पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३८६
मंत्री, कैमास, चन्द, पुंडीर आदि को बुलाकर पृथ्वीराज
का पूछना कि क्या करें क्योंकि दोनों तरफ विपत्ति
है एक शाह का कोप दूसरे शरण आए
को न रखना धर्म विरुद्ध है ॥
दूहा ॥ बोलि संचि कैमास बर, बोलि चंद पुंडीर ॥
राव पजून प्रसंग नर, गोयँद रा गुन नीर ॥
कूं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ १३ ॥
दूहा ॥ नेह मुष देखे न नृपति, विपति परी दुहु क्रम ।
इक सरना इक रयद्दन, इक धर रय्यन भ्रम ॥
कूं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १४ ॥
चन्द का सलाह देना कि जैसे शरणागत होने पर विष्णु
भगवान ने मत्स्य रूप धर कर पृथ्वी को अपनी
सींग पर रक्खा था वैसे ही आप
भी कीजिए ॥
गाथा ॥ मनसा धारि विरंचं । दच्छिन पग अंगुरी नषयं ॥
संभू मंन नरिंदं । सत जुगं आदि कीन पैदासं ॥
कूं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १५ ॥*
कवित्त ॥ संभू मन बरदान । खियै तप जोर ब्रह्म पढि ॥
सरन रखि वसुमती । होत कलपंत काल मचि ॥
नारद धरत बताइ । मच्छ रूपं जगदीसं ॥
दस हजार जोजनं । सृंग रचि ऊरध सीसं ॥
१३ पाठान्तर—मंत्र । पुंरीर । रा पजूंन । गोविंद ॥
१४ पाठान्तर—यक । रखन ॥
१५ पाठान्तर—* यह रूपक और इसके आगे वाले १६ और १७ रूपक संवत १६४७ की
प्राचीन पुस्तक में नहीं हैं किन्तु इतर आधुनिक पुस्तकों में हैं ॥
१६ पाठान्तर—रषि । मद्ध । श्रग ॥