लोकं । पाल आय । रजपं । सुमान । दिव । जय जयं ॥
१० पाठान्तर :-ककित्त । मद्धि सु मट्टि । मध्य । ठांम । करे । करै । अञ्जुल । “ दैव संगि
सठि हय । सियन चक्रीवप झांफल” ॥ “देव संगि संठि हथ सिर चक्री चप झंमच” ॥ नैन । गैन ।
गुरजन । गर्जत । रसन रसन । झाड्यं । झाडूय । झंन । ऋच । उदयन । उदयंत । पहरत ।
सवांईय । † बूंदी वाली में नहीं है । चलं । सप्त । सायर । इद्र । चलत । पग नलन कहि । लैंन । यहि ॥
१८८ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय ८
चल चले सपत सायर अधर *। इंद्र नाग मन कवन कहि ॥
गिर धर चलंत पग मलनमल । लेन बेद अवतार गच्छि ॥ छं० ८२ ॥ रू० १० ॥
भुजंगी ॥ धरें गैन सीसं चले बेद रीसं । गदा मुद्गरं दंत पारंत चीसं ॥
पगं पिठ नठं कमठं डरानं । थके बेद ब्रह्मा कमठं भजानं ॥ ८३ ॥
भगे जोग जोगं छुटे यांन थानं । छुटे विश्व लोकं मच्चा लोक जानं ॥
फटे कन्न रानं प्रथी लोक जानं । चितं रक्त लोकं भ्रमं लोक मानं ॥ ८४ ॥
पुल्ले पिच लोकं ब्रह्मं लोक देवं । * * * * ॥
सिवं कूट थानं घरं थान लोकं । जहू रस्त लोकं परे सत्य सोकं ॥ ८५ ॥
परे दिव्य लोकं सुरंगं सु पाखं । ब्रह्मं राषिसं लोक भग्गेस काखं ॥
परे निठ तठं कमठं रच्छानं । चले दैत संषं जुटे बेद रानं ॥ ८६ ॥
ब्रह्मसा भजानं न जानं कि जानं । धरंजा फटानं ग्रहं निष्ठ भानं ॥
परे लोक सोकं करे देव कुक्कं । डकं डक्क बज्जी करै ईस डक्कं ॥ ८७ ॥
ग्रहे ब्रह्म खिद्धं धरै बेद मुषं । गजे जोग सट्टी हुवं दैत दुषं ॥
करे मच्छ रूपं धरै धार धूपं । छिले सत्तयं सायरं अंध कूपं ॥ ८८ ॥
परे छोनि छक्कं विक्छक्कं बरानं । करे कुंभ नहं विच्छहं सुनानं ॥
तच्छां संषनं पानि संषा सुरानं । नहीं पाव संषं प्रलंबंध बरानं ॥ ८९ ॥
११ पाठान्तर :- धरे । गैन । चलै । मुद्दर । मुद्दरं । पंग । पिठ । नठं । नंढं । कमठं ।
झरानं । थकै । ब्रम्हा । कमठं । भगे । जोग जोगं । छुटे । छुदै । विश्वलोकं । महालोक । चानं ।
ज्ञानं । फदै । कंच । प्रिथी । पृथी । जानं । चित । लौकं । ध्रमं । लौक । मानं । पुल्लै । लौकं ।
ब्रह्यनलोक । ब्रह्मनलोक । दैवं । * * यह तुक किसी पुस्तक में नहीं मिली । फूट । यांन । लोकं ।
जहूरस्त । जहुरस्त । नौकं । परै । सत्यको । सौकं । सौकं । लौकं । सुरंग । ब्रह्म । ब्रह्मं । लौक ।
भगे । परै । निठ । तठ । तठं । कमठ । कमठं । रंहानं । राहानं । चलै । सषं । जुटै । वैद ।
ब्रह्ममां । बृहंमा । जांन । फटांन । गृहं । निठ । निठं । ठ । जानं । शोकं । कौकं । कोंकं । डक ।
बजी । इस । डकं । यहै । लिद्धु । घरे । बंद । मुपं । गजै । जोगि । सठी । हुव्रां । हुअं । दुपं ।
मम्र । धरै । रूपं । डूबं । छिल्लै । सतयं । अध । परै । छौनि । थकं । छुकं । विक्छेकं । विछुकं ।
करै । कुभ । नंद । विह्रदं । सुरानं । पांनि । सुरांनं । नही । संष । शंषं । प्रलवं । प्रलंब । धुमर ।
