पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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कवित्त ॥ मेह बिना नहि तेह । नेह बिन गेह चरस रन ॥
पिय बिन तिय न उमंग । अंग श्रृंगार रूप रस ॥
नायक बिन नह सेन । दंत बिन भुक्ति न होई ॥
तेग त्याग तैं रहित । कछै कीरति को लोई ॥
बिन नीर मीन राजन कहूं । छवी बिन सूर तरिन ॥
मन वच क्रम तिम जानि जिय । न है मुक्ति हरि भक्ति बिन ॥
छं० ॥ ७६५ ॥ रु० ॥ ३९९ ॥
॥ चंद की स्त्री का उसे कहना कि चित्रनेवाले को चित्र कि जिस से
तू दुस्तर के पार उतरै-चहुवान की कीर्ति कविने से वह क्या रंजैगा ॥
दूहा ॥ चिचनहारे चिचि तुं । रे चतुरंगौ नाह ॥
का चहुआन सु कित्ति कवि । मन मनुष्य हरि जाह ॥ छं० ॥ ७६६ ॥ रु० ॥ ४०० ॥
कवित्त ॥ तत्त चीन पुत्तरी । पंच बंधी कर नंचै ॥
आसा नदी सपूर । जीय मनोरथ संचै ॥
बहु तरंग तिस्नाह । राग बहु ग्रेह कुरंगी ॥
का चहुआना कित्ति । कंत धीरज तिर भंगी ॥
मन मोह मूढ विस्तारि रह्यौ । चिंता तट घट भंजह्य ॥
उत्तरहि पार दुत्तर कवी । का चहुआना रंजह्य ॥
छं० ॥ ७६७ ॥ रु० ॥ ४०१ ॥
॥ चंद का अपनी स्त्री को कहना कि मैं चहुआन का ऋण
उतारता हूं ॥
दूहा ॥ कहे गुपत गुन तैं भले । मो जिय हूय अंदेस ॥
रिन अप्पौ चहुआन कौ । पुब्बह पिथ्थ नरेस ॥ छं० ॥ ७६८ ॥ रु० ॥ ४०२ ॥
३९९ पाठान्तर :- बिना । नह । तेहु । नेह । यह । गेह । पीड । त्रिय । तीय । श्रृंगार ।
सैन । दन्त । खिन । भुक्ति । होइ । तैग । त्याग । तै । नन । लोइ । जीवन । नही । सूरं तरिन ।
सूर तरिज । बच । क्रम । कम । जानि । जीय । सु न । है । नही मुक्ति हरि भक्ति बिनां ॥
४०० पाठान्तर :- चित्रनहारे । श्रं । चहुंवांन । कवि । मनुछ ॥
४०१ पाठान्तर :- तत्र । तत । पुतरी । पूतली । बंधा । नच्चै । नच्चै । नंदी । संपूर् । जीव ।
मनोरथ । वहां । संचै । बहुतं । रंग । तृस्नाह । बहुं । येह । कुरंगी । कां चहुवांना । मौह । मुंढ ।
यतां । भंजर्दय । उत्तरिहि । उतरहि । हुतर । कट्टी । कां । चहुवांन । रंजईय । रंजरह ॥
४०२ पाठान्तर :- कहे । तै । तें । भलो । भलैं । मो । रंह । अंदेश । रिण । अप्पो । की ।
पुब्बइ पंच नरेस । पुब्बह पित्यि नरेस ॥