पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
साटक ॥ नो दारिद्र न कुष्ट दुष्टन तनं । सत्रू धरा नो हरं ॥
नो वनिता च वियोग दैव विपद्दा । निर्वासितो नो नरं ॥
नो सन्मानस रुष्ट जुष्ट जगता । नो आपिता सत् गुरुं ॥
मातुर्नाञ्चित रंग अंग सरसा । ना लिंगिता सुंदरी ॥
छंदं ॥ ५४४ ॥ रू० ॥ २८१ ॥
दूहा ॥ ना दारिद्र न कुष्ट तन । ना मुग्धा रस भेव ॥
नानुरत्त संसार सुख । तो पग रत्तौ खेव ॥ छंदं ॥ ५४५ ॥ रू० ॥ २८२ ॥
साटक ॥ नैवां दुष न सुख साहंस रने । नैवांन कालं कृतं ॥
नैवां मात पिता न चैव धनयं । नैवांन कित्ती रतूं ॥
नैवांनं चित्त मित्त साजन रसं । नैवांन किं रुष्टयं ॥
त्वं देवं तुअ हेव देव सरनं । तोयं जयं राज्यं ॥
छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० ॥ २८३ ॥
दूहा ॥ तब लगि कुष्ट दरिद्र तन । तब लगि लघु सुहि गात ॥
जब लगि हैं आयौ नहीं । तो पाहन खेवात ॥
छंदं ॥ ५४७ ॥ रू० ॥ २८४ ॥
॥ दानव का आना से पूछना कि तू क्यों राज अरत्त है ॥
दूहा ॥ आलिंगन दै हत्थ धरि । अरु पुच्छिय इक बत्त ॥
जा जीवन रत्तौ जगत । तू क्यों राज अरत्त ॥
छंदं ॥ ५४८ ॥ रू० ॥ २८५ ॥
॥ आना का बीसलदेवजी दानव को उत्तर दै कहना ॥
दूहा ॥ जिय न रत्त नह एन दुष । भूमि न घर मुझ देव ॥
तिन उचाट जिउँ कै मरौं । तुम पय रत्तौ सेव ॥
छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० २८६ ॥
२८१ पाठान्तर :- नां । धरा नं । नां । विनता । नां । ना । ता । सन्मांतस । आपितो ।
गुरुं । मातुर्नाम्रित ॥
२८२ पाठान्तर :-न । न मुगहु । नांनुरत्त । नरतु । तुअ पग रतो सेव ॥
२८३ पाठान्तर :-दुष । सुष । रस । पितं । मितं । सजन । तुं । तुय ॥
२८४-८५ पाठान्तर :-तब । हूं । नहीं । तौ ॥ २८४ ॥ दे । हथ । पुछिय । रत्तौ । सो तू
केम आरत्ति ॥ २८५ ॥
२८६ पाठान्तर :-रत । तहि । भूमिंन । तिहिं । जीऊं । जिउं । कि । मरौं । पैं । रत्तौ ॥