धुमरं । चंवर । अब । दभी । मम्र । पौडस । कला । सुभी । धरै । गैन । मैभ । पांन । लरै । आउदानं ।
मनौ । मनौ । असुर । वासुर । सत । सुत्त । करकंत । मच्छी । कटि । कटि । मकुं । मनी । मनौ ।
आउधं । बजि । जनु वज्र वक्रं । बज्जि । वक्रं । धपै । पांनि । फटै । कैटं । कठै । पैट । मम्रं ।
सुर वैद । वैदं । धरै । चलै । ब्रह्म । यांन । किए । बजं । बज्ज । पुरात । वृष्टि । दृष्ट । दैवं ।
सुरब्रह्म । सैवं । † बूँदीवाली में इस तुक के दोनों पाठ उलट पुलट हैं । मुष । वैद । पानि ।
दसम समय ६ ] पृथ्वीराजरासौ । १८६
धजा धूसरं अंमरं चंव दख्खी । तिनं सखरू घोडष्कला अप्प सुख्खी ॥ १०० ॥
धरे गेन पानं खरे आवधानं । सनों आसुरं वासूरं सत्त पानं ॥
करक्कंत मच्छी कटिं कहि मच्छं । मनो आवधं वज्जि जौं वज्र वक्छं ॥ १०१ ॥
धपे पानि रुद्धं फटे पारि छेदं । कढे पेट सखरूं सुरं वेद वेढं ॥
धरे अप्प पानं चले ब्रह्म थानं । किये जैत बज्जैं पुरानं सुरानं ॥ १०२ ॥
करी विष्टि फूंलं सुरं सिद्ध देवं । सुचं ब्रह्म जष्यं कियं अप्प सेवं ॥
सुषं वेद पिठ्ठं न लै पानि ब्रह्मं । जन्ने षोन्नि पानं भजै अंति भ्रमं ॥ १०३ ॥
† दियं चारनं भट वेदं सु पानो । रहे ब्रह्म ग्यानं हरी सिद्धि रानी ॥
अपं इंद्र आपं भगं कोरि कोरं । कियं मक्छ रूपं छुटे वेद रोरं ॥
छं० ॥ १०४ ॥ रू० ॥ ११ ॥
॥ कच्छावतार की कथा ॥
दूहा ॥ मंडि गजिन बहु बज उच्चर । तत्त कत्त बज जल जाल ॥
मँदिराचल्ल बज विपुल पुल । थल्ल थरचर छल पाल ॥ छं० ॥ १०५ ॥ रू० ॥ १२ ॥
दंडमाली ॥ धरि कच्छ रूप सरूपयं । कुस कूप मंडित भूपयं ॥
धरि मंद प्रब्बत पुठ्ठयं । जल जात चाज गरिठ्ठयं ॥ १०६ ॥
† हमारे पाठकों को यह स्मरण में रखना योग्य है कि चंद के इस वाक्य "दियं चारनं
भट्ट वेदं सु पानी" से वास्तव में चाहे यह ऐसा ही हुआ हो अथवा न हो किंतु ज्ञात होता है
कि इन दोनों जाति के मनुष्यों में जो वर्तमान समय में अनबन दृष्टि आती है वह चंद के समय
में विद्यमान न थी किन्तु कुछ थोड़े ही काल से उस का जन्म हुआ है। यदि हम यह भी मान
लें कि चंद के समय में इन दोनों जातियों में परस्पर विरोध था; तथापि चंद कवि प्रशंसा करने
के योग्य है, क्योंकि उसने चारनों का नाम अपने इस ग्रंथ में कहीं नहीं छिपाया है बरुक पहिले
उन का नाम उसने प्रयोग करके फिर अपनी जाति का नाम प्रयोग किया है। तथा इन दोनों
जाति के मनुष्यों की उत्पत्ति के शोधकों को यह वाक्य बारहवें शतक तक का प्रमाणरूप भी
उपलब्ध समझना चाहिये। इस महाकाव्य में आगे अनेक स्थानों में ऐसे प्रयोग आवेंगे। इन
दोनों जातियों की उत्पत्ति के विषय में अनेक प्रकार के शंका समाधान हैं। परंतु इन लोगों की
उत्पत्ति का कुछ विषय हमारे पास एकत्र किया हुआ है वह अवकाश मिलने पर यदि कहीं आवश्य-
