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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 470 में से

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पृष्ठ 184

उपसंहारिणी टिप्पणी । १७३
॥ सूरसागर ॥
राग काफी ॥
मैं अपने कुलकानि डरानी । कैसे श्याम अचानक आये मैं सेवा नहीं जानी ॥
यहै चूक जिय जानि सबी सुनि मन लै गये चुराई । तनतैं जात नहीं मैं जान्यौं लियो श्याम अपनाई ॥
ऐसे ठगत फिरत हरि घर घर भूलि कियो अपराध । सूर श्याम मन देहि न मेरो पुनि करिहौं अनुराग ॥
राग विहागरा ॥ कहा करौं गुरजन डर मान्यां ।
आये श्याम कौन हित करि कैं मैं अपराधििन कछु न जान्यों ॥
ठाढे श्याम रहे मेरे आँगन तब तैं मन उन हाथ विकान्यों ।
चूक परी मोकों सबही अंग कहा करौं गई भूल सयान्यों ॥
वै उनही को नए रूप मन मेरी करनी समुझि अयान्यों ।
सूर श्याम संगम उठि लाग्यौ मो पर बारं बार रिसान्यों ॥ ३७ ॥
बीच कियो कुल लज्जा आई ।
सुनि नागरी बकस यह मोकों सन मुख आये धाई ॥
चूक परी हरि तैं मैं जानी मन लै गये चुराई ।
ठाहे रहे सकुच तो आगैं राख्या बदन दुराई ॥
तुम हो बडे महर की चेटी काहे गई भुलाई ।
सूर श्याम हैं चोर तुम्हारे छांडि देहु डरपाई ॥ ९० ॥
॥ कवि लल्लूलाल कृत ॥
दोहा ॥ धरम राज सौं चूक करि । दुरजोधन लै लीन्ह ॥
राज पाट अरु वित्त सब । घनेवास दै दीन्ह ॥
करी चूक प्रहलाद पै । हिरन असुर परचंड ॥
हरि सहाय हित अवतरे । असुरन किये बिखंड ॥
॥ रामायण ॥
छमहु चूक प्रान जानत केरी । चहिये विप्र अरु कृपा घनेरी ॥
॥ स्त्रियें गाया करती हैं ॥
मेरा भया चुक्यान हियारी । कार करत मैं घर वर चूकूं
फुंका जात सई जीया री ॥
॥ कबीर ॥
काशी का मैं बासी कहिये, करम दशा का हीना ।
राम भजन में चूक पडी तब पकर जुलाहा कीना ॥
: ॥ कहावत ॥
आहार चूके वह गये व्योहार चूके रह गये ।
दरबार चूके बह गये सुसराल चूके बह गये ॥