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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 470 में से

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पृष्ठ 116

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १०५
दूहा ॥ उचरि मात समंत दूच । जीवन मरन न सिद्ध ॥
दुहुं विधि घर वासन करौ । आराधन कि विरुद्ध ॥
छं० ॥ ५२१ ॥ रू० ॥ २६५ ॥
पुत्त असमंत जु सिप्पयौ । सिष्यौ उरव्ह दहंत ॥
ढूंढौ नर ढुंढै भषन । तू सेवनह कहंत ॥
छं० ॥ ५२२ ॥ रू० ॥ २६६ ॥
॥ आना का माता से कहना कि या तो मैं सिर समपूंगा वा
छत्र धारूंगा ॥
दूहा ॥ तब आनल्ल अैसी कत्थिय । मुचि सुभिक्षय यह वत्त ॥
कै सिर उनहि समप्पि हौँ । कै सिर धरि हौं छत्त ॥*
छं० ॥ ५२३ ॥ रू० ॥ २६७ ॥
॥ आना का माता से कहना कि सेवा ऐसी है कि जिस से सब
कार्य सिद्धी होती है ॥
कवित्त ॥ सेव देव रंजियै । सेव रष्षस वसि सव्वह ॥
सेव सिंघ पत्तियै । सेव विष जरै न जल्लह ॥
सेव वैर भंजियै । सेव रच पति पावन ॥
सेव दह्रै नह दहन । सेव बहु द्रव्य उपावन ॥
जिहिं सेव देव रष्षस धरहि ! जियन मात तन जाइ नन ॥
आमूढ ढुंढ धावत भषन । नहि सु देव नहि दानवन ॥
छं० ॥ ५२४ ॥ रू० ॥ २६८ ॥
२६५-६६ उचरि । सु मंत्र । सिद्धि । दुहुँ । बर । करो । करौं ॥ २६५ ॥ पुत । सिपियौ ।
सिप्यौ । भवन ॥ २६६ ॥

  • यह रूपक सं० १६४७ और १७१० की पुस्तकों में नहीं है और जब तक वह किसी और
    प्राचीन लिखित पुस्तक में न मिले तब तक हम उसे प्रसन्नतापूर्वक क्षेपक संज्ञा नहीं प्रदान कर सक्ते ॥
    २६७ पाठान्तर :-सुभिय । वत । कैं । उतहि । हो । हो ॥
    २६८ पाठान्तर :-रंजीयै । न सेव सिंघं पत्तियै । जलह । भंजीयै । रचै । सेवव्ह नह दहन ।
    द्विव्य । जिन्हि । नह । सो नह ॥