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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 470 में से

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पृष्ठ 428

४१८ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ३४.
रत्तरे गात उत्तंग तन । उड्ढ रोम झारंत असि ॥
गच्चि दंत दंति धरि पुंछ छय । उड्डि सुनंघिय बीर हँसि ॥
कूं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८४ ॥
शहाबुद्दीन की सेना का भड़कना और पृथ्वीराज
की सेना का पीछा करना ॥
कवित्त ॥ भरकि सेन साहाब । डररि भगे छय गय नर ॥
घरिय एक बित्ती । बिहुर अड्डे अघास घर ॥
दिष्ठि दिष्ट साहाब । राइ चामंड बीर बर ॥
चंद्रसेन पुंडीर । जाम जह्वां भर सुब्भर ॥
कैमास दिष्टि दिष्ट्यौ सजर । कल्ले च्यारि गछनं सुबचि ॥
आए सुबीर अड्डे अकसि । रन रस आवध रीठ मचि ॥
छं० ॥ १८१ ॥ रू० ॥ ८५ ॥
घोर युद्ध का वर्णन ॥
छंद बिज्जुमाला ॥ मचिय मत्त आवद्ध रीठ । अर घरि दैन सुब्भर पीठ ॥
धक्कैं सूर अग्गर सार । धर धर परै तुहिय धार ॥ छं० ॥ १८२ ॥
जंपैं उभे दीन जु आंन । जुझ्झिय मत्त मत्तिय पांन ॥
बद्ध बद्धह कद्द कै हाक । बज्जे विषम आवध झाक ॥ छं० ॥ १८३ ॥
परि खर थरैं उठैं एक । तब्सी उक्कसि झारैं नेक ॥
छह छही आवध सार । बाद्यै बीर बारं बार ॥ छं० ॥ १८४ ॥
अन्यो अन्य सहैं नाम । आवध ग्रहैं अप्पन ताम ॥
हंहं करैं इष्ट संभारि । उठ्ठै बिरह धारी झारि ॥ छं० ॥ १८५ ॥
अद्धैभुत बीर भैयान । मंचिय कंक विषम कृपान ॥
नर बर बरय हंस रँभान । उट्ठिय नेह प्रेच्छति जानि ॥ छं० ॥ १८६ ॥
८४ पाठान्तर-मंडलीक । झुझ ढाह भर सुभर । बुड्डिय । उठिय । रतरे । उतंग । उध
उडि । हंसि ॥
८५ पाठान्तर-घरीय । बिहूर । अडे । आय सुहर भर । अथासु । दिषि । राय चामुंड ।
जांम । जद्दो । सुभर । गहन । सुमीर । अडे । दिन ॥