कता हुई तौ हम किसी टिप्पण में लिख विदित करेंगे ॥
ब्रह्म । जल । जलं । षोलि । बोलिं । पांन । चति । भ्रमं । वैदं । पांनी । हरै ब्रहम ग्यान हरि
सिद्धि रानी । हरे । रांनी । अयं । इद्र । भग्गै । भगे । कोर । सौर । कोर कोडिरं । किय मन रूप
छुटै वैद जोर । मद्ध । छूटे ॥
१२ पाठान्तर :-गजि गन । उर । मंदिरा । बव ॥
१३ पाठान्तर :-छंद दंडमाली । कच्छ । खुस । कुंप । जुयंयं । नूपयं । प्रबत । पुठयं । गरिडयं ।
गरिठयं । गरिष्ठयं । वांम । दिन । अदिन । वस । प्रचंडयं । श्रुति । सुति । अहिगुन । गुनगानं ।
१६० | पृथ्वीराजरासौ । | [ दसम समय १०
दिव वाम मान न खंडयं । द्वित अद्वित बंस प्रचंडयं ॥
स्रुति चषत सुर नर गुन गर्न । * * * * ॥ १०७ ॥
लिय रतन चवदसु वीनयं । बँटि बँटि निज कर दीनयं ॥
बर बिद्दरि बिहरि बोरयं । सुर असुर मिलि जजफोरयं ॥ १०८ ॥
जै चवत चंद कविंदयं । कज्जि कूरमं बर इंदयं ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ १३ ॥
दूहा ॥ कक्वि सनकादिक इन्द्र सम । किम लिय पाथर तन्न ॥
कछै इन्द्र सनकादि सौं । सुनौ कछौं करि भ्यन्न ॥ छं० ॥ ११० ॥ रू० ॥ १४ ॥
दैत राज धर प्रबल धुम्र । अमर परे सब मंद ॥
गए पुक्कारज सकल मिलि । जहां लक्खि गोविंद ॥ छं० ॥ १११ ॥ रू० ॥ १५ ॥
कच्छी ईस इन्द्रादि सौं । सजौ सेन चतुरंग ॥
तुम सहाय असहाय अरि । करौ दैत सब भंग ॥ छं० ॥ ११२ ॥ रू० ॥ १६ ॥
लघु नाराज ॥
कियंति नह भद्दयं । लियंति रथ्य बह्दयं ॥ चले सु देव इंदयं । करे सु सेन वृंदयं ॥
अनेक धानुषं धरं । अनेक चक्र संवरं ॥ चले अबद्ध भेदयं । घरे भरेति वैदयं ॥
धजा पताष धूमली । सम्मूह सेन* संमली ॥ दईत दूत दौरयं । करे सनाच जोरयं ॥
चलै सु दैत चंचलं । मनो असाढ धूमलं ॥ मिले जु रिष्षि मानयं । जुँ देवता दधानयं ॥
- यह तुक घटती है । लीय । चउद । सु वीनयं । बेंटि । विदुर विदुर । विदुर । चिहुरि वारय ।
असुर । सौमयं । ववत । कविदय । कवींढयं । जरमं । कुडमं । चर ॥
१४-१६ पाठान्तर :- पाथौ घिर । पार्यघिर । सनकदि । सो । कहू । कहै । भिंच
भिन्न ॥ १४ ॥ देतराज । ह्यग्र । परै । लच्छि । गोबिंद ॥ १५ ॥ ईश । इंद्रादि । सौ । सजो । सहाय ।
दैत्य ॥ १६ ॥
१७ पाठान्तर :- नद । भद्रयं । लियंरति । रथ । वढयं । चलै । इद्र । दैवयं । करै । सैन ।
एवयं । अनैक । संचरं ॥ चलै सु बंह भेदयं । घरै भरैति वैधयं । वैधयं । पताक । धुमली ।
सस्त्रह फौज संमली । सम्मह फौज संमली । करै । जोरियं । चले । चंबलं । मनौ । धुमलं । मिलै ।
सु रिषि । रिष । ज्यां । ज्यौ । दैवता । चिलाक । नैवता । लछमी । लक्खिमि । * यह बूंदीवाली
पुस्तक में नहीं है । कैसवं । केशवं । भालयं । यौ । यौं । यों । दइत्त । यो । यौ । दैव । भुरयं ।
मिलै । कच्छावनिर । किद्रयं । लक्खिमि । लछमी । जित । गिरि । घरै । पिठ । नैत । मधयं । दइत ।
