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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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नवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो । ४११
कवित्त ॥ चवै राज चहुआन । तुम सामंत सूर बर ॥
घर कुनीव दुख लज्ज । जुद्ध श्रान संग अंग भर ॥
तुम सहाय हुस्सेन । सेन सज्जौ दिषि बाईं ॥
तुम अनंत यल तेज । देव घर कंठ सुहाई ॥
नादान दीन सुरतांन लौं । भिरौं चान बंधव विंधसि ॥
सबै हुवलि निज सेन सजि । नाइ सीस रजि बीर रस ॥
छं० ॥ १३५ ॥ रु० ॥ ७० ॥
कैमास आदि सामंतो का चार सहस्र सेना के साथ
पृथ्वीराज के दक्षिण ओर सेना सजना ॥
कवित्त ॥ दिसि दच्छिन कैमास । राइ चामंड महाभर ॥
चंद्रसेन पुंडीर । सिंघ पम्मार सुझझ सर ॥
गहग्रधाव गद्दिलौत । निर्भ पति धार भार घन ॥
तँवर राइ परिछार । पित्त अनमंग मोट सन ॥
साहस्स चार सञ्जे सघन । अनी बांध दच्छिन नृपति ॥
रत्ताभि वस्त्र रत्ते सुभर । जै मंनी चहुआन चित ॥
छं० ॥ १३६ ॥ रु० ॥ ७१ ॥
पृथ्वीराज के आगे की ओर गोइंदराय आदि सरदारों का
पांच सहस्र सेना के साथ खड़े होना ॥
कवित्त ॥ मद्धि अनी प्रथिराज । अग्ग सजे भर सामत ॥
गरुअ राइ गोइंद । राज मने साह्रस सत ॥
देवराइ बरगारि । कन्ह चहुआन नाह नर ॥
घीची राइ प्रसंग । बीर कन कूबड गूजर ॥
७० पाठान्तर-चहुवांन। तुम । लज । सहाय । हुसेन । सज्जौ । बांई । सुरतांन । भिरौं ।
बंधवि । विंदसि । नाई सास ॥
७१ पाठान्तर-दक्षिन । दषिन । राय । पामार । झुझ । गहिलौत । तोश्रर । राय । पहार ।