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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 470 में से

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पृष्ठ 122

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १११
दूहा ॥ राजा ज दिन बुलाइ चै । मुह सुझझै इच्छ मत्त ॥
कै सिर तुम द्वि समप्पि हैं । कै सिर धरि हैं कत्त ॥
छं० ॥ ५५० ॥ रु० ॥ २८७ ॥
इच्छ धरनी मुझ पित प्रपित । आदि अनादि सु देव ॥
सो मंगन तुम पाय हैं । आयौ आतुर सेव ॥
छं० ॥ ५५१ ॥ रु० ॥ २८८ ॥
॥ ढंूढा दानव का प्रसन्न होकर आना को अजमेर का राज देना ॥
चोटक ॥ सु प्रसन्नह देषित ईत तनं । नर रूप धरन्न कियौ सु मनं ॥
तुअ पुत्रह पौत्र बधू उरनं । जन मानस राज करों धरनं ॥ छं० ॥ ५५२ ॥
असि इच्छ जियै असमान गयौ । पग टोडर कंदल छी जु ठयौ ।
तव पुज्जन कों रवि वार कह्यौ । चहुआन सु आनन राज दयौ ॥
छं० ॥ ५५३ ॥ रु० ॥ २८९ ॥
॥ ढंूढा का आना को राज देकर गंगा की ओर उड़कर जाना ॥
दूहा ॥ दयौ राज आनल्ल गढ । उड़ि ढुंढा पछ मग्ग ॥
दिसि गंगा तव गमन क्रिय । उच्चर चिषा अति लग्ग ॥
छं० ॥ ५५४ ॥ रु० ॥ २९० ॥
॥ ढंूढा का नेमऋषि के उपदेश से गंगा की ओर जाते हुए
दिल्ली पहुंचना ॥
पद्धरी ॥ नव द्वार रुकि तप पवन जोर । आयौ सु नेम रिष तथ्य ठौर ॥
दिषि रिष्य लग्गि निसच्चर सु पाय । कचि रिष्य कवन तो कवन काय ॥ छं० ॥ ५५५ ॥
बीसल्लह राज कांधि पुब्ब कत्थ । जरौं ताप उघरौं केम नत्थ ॥
तुअ षिचि कौन इच्छ ठांउ धारि । कासी सु जाइ लै तिष्य धार ॥ छं० ५५६ ॥
तें पाप कीन आनन्त मर्म । तिचि डैरि खुब्ब कुद्है सु कर्म ॥
सुनि श्रवन उड़्यौ राषिस अकास । आयौ सु पंथ कमि दिल्ली वास ॥ छं० ॥ ५५७ ॥

२८७-८८ पाठान्तर :- जा । द्विंन । मुहि । सूझै । मसि । कैं । हों । कैं । हूं । हों । कत्र ॥ २८७ ॥
प्रमित । हों ॥ २८८ ॥
२८९ पाठान्तर :- प्रसंवह । धरंन । कीयो । मांस । कहै । हथ । असमांम । कूं । पूजन ।
को । चहुआंन । चहुवांन । आंनल ॥
२९० पाठान्तर :- दीयो । आंनलहुं । कीय ॥