मुष । दबयं । पुछ । दैव । रषयं । बिरोलि । घुमछी । घूंमही । प्रथम । लखिमी । लछमी । लत्तमो ।
लषमी । लत्तमो । स्वपारिजात । सौम । उगि । ऊगि । सु कला । सुं घैन । गज । उजला । सु
रंग मौधनी परा । सु रंग मेघनी परी । अस्त्र । धनुष । समैत । पषयं । दस । दर । दैव । दझयं ।
फैन । मफ़यं कितैक सैन कुकही । मुए सु । मांन । मुकही । लषंत रन दैदयं । लयं । अमृत । अप ।
दसम समय ११ ] ˙ पृथ्थीराजरासौ । १६१
दियं सराप देवता । त्रिलोक मध्य तेवता ॥ अ्रवंत लच्छिमी गई । नराधि देव निम्मईं † ॥
न केसवं न दानवं । न नागयं न भानवं ॥ युँ देवता विचारयं । नच्ची सनाच भारयं ॥
दईत भग्गि दूरयं । युँ देव दूत झूरयं ॥ मिले त्रिलोक संमिली। बिना पराग विछली ॥
कछावतार किद्ध्यं । लक्खि जीत लिद्ध्यं ॥ मदाचलं महा गिरं । धरे सु पिष्ठ उप्परं ॥
सु नाग नेत किद्ध्यं । मछा समंद मंथयं ॥ दईत मुष्प दष्षयं । सु पुच्छ देव रष्षयं ॥
विरे। ल्ति दृष्टि ज्यौं मची। घटा तटाक घूम ची॥ लियं प्रथम लच्छमी। सु कौस्तुभं च वळ्कमी ॥
सु पारिजात पानयं। सु राधनंत मानयं ॥ जु सोम उग्गि सुक्कला। सु धेन गज्ज उज्जला ॥
सु रंभ मोच्छिनी परी। सु सप्त अश्व सुन्दरी ॥ धनुष्य ईस संषयं । विषं समेत पष्वयं ॥
सु चारि दिस्स पंचची। दिए सु देव संचची ॥ दईत वंस दभ्भयं। सु नाग फेन मम्भयं ॥
कितेक सेन कुक्कची। मुणंति मान मुक्कची ॥ लियं सु रत्न इंदयं । दईत किद्ध दंडयं ॥
अमृत्त अप्प अच्छरं । कियं सु देव कत्तरं ॥ अनाथ नाथ अष्वियं । दईत देव चष्वियं ॥
पर्वंत दोय पप्पिली । दईत देव रुप्पली ॥ अमृत्त देव पिद्ध्यं । सुरा सु दैत सिद्ध्यं ॥
जु सोमनाथ सं। कची। रवी सुरा सु देत ही ॥ हरी सु चक्र सद्धयं। जु दैत वंस बद्धयं ॥
छंदं० ॥ ११३-१२८ ॥ रू० ॥ १७ ॥
कवित्त ॥ दानव तब गय दौरि । करे इक बंध कटकं ॥
हुअ देवासुर जुद्ध । चढे देवता चटकं ॥
घरे रथ्थ दष्षरे । आइ लग्गे सम धारं ॥
रथ सौं रथ भंजियहि । कूक लग्गी पुक्कारं ॥
जोगनी जोग माया जगी । नारद तुँवर निच्छसिया ॥
दस एक रुद्र दांरद्र गत । दानव तामर चस्सिया ॥ छंदं० ॥ १३० ॥ रू० ॥ १८ ॥
अच्छरं । अच्चर । कत्तरं । कच्छरं । आथ । अप्पयं । दांनव । दानव । चपय । चपयं । पावत । पावंत ।
दोय । पपली । दानव । रुपली । अमृत । दैव । सुरा ज । सुरा जु । ज्यु । सोमनाथ । रची सुरा
स दौर ही । संधियं । सदयं ॥
† इस महाकाव्य में मुसलमानी भाषा के शब्द प्रयोग हुए देख कर शंका करनेवालों को
जानना और विचारना चाहिये कि किसी पुस्तक में फौज और किसी में सेन पाठ मिलते हैं । क्या
यह दोनों पाठ चंद ने प्रयोग किये हैं ?
१८ पाठान्तरः-गय तब । करै । कटकं । कटकं । दैवासुर । चढै बता चटक । चढै । चटकं ।
घरै । रथ । पषरै । पषरे । लग्गै । सम धार । सुं । सों । लगो । पुकर । पुकारं । जुगिनी । जोग ।
तुंबर । विच्छसिया । द्ररिद्र । तांमर । हसिया ॥