पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५७
अरिल्ल ॥ आनन इंदु उदोत सु मानौं । जानन भोज विचषन जानौं ॥
रवि ज्यौं सहुन के तन तापन । कामिनि कौं मकरध्वज मानन ॥
छंदं ॥ ७५६ ॥ रु० ॥ ३८० ॥
अरिल्ल ॥ जा सरनागत मानव वंछै । जा सरनागत दानव डूछै ॥
जा सरनागत देव विचारै । सो प्रिथिराज पृथीपति सारै ॥
छंदं ॥ ७५७ ॥ रु० ॥ ३८१ ॥
दूहा ॥ प्रिथ्विराज पति प्रिथ्विपति । सिर मनि कुन्नी छतीस ॥
नृप सिप पर मित जस तजै। ते गुन वरनि बतीस ॥ छंदं ॥ ७५८ ॥ रु० ॥ ३८२ ॥
तिन सहाय असुरह सुभट । सत सामंत रु सूर ॥
तिन सु कित्ति प्रगटी करन। कछी चंद कवि पूर ॥ छंदं ॥ ७५६ ॥ रु० ॥ ३८३ ॥
कवित्त ॥ चहूआन कै वंस । वीर मानिक पुच दस ॥
ता सु कित्ति कवि चंद । जनम लग्गै जंपत जस ॥
ज्यौं वीत्यौ भारत्थ । आदि अंतच त्यौं जंपौं ॥
वय वानी सु प्रमान । लग्न सगनह गुन थप्पौं ॥
ज्यौं भयौ जनम कवि चंद कौ । भयौ जनम सामंत सब ॥
इक थान मरन जनमच सु इक । चल्लहि कित्ति ससि लग्गि रव ॥
छंदं ॥ ७६० ॥ रु० ॥ ३८४ ॥
॥ एक दिन रात्रि को चंद की स्त्रीका रस में आकर पृथ्वीराज जी की
आदि से अंत तक कीर्त्ति वर्णन करने के लिये चंद को कहना ॥
गाथा ॥ समयं इक निसि चंदं । वाम वृत्त वहि रस पाई ॥
दिद्धी ईस गुनेयं । कित्ती कहो आदि अंताई ॥ छंदं ॥ ७६१ ॥ रु० ॥ ३८५ ॥
३८० पाठान्तर :-आनंन । इंदु । इंद । उद्दोत । समानौ । मानौ । ज्ञांनन । जातन । भौज ।
विचख्यन । जांनो । भांन । शत्रुंन । सचुंन । कै । कांमिनी । कुं । मकरधज । मांनन ॥
३८१ पाठान्तर :-मांनव । इच्छै । दांन । वंछैः । सरनागति । सो । प्रथ्वीराज । पृथ्विपति ॥
३८२ पाठान्तर :-प्रिथीराज । प्रिथ्वीपति । प्रथ्वीराज पृथ्वी पति । शिर । कुंली ।
शिप । तजे । तै । कु तीन । छत्तीस ॥
३८३ पाठान्तर :-आसुरह सुरह । कित ॥
३८४ पाठान्तर :-चहुआंनारैं । चहुवाना कै । वंश । मांनिक । मानक । स । जन्म । लगे ।
लगै । ज्यो । वित्यौ । भारथ । ज्यो । जंप्यो । वांनी । प्रमांन । लगन लगनह । मगनं । थप्यो ।
जन्म । कौ । सामंत । थांन । मरेण । जन्म दिन इक । जनंम । कित्त । शसी । ससो । रिव । रवि ॥
३८५ पाठान्तर :-यांहू । इस । कहों